आप का डेमो

देश का शायद ही कोई थोड़ा सा भी समझदार, जागरूक नागरिक नहीं रहा होगा जो अन्ना के दिल्ली ड्रामे अछूता रहा हो। वर्तमान समय में कांग्रेस की दुर्दशा की नींव राहुल गाँधी से अधिक उसी ड्रामे से जुड़ी हुई है।

टीवी चैनलों से लेकर अख़बारों तक में जो मीडिया कवरेज मिली उससे लगता था की देश पलटने वाला है, क्योंकि दिल्ली से दूर महाराष्ट्र के एक गाँव से एक बुजुर्ग पूर्व फौजी हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर देश बनाने के लिए दिल्ली में अन्न-जल का त्याग करके बैठ गया था। भारत माता की जय के नारे आसमान छू रहे थे और तिरंगे झंडे की बिक्री ने नया रिकार्ड बनाया।

अन्ना का आंदोलन आगामी पार्टी की जननी रहा

सोशल मीडिया पर भाई लोग लगातार अपडेट दे रहे थे कि कैसे जो इस वक्त अन्ना के साथ नहीं है वह घोर पाप कर रहा है। हजारों लोगों के सामने संसद का माखौल उड़ाते एनजीओ कर्मियों, जिन्हें एक्टिविस्ट कहा जाता है, के भाषणों से लोग जोश में आ चुके थे और यह स्पष्ट होता जा रहा था कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार दुनिया की भ्रष्टतम सरकार है। कैग की रिपोर्ट्स इन एनजीओ वालों को और मसाला दे रही थीं, साथ ही केंद्र और दिल्ली सरकार चला रहे लोगों की आत्ममुग्धता से हालात और भी अजीब हो चुके थे। सरकार पर तमाम घोटालों के आरोपों और राहुल गाँधी को ही एकमात्र नेता मानने की सिंडिकेट की जिद के चलते अन्ना एंड कंपनी का चढ़ना जारी था।

जिसे गांधी टोपी कहा जाता है, उसे सर पर रखे महात्मा गाँधी की कोई तस्वीर बमुश्किल कहीं दिख पायेगी लेकिन महाराष्ट्र के किसानों के आम पहनावे में वह शामिल है। अन्ना भी अपने परिवेश के हिसाब से उसे धारण करते हैं, लेकिन वह टोपी भी तिरंगे के साथ एक नयी पहचान बन गयी थी।

समय के साथ उस टोपी पर ‘मैं भी अन्ना’ के साथ ‘मुझे चाहिए जनलोकपाल’ भी प्रिंट हुआ।

सोशल एक्टिविस्ट के रूप में अपनी पहचान बना चुके अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी के साथ मनीष सिसोदिया, पूर्व जनरल वीके सिंह और तहलका फेम आशीष खेतान जैसे तमाम क्षेत्रों के अनुभवी लोगों ने अन्ना को ताकत दी, क्योंकि इनकी उपस्थिति से आन्दोलन की विश्वसनीयता बड़ी हो रही थी।

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साथ ही योगेन्द्र यादव जैसे अनुभवी विश्लेषक और प्रशांत भूषण जैसे काबिल वकील का समर्थन धार दे रहा था। आज़ादी की तीसरी लड़ाई’ के पर्चे छपवा कर जन्तर-मंतर को समय समय पर गुलजार करते रहने वाले गोपाल राय जैसे तमाम एक्टिविस्ट जो समाज और परिवार के लिए बहुतों को बोझ लगते थे, इस आन्दोलन में उमड़ने वाली भीड़ को खुद के लिए आशा की बड़ी किरण के रूप में देख रहे थे।

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अन्ना की इस टोली पर लोगों का भरोसा हो रहा था मजबूत

तमाम नौजवान जो देश के लिए कुछ करना चाहते थे, उन्हें भी अन्ना और उनके साथ की टोली पर पूरा भरोसा हो चुका था कि अब देश बदलने ही वाला है। ‘दिल दिया है, जान भी देंगे ए वतन तेरे लिए’ दुहराते रहने वाले अन्ना के सपाट भाषणों के साथ शुरू हुए आन्दोलन को धार देने के लिए टोली के पास देश के बड़े लोगों भ्रष्टाचार के पुलिंदों से भरी कथित फाइलें भी दिखने लगी थीं। दिल्ली का सिंहासन डोल रहा था। ध्यान रहे तब तक नरेंद्र मोदी गुजरात के बाहर कहीं सीन में थे भी तो कुछ एक्टिविस्ट की सेमिनारों में ही, जहाँ गुजरात को याद दिलाया जाता था, वह भी गोधरा के बगैर।

अन्ना के मंच का जिस तरह एनजीओ वालों ने इस्तेमाल किया, वह भी एक नायाब उदाहरण है। सामान्यतया ऐसी स्वंसेवी संस्थायें अपने संस्थापकों की जेब में ही होती हैं, जहाँ उनकी मनमर्जी ही चला करती है और सारे नियम कायदे वो लोग खुद ही तय करते हैं, यही चलन देश में राजनैतिक दलों में भी है, जो किसी न किसी परिवार के ही नियंत्रण में हैं। फिर राजनैतिक दलों की जनता के प्रति जवाबदेही होती है और इनके पास जनता से जुड़े रहने की कला होती थी। ‘थी’ इसलिए लिखना पड़ा, क्योंकि अब राजनैतिक दल भी ड्राइंग रूम में बैठे रणनीतिकारों की योजनाओं से संचालित होते हैं और उनके लिए भी जनता के बीच संवाद करने का मतलब केवल चुनावी रैलियों-सभाओं में ही सिमट कर रह गया है। जनता से कट चुके नेताओं का यह दौर है जिन्हें भरोसा है कि जनता उनके मैनेजमेंट की कायल है। शायद यही कारण है कि पाकिस्तान सीमा पर क्रूरता के शिकार हुए शहीद के घर जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के जाने का कार्यक्रम लगा तो एक दिन पहले उस कमरे में एसी फिट हो गया, सोफे रखवा दिए गए, जबकि योगी को कुछ ही समय के लिए जाना था। योगी जब उस घर से वापस जाते हैं तो फिर वो सुविधायें भी अफसर वापस लेते गए जो मुख्यमंत्री के लिए जरूरी समझी गयी थीं। कहाँ तो सुना था की तखत पर सोते हैं और एसी नहीं चलाते, खैर इन सब पर फिर कभी। अभी बात आप की।

केजरीवाल की कथनी और करनी में अंतर ने उन्हें जनता के कठघरे में ला दिया

संसद को चोरों का अड्डा अन्ना के मंच से बताया गया। सांसदों का मखौल उड़ाते हुए किरण बेदी ने घूँघट नृत्य भी दिखलाया था और केजरीवाल ने राजनीति को निहायत ही बुरी चीज बतलाते हुए अपने बच्चों की कसम खाई थी कि वो राजनीति में कभी नहीं जायेंगे। उस मंच से लगाए जा रहे आरोप सही थे या गलत, इसकी जांच तो अभी तक न हुई, न ही कभी हो सकती है, लेकिन उस आन्दोलन ने सुचिता, नैतिकता का एक दबाव जरूर बनाया था जिससे इंकार करना तत्कालीन तथ्यों को नकारना ही होगा।

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अन्ना तो एक खालिश देहाती हिन्दुस्तानी थे, जो मजमा देख कर खुश भले हो गए रहे हों और उस भीड़ के हिलोरे से देश में बदलाव की बात सोच कर वापस आपने गाँव चले गए, लेकिन जिस टोली को उन्होंने एक दिशा दिखा दी, वह अब मानने वाली कहाँ थी?

अभी तक केवल अपनी फंडिंग एजेंसी के लिए प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने वालों के सामने दानदाताओं की भीड़ खड़ी थी जो देश में बदलाव देखना चाहती थी। साथ ही मिल चुके थे अपना सबकुछ छोड़ कर उस टोली के साथ मिलकर मिशनरी भाव से बदलाव के लिए जुटने वाले स्वयंसेवक। ऐसे में अन्ना की इच्छा न होते हुए भी बन गयी आम आदमी पार्टी और इसने लड़ा दिल्ली विधानसभा का चुनाव। सफलता भी अप्रत्याशित मिली लेकिन गणित बहुमत से कम था तो ‘जनता की इच्छा का सम्मान’ करने के नाम पर सरकार उसी कांग्रेस के समर्थन से बनायी गयी जिसके खिलाफ अन्ना का आन्दोलन हुआ था। सरकार बनाने के बाद से लगता था कि इन्हें सरकार चलाने की जगह आन्दोलन का ही अनुभव है तो उसी शैली में चलते रहेंगे और रगड़-घिस करते हुए पचास दिन बाद केजरीवाल जी ने इस्तीफ़ा दे दिया। दिल्ली में राज्यपाल शासन के दौरान कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए जिनमें भाजपा की जबरदस्त जीत हुई लेकिन जब दिल्ली में फिर से चुनाव हुए तो बड़े-बड़ों से टक्कर लेने की ख्याती बटोर चुके केजरीवाल के जुझारूपन ने उनकी पार्टी को जबरदस्त जीत दिला दी और 70 में से 67 सीटें इनकी पार्टी की आ गयी, कांग्रेस साफ़ हो गयी और भाजपा हाँफती रही।

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अपने तमाम प्रशंसकों को निराश किया दिल्ली के कर्ताधर्ता मुख्यमंत्री ने

यहाँ यह भी ध्यान रहे कि पूरे देश को दिल्ली के एक राज्य के रूप में संसदीय सीमाओं का पता होगा लेकिन उसकी गद्दी पर प्रचंड बहुमत से आई इस नयी पार्टी को नहीं पता। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस रसातल की यात्रा पर लगी रही तो नगर निगम से थोड़े से ही ज्यादा अधिकारों वाली दिल्ली सरकार के मुखिया को जीत की विनम्रता की जगह मोदी के विकल्प के भूत ने घेर लिया। जिन अपेक्षाओं के साथ जनता ने उन्हें चुना था उन्हें पूरी करने की जगह केजरीवाल ने आक्रामक रूप से अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई। देश का बड़ा हिस्सा अभी भी उन्हें एक नयी राजनीति के विकल्प के रूप में देख रहा था, लेकिन उन्होंने उतनी ही तेजी से अपने तमाम प्रशंसकों को बुरी तरह निराश किया और अचम्भे में पड़े राजनैतिक दलों को भी आश्वस्त कर दिया की कोई खतरा नहीं है, वरन यह अन्ना के मंच से शुरू हुआ यह प्रहसन भी अब मुख्यधारा के साइड में लग चुका है। अब तक अरविन्द को सुपर स्टार बना चुकी मीडिया भी रूखापन दिखाने लगी थी। बिकने और दलाली का आरोप लगाने से पहले ध्यान रहे कि यही मीडिया राहुल गाँधी की ‘विलेज सफारी’ को भी कभी बहुत उत्साह से दिखा चुकी है और जन्तर-मंतर से लगायत रामलीला मैदान तक अन्ना की टोली के लिए स्टूडियो भी सजा ही चुकी है। उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय के गाँवों में बंटने वाले अखबारों में भी केजरीवाल जी की सरकार ने दिल्ली की उपलब्धियां गिनाते हुए कई कई पन्नों के विज्ञापन दिए ही हैं, फिर यह हालत बनी क्यों? कहाँ गई शीला दीक्षित के खिलाफ तैयार सात सौ पेज के सबूतों वाली फ़ाइल जो अन्ना आन्दोलन में लहराई जाती थी? अम्बानी से लगायत गडकरी और जेतली के खिलाफ ललकार लगा कर अपना जयकारा लगवाने वाले केजरीवाल जी कहाँ चले गए ?

बदलाव का ‘काल्पनिक पुतला’ बनकर रह गए केजरीवाल

लोकसभा चुनाव के समय जो भरोसा मतदाताओं की बड़ी संख्या ने नरेंद्र मोदी पर दिखाया था वही भरोसा केजरीवाल से भी लोगों को था, वरन यह कहिये की केजरीवाल पर भरोसा अधिक गहरा था क्योंकि उसके पीछे उनका अनुभव नहीं वरन अन्ना आन्दोलन से उपजी नैतिक ताकत थी। उस ताकत पर लोगों ने भरोसा किया था और उसके प्रतीक के रूप में अरविन्द केजरीवाल को स्थापित किया था। वह केजरीवाल की व्यक्तिगत क्षमता नहीं थी, क्योंकि वो पूर्णतय गैर राजनैतिक व्यक्तित्व थे, लेकिन अराजनीतिक और अराजकता के बीच का महीन सा फासला बड़ा नाजुक साबित हुआ और लाखों लोगों का दिल टूट गया। हालाँकि इनमें से बहुतों को मोदी के रूप में अपना नया नायक मिल गया लेकिन केजरीवाल ने कहीं अधिक चोट की है। जिसे लोग उनकी सादगी और विनम्रता समझ रहे थे वह जल्दी ही एक ओढ़ा हुआ आवरण साबित हो गया, जिस आवरण के टूटने से पंद्रह लाख वाले जुमले और अच्छे दिन और रात की फरक वाली बातों से कहीं अधिक तकलीफ हुई क्योंकि लोगों ने केजरीवाल में नेता नहीं वरन एक बदलाव का काल्पनिक पुतला देखा था।

भले नगर निगम चुनावों में कांग्रेस को करारी हार मिली हो और देश भर में पार्टी अच्छी स्थिति में न हो लेकिन दिल्ली के लोगों को अब शीला दीक्षित की याद आ ही रही है। यहाँ तक कि उनसे पहले के मुख्यमंत्रियों को भी लोग याद कर रहे हैं, लेकिन केजरीवाल की छवि अब वैसी नहीं रही जिसपर सवार होकर उन्होंने सत्ता पायी थी। यह भी ध्यान रहे कि केजरीवाल के साथ अब वो लोग भी नहीं हैं, जिनके नाम आकर्षित करने वाले रहे हैं। दिल्ली की सत्ता मिलते ही केजरीवाल अपनी सरकार को सुचारू रूप से चलाने की जगह खुद बिना विभाग के मुख्यमंत्री होकर राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करने का सपना देखने लगे। हालाँकि सपने देखने का सबको हक़ है लेकिन इनसे अपेक्षाएं कुछ अलग थीं लेकिन इन्होंने उनका ध्यान नहीं रखा। कमजोर होती कांग्रेस की जगह दबोचने की ललक ने इस नयी पार्टी को बहुत जल्दी ही पटक दिया। बनारस में नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ना, खुद को राष्ट्रीय स्तर पर बड़े नेता के रूप में स्थापित करने की चाहत के सिवाय कुछ नहीं था, जबकि राजनीति धीमी गति से लम्बा खेलने का नाम है। बनारस की बात करें तो याद रहे कि वहां इनको वोट भी अच्छे खासे मिले थे, लेकिन उनमें योगन्द्र यादव जैसे लोगों का भी योगदान था, क्योंकि यादव की नुक्कड़ सभाओं ने काफी लोगों को आकर्षित किया था और ग्रामीण इलाकों में तो लोगों को अचरज होता था की इतना मृदुभाषी नेता भी कोई हो सकता है।

यह अलग बात है कि वही यादव और पार्टी को शुरूआती चंदे में भारी धनराशि देने वाले प्रशांत भूषण को जिस तरह से पार्टी से बाहर किया गया, वैसी हरकत तो मायावती भी नहीं करतीं।

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तमाम लोगों के सपने तो उसी समय टूटे होंगे फिर भी एक उम्मीद थी की केजरीवाल अब एक एक्टिविस्ट से अच्छे और निर्विवाद नेता ही बन जायें तो आन्दोलन का नैतिक बल उन पर लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए काफी होगा। ऐसा हो न सका, क्योंकि केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर छा जाने की जल्दबाजी थी और वो विशुद्ध दिल्ली की सड़क छाप शैली में आ गए और उनकी विनम्रता गायब हो चुकी थी। प्रधानमंत्री को कायर और मनोरोगी कहना उनकी उग्रता को दिखा रहा था। उनकी व्यग्रता उन्हें पंजाब और गोवा की सत्ता दिला रही थी और वो दिल्ली को छोड़ अपना समय उन दो राज्यों में ही अधिक दे रहे थे, क्योंकि उन्होंने राष्ट्रीय नेता बनने के लिए ही सारा कार्यभार अपने उपमुख्यमंत्री को देखा रखा था। इनकी ज़ुबानी लड़ाई का ही नतीजा है कि दिल्ली सरकार के अच्छे कामों का तो प्रचार न हो सका, बल्कि एक अधकचरे नेता के रूप में यह आन्दोलनकारी उभर कर सामने आ गया, जिसे सरकार चलाना भी किसी प्रोजेक्ट के तहत सड़क पर बैनरबाजी जैसा ही लगता है। मीडिया के साथ भाजपा और कांग्रेस, दोनों भी केजरीवाल पर एकदम हमलावर हैं तो उसका कारण है कि इन्हीं दोनों दलों को उन्होंने नुकसान पहुंचाया। हाँ, श्रीनगर उपचुनाव में लोकसभा की सीट महबूबा मुफ्ती की पार्टी से निकल कर फारुख अब्दुल्ला की झोली में चली जाती है, वहां मत प्रतिशत भी ऐतिहासिक रूप से एकदम कम रहता है फिर भी मीडिया भाजपा-पीडीपी को कटघरे में खड़े करने की जगह, दिल्ली विधानसभा उपचुनाव में केजरीवाल के प्रत्याशी की हार को बड़ा मुद्दा बना कर खबरों से खेलती रहती है। मुख्यमंत्री से इस्तीफ़ा माँगा जाता है। नगर निगम के चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए कोढ़ में खाज का काम करते हैं और जनभावनाओं को समझने की जगह पार्टी वोटिंग मशीन को ही मुद्दा बना कर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाती है वह भी जब इसके पूर्व मंत्री ने अनशन शुरू किया उसके अगले दिन। याद रहे कि भाजपा के किसी मुख्यमंत्री ने सदन का विशेष सत्र नहीं बुलाया था और लम्बा कार्यकाल बिता कर शीला दीक्षित भी उतने सत्र नहीं बुलाई थीं, जितने अब तक केजरीवाल जी बुला चुके हैं। सत्र में हुआ क्या? एक डेमो मशीन का डेमो दिया गया, यानी पार्टी यह मानती है की जनता का उसके ऊपर भरोसा है, लेकिन मोदी सरकार उसके खिलाफ साजिश रच रही है। कपिल मिश्रा के अनशन के जवाब में आम आदमी पार्टी सीधे भाजपा और प्रधानमंत्री पर ही आरोप लगा रही है, यानि देश भर के तमाम पूर्ण राज्यों में अपनी काफी गहरी जड़ें रखने वाली तमाम क्षेत्रीय पार्टियों और कांग्रेस की जगह भाजपा को डर केवल आम आदमी पार्टी से ही है। पाकिस्तान-चीन और महंगाई, सबका विकास जैसे मामलों में उलझे मोदी जी अपनी मन की बात केवल आम आदमी पार्टी को ही बताते हैं, जिसके मुताबिक़ उनका मकसद उस पार्टी का सफाया करना है जो विशुद्ध राजनैतिक दल के रूप में अभी तक खड़ी भी नहीं हो पायी है और गली-मोहल्ले की उस क्रिकेट टीम की तरह है, जिसमें तमाम वालेंटियर जुट जाते हैं। टीम की रणनीति के मुताबिक़ हार जाने के बाद विपक्षी के स्टंप लेकर भाग जाने वाले खिलाड़ी की भूमिका अहम होती है।

तो क्या ‘आप’ की झाड़ू गंदी हो चुकी है?

अभी बीस से अधिक विधायकों के बारे में चुनाव आयोग का फैसला आना बाकी है। उससे पहले ही केजरीवाल आयोग के खिलाफ पूरी तरह से मोर्चा खोल चुके हैं जिसका मतलब साफ़ है की अगर फैसला प्रतिकूल आया तो बयान तैयार रहेगा कि आयोग भाजपा के हाथों में खेल रहा है। देश की राजधानी से राजनीति को नयी दिशा देने की उम्मीदों को इस तरह का पलीता लगते देखना दुखद है।

या अभी भी वक्त रहते संभला जा सकता है?

अभी भी कुछ समय है जिसमें आम आदमी पार्टी चाहे तो संभल सकती है और आन्दोलनकारियों की टोली की जगह एक परिपक्व राजनैतिक दल की तरह व्यवहार करे, ताकि जनता का भरोसा फिर जीता जा सके, क्योंकि दिल्ली कांग्रेस तो खुद अंतर्कलह से जूझ रही है। भाजपा मोदी और शाह के सहारे उड़ान पर है, उसे निशाने पर लेने की जगह अपने लोगों को ठीक करें।

कुमार विश्वास और विधायक अमानतुल्लाह वाला जो प्रकरण है वह यह बतलाने के लिए काफी है की भीतर ही अभी अविश्वास के तमाम साए हैं, जिनका इलाज जरूरी है। बाहर चिल्लाने से बहुत कुछ बदलने वाला है नहीं। योगेन्द्र यादव का भी बयान आ गया है कि चुप रहने के एवज में उन्हें भी राजस्थान का प्रभारी बनाने का प्रस्ताव मिला था। याद रहे यह पद हाल ही में राष्ट्रवादी कवि को मिला है। गणित-गुणा पार्टी को चलाने के लिए जरूरी तो है, लेकिन पार्टी भी पार्टी की तरह दिखनी चाहिए।

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