एंटी रोमियो : हमेशा से

विकास के साथ अब सारे नाम अंग्रेजीदां होने लगे हैं तो उत्तर प्रदेश में धमक के साथ आई सरकार ने एंटी रोमियो स्क्वाड बना लिया है। इसका वादा चुनावी रैलियों में भी किया गया था, लेकिन सवाल है कि उस बिचारे रोमियो ने या मजनूँ ने हमारे देश का क्या बिगाड़ा था कि इन काल्पनिक चरित्रों के चरित्र के साथ खिलवाड़ किया जाता है।

इटली के वेरोना में मोंटेग्यू और कपलेट, दो प्रभावशाली व्यक्तियों के बीच दुश्मनी थी, इतनी की उनके नौकर भी गलियों में आपस में झगड़ते रहते थे। नौकरों के झगड़े के दृश्य से ही शेक्सपियर का ड्रामा शुरू होता है, ‘काउंट पेरिस।’ कपलेट की बेटी जूलियट से शादी करने का प्रस्ताव देता है। जूलियट तेरह साल की ही थी इस नाते कपलेट दो साल रुकने की बात कहते हैं और अपने यहाँ आयोजित होने वाली एक गैदरिंग में आने का सुझाव देते हैं। जहाँ जूलियट उससे मिल सक, ,परिचित हो सके। कपलेट की बीवी और जूलियट की सेविका भी उसे पेरिस की हैसियत के बारे में बतलाते हुए कोर्टशिप की सलाह देती हैं। कपलेट की भतीजी रोजलिन से मोंटेग्यू का बेटा रोमियो प्यार करता है। लेकिन दोनों परिवारों की दुश्मनी के चलते रोजलिन उससे दूर रहती है और रोमियो अवसाद में चला गया है। रोमियो के इस हाल का कारण जब उसके अंकल बेन्वोलियो को पता चलता है, तो वह सलाह देता है की कपलेट के यहाँ बड़ा कार्यक्रम है, उसमें जाओ और अपनी प्रेमिका रोजलिन से मिलकर उसे मना लो। रोमियो जाता तो है लेकिन वहां उसकी नजर जूलियट से लड़ जाती है फिर ‘दोनों अँखियाँ लड़ी की लड़ी रह गयीं’। मतलब जूलियट भी आकर्षित हो जाती है और रोमियो भी रोजलिन को भूल चुका।

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जूलियट का चचेरा भाई अपने खानदानी दुश्मन के लड़के को देख कर उसे मार डालना चाहता है, लेकिन जूलियट के पिता इतने भव्य समारोह में खून खराबा नहीं होने देना चाहते और बीच बचाव कर देते हैं. प्रोग्राम के बाद वहीं घर के बगीचे में ही घूम रहे रोमियो को जूलियट की बात सुनाई पड़ती है, जिसमें इशारा है कि उसे रोमियो से प्यार हो गया है। सम्मानित धार्मिक बुजुर्ग, संन्यासी लारेंस लम्बे से समय से कोशिश में हैं कि दोनों प्रतिष्ठित परिवारों का झगड़ा बंद हो जाए और उनके बीच समझौता हो जाए। इनकी मदद से दोनों अगले ही दिन गुपचुप ढंग से शादी कर लेते हैं। लारेंस को भी आशा है कि अब दोनों परिवारों में मित्रता हो जाएगी। जूलियट का चचेरा भाई टाइबाल्ट अपने समारोह में दुश्मन रोमियो के घुसने को अपमान समझता था और उसकी मुठभेड़ एक दिन रोमियो से हो जाती है, जिसे वह ललकारता है। रोमियो उसे अब अपना रिश्तेदार मानते हुए उसकी बात अनसुनी कर देता है, लेकिन रोमियो का मित्र मरक्यूटीयो बदले में भिड़ जाता है, जिसमें मित्र मारा जाता है, जिसे बचाने की कोशिश में न चाहते हुए भी रोमियो को झगड़े में शामिल होना पड़ता है और उसके हाथों टाइबाल्ट की हत्या हो जाती ह।.अब राजकुमार रोमियो को हत्या का दोषी मानते हुए वेरोना से निष्कासन का आदेश दे देता है और शहर में फिर दिखाई देने पर मृत्युदंड दिए जाने की घोषणा करता है। रोमियो उस रात चुपके से जूलियट के कमरे में पहुँच जाता है और दोनों अपनी गुप्त शादी को कांसुमेट करते हैं। यानी इसाई विवाह के पूर्ण होने की वह प्रक्रिया जब वर –कन्या पहली बार, वैधानिक ढंग से, शारीरिक सम्पर्क स्थापित करते हैं। इस कार्य के पूर्ण हुए बिना विवाह पक्का नहीं माना जाता। सुबह होने से पहले ही रोमियो शहर छोड़ कर निकल लेता है और जूलियट के चेहरे पर अंतहीन उदासी छा जाती है। उसकी तकलीफ को समझे बिना उसका बाप उसे काउंट पेरिस से शादी करने को कहता है और दिन भी तय कर देता है। जूलियट अपनी माँ से शादी टालने के लिए कहती है लेकिन माँ भी उसकी बात अनसुनी कर देती है। निराश हताश जूलियट फिर लारेंस के यहाँ जाती है, जो उसे एक जहर देते हैं जो खाने बाद दो दिन के लिए बेहोश कर देता है, ऐसी बेहोशी जिसे लोग मौत ही समझते हैं। लारेंस इस प्लान की सूचना रोमियो तक पहुँचाने की भी बात करते हैं। काउंट पेरिस से शादी से पहले वाली रात को जूलियट जहर खा लेती है और परिवार के लोग उसे मरा सोच कर उस तहखाने(क्रिप्ट) में रख देते हैं जो कपलेट के परिवार के मृतकों के लिए था। लारेंस का सन्देश वाहक रोमियो तक पहुँच नहीं सका था, लेकिन उसके नौकर ने जूलियट के मौत की खबर दे दी। बहुत ही दुखी और टूटा हुआ रोमियो जहर खरीदता है, जिसे लेकर कपलेट के क्रिप्ट में पहुँच जाता है जहाँ उसकी मुलाक़ात अकेले में शोक व्यक्त करने आये काउंट पेरिस से होती है। पेरिस उसे अपराधी ही समझता है और दोनों में भिडंत हो जाती है जिसमें पेरिस मारा जाता है। जूलियट को मृत समझ कर रोमियो भी जहर पी लेता है और उसकी मौत हो जाती है।

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इसी समय जूलियट की बेहोशी टूटती है और अपने प्यार को मरा हुआ देख कर वह जूलियट का छूरा लेकर अपनी भी जिंदगी खतम कर लेती है।

शेक्सपियर का ड्रामा खतम होता है इस शोक सन्देश के साथः

“जूलियट और उसके हीरो रोमियो की कहानी से अधिक दुखांत कोई कहानी अभी तक नहीं हुई।”

शेक्सपियर के इस नाटक को वास्तव में सबको पढ़ना चाहिए और सन्देश यह भी ले जाना चाहिए की दोनों की मौत के बाद लम्बी दुश्मनी निभा रहे दोनों परिवार साथ मिलकर रोते हैं, जिनके चलते दो युवा प्रेमियों का यह दुःखद अंत हुआ।

अब रोमियो-जूलियट का नाम तो आप सबने सुना ही होगा। नाटक भी बहुतों ने पढ़ा होगा या कहानी जानते ही होंगे। बेहतरीन संवाद से भी बहुत लोग परिचित होंगे, लेकिन अगर यह प्लॉट लिखने की जगह केवल रोमियो लिख कर बात आगे बढ़ाता तो उन लोगों के साथ नाइंसाफी होती जो केवल इन नामों को जानते हैं। ऐसे नाम जो इटली की लोककथाओं से उठकर शेक्सपियर की महान कृति में शुमार हो कर बन गए अमर प्रेम का प्रतीक। ऐसी ही दुःखद कथा लैला-मजनूँ की भी है, जो ईरानी लोक गाथाओं में बिखरी पड़ी थी और उसे बारहवीं सदी के फ़ारसी कवि निजामी गंजवी ने अपनी लम्बी कविता में ढाल कर अमर कर दिया। लैला मजनूँ, रोमियो जूलियट प्रेम के पर्याय बन गए और सबकी जुबान पर चढ़ गए।

आखिर ऑपरेशन मजनूँ ही क्यों ?

आखिर ऐसा क्यों है कि जब कहीं छेड़छाड़ की घटनाओं पर अंकुश लगाने की बात आती है तो देश की पुलिस ऑपरेशन मजनूँ शुरू करती है? लगभग हर राज्य में इसी नाम, से कुछ दिन मिशन चलता है।

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हाँ, विकास के साथ अब सारे नाम अंग्रेजीदां होने लगे हैं तो उत्तर प्रदेश में धमक के साथ आई सरकार ने एंटी रोमियो स्क्वाड बना लिया है। इसका वादा चुनावी रैलियों में भी किया गया था, लेकिन सवाल है कि उस बिचारे रोमियो ने या मजनूँ ने हमारे देश का क्या बिगाड़ा था कि इन काल्पनिक चरित्रों के चरित्र के साथ खिलवाड़ किया जाता है। हाँ, इस बहस में जुलियटों या लैलाओं का जिक्र नहीं होता, न ही होती है फ़िक्र। हाँ, यहाँ यह भी याद रहे कि हम आप जिस रोमियो की कहानी पढ़ कर दुःखी हो जाते हैं उसे शेक्सपियर ने सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार के लिए लिखा था, क्योंकि चर्च का हस्तक्षेप बहुत था और उस समय वहां प्रेम करना अनैतिक कार्य था और प्रेम विवाह के बारे में तो सोचना भी पाप था। मतलब लगभग वैसा ही जैसे अभी हमारे देश की जनता समझती है। प्रेम की वकालत करने वाले यहाँ अल्पसंख्यक हैं। अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं। मजनूँ की कहानी जिस समाज की है वहां भी यह अपराध ही माना जाता है। अब यहीं एक बात ध्यान दिए जाने की है कि मजनूँ का असल नाम कुछ और था और उसे यह नाम जुनूनी मोहब्बत के लिए मिला, जिसका मतलब आप मोहब्बत में कुछ ढीले हो चुके दिमाग वाले के अर्थ में लगा लें। रोमियो का शाब्दिक अर्थ भी सम्मानित नहीं है। दिलफेंक या प्लेबॉय ही है। अब सोचिए दोनों कथाओं को गढ़ने वालों ने अपने नायकों के नाम अनायास ही नहीं तय कर लिए होंगे। इसी नाते इन दोनों नामों को आज भी रखे जाने वाले नामों में मुश्किल से ही पाएंगे। लेकिन यह सच है कि ये अमर प्रेम के प्रतीक हैं। छेड़छाड़ के नहीं।

राधा-कृष्ण का अमर प्रेम

आगे बढ़ते हैं। भारतीय राधा-कृष्ण को लेकर क्या-क्या नहीं लिखा गया है। सूरदास की ठिठोली से लेकर जयदेव के गीतगोविन्दम में दोनों की प्रणय कथा तक। हाँ, धार्मिक नजरिए से देखें तो फ़ारसी सूफियों की लैला से लगायत कृष्णभक्ति धारा में भी प्रेम ईश्वर से जोड़ने का एक माध्यम है। कबीर भी ‘राम मेरे पियु, मैं राम की बहुरिया’ लिख गए हैं। यहाँ उस पर विचार नहीं करना है। यहाँ बात छेड़छाड़ की है।

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जब सूरदास के कृष्ण पहली ब्रज में राधा को देखते हैं, तो संवाद होता हैः

“बूझत स्याम कौन तू गोरी
कहाँ रहत काकी तू बेटी, देखी नहीं कभी ब्रज खोरी
सुनत रहति स्त्रवनि नन्द ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी
तुम्हरे कहाँ चोरि हम लैहें खेलन चलो संग मिलि जोरी
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरई राधिका भोरी।”

यानी कृष्ण पूछते हैं कि तुम कौन और कहाँ की रहने वाली हो। कभी ब्रज की गलियों में तो दिखी नहीं? राधा जवाब देती हैं कि वो सुनती रही हैं कि नन्द का छोरा माखन और दही चुराता रहता है। तब कृष्ण कहते हैं कि हम तुम्हारा क्या चुरा लेंगे। चलो साथ मिल कर खेलते हैं।

सूरदास कहते हैं कि रसिक शिरोमणि प्रभु कृष्ण इस प्रकार राधिका को भरमा लेते हैं।

ऊपर के तीनों प्रसंग किशोरावस्था के प्रेम के बारे में अलग-अलग हिस्सों से लिए गए हैं। चूँकि कृष्ण एक धार्मिक व्यक्तिव हैं, आराध्य हैं फिर भी उनकी पत्नी का नाम उनके साथ न जुड़ कर प्रेमिका का ही नाम जुड़ा रहता है तो इससे समाज के अंतर्मन में प्रेम का स्थान समझने की कोशिश करनी चाहिए। जो प्रेम इतना पूजनीय और प्रभावी है कि गरम दूध कृष्ण पीते हैं और ह्रदय जल जाता है राधिका का, उसी पर इतनी बंदिशें?

जमाना बदलने के साथ कुछ चीजें भी बदली हैं

प्रेम अपनी जगह है और छेड़छाड़ अपनी जगह। दोनों दो बाते हैं। ऊपर से ज़माना बदल गया है और हर रिश्ते के साथ छेड़छाड़ की डिग्री भी बढ़ गयी है। बीएचयू के दिनों की एक बड़ी खूबसूरत याद है। जब हम चार-पांच लड़के गंगा जी में नौका विहार कर रहे थे, उसी दौरान बीच गंगा में लड़कियों से भरी एक नाव नजदीक आती है और उन सबों ने ऐसी कमेंटबाजी शुरू की कि हमारे ग्रुप से वास्तव में एक लड़के को कहना पड़ा था कि ‘आप लोगों के घर में बाप–भाई नहीं हैं क्या’।

हॉस्टल से फैकल्टी साइकिल से जाते हुए लगातार एक सीनियर का घंटी बजाते रहना और फिर यह कहना कि अंगूठे में दर्द शुरू हो गया, लेकिन ‘उसने’ पलट कर नहीं देखा। तमाम बातें हैं। स्कूली दिनों में किशोरावस्था की चुहल भी खूब देखी, जब दोनों पक्ष बराबर के साझेदार होते थे, लेकिन उस समय उग्रता नहीं थी, न ही ऐसी समस्या थी जो आज प्रायः सुनने को मिलती है कि शोहदों के चलते तमाम जगहों पर लड़कियों का स्कूल जाना दूभर हो गया है। हाँ, यूनिवर्सिटी में जूनियर्स का कहना कि भैया हॉस्टल से क्लास रूम तक जाने में रोज भद्दे कमेन्ट सुनने पड़ते हैं, भी याद ही है। उन जूनियर लड़कियों को फिर धीरे-धीरे आदत पड़ गयी और उसे एक कड़वी सच्चाई के रूप में स्वीकार कर लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। तो यह एक उम्र जनित उछाल तो है ही, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है की केवल स्कूली किशोर ही इसमें शामिल हों।

बाल पक जाने के बाद भी दिल के काले तमाम पुरुष हैं, जिनके भीतर यह विकृति है। हाँ, एक बात और। महानगरों का नहीं पता, लेकिन छोटे शहरों और गाँव कस्बों में यह छेड़छाड़ या ठिठोली बहुत संकोच के साथ हुआ करती थी और हर आदमी प्रायः दूसरे के बेटी –बेटे को समझा देना अपना अधिकार समझता था और एक लिहाज युवा पीढ़ी भी करती थी। इस नाते बड़ी समस्या नहीं थी, लेकिन अब तो घर में ही परस्पर लिहाज और मर्यादा का संकट है तो पड़ोसी और गाँव मोहल्ले वालों का कौन करे। अब तो उस सर्किल से वास्ता नहीं। पता नहीं क्या हाल होगा, लेकिन किशोरावस्था में देखा है कि मोहल्ले की लड़की की साइकिल के पीछे कोई अनजान लड़का लगा हो तो भाई लोग रोक कर उस लौंडे का हालचाल भी लेने लगते थे।

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अब आज की हालत देखिए, व्यवहार दो बातों से सुधरता है, संस्कार और अनुशासन। उद्दंडता की इतनी शिकायतें मिलने लगी हैं कि अब समय-समय पर ऑपरेशन मजनूँ चलाए जाते हैं, जिसमें पुलिस का सामना अधिकतर उस उम्र के लड़कों को करना पड़ता है, जिन्हें उससे दूर रहना चाहिए। गर्ल्स कालेजों के पास पुलिस की पहरेदारी कोई नई पहल नहीं है। समय-समय पर ऐसे अभियान चलते ही रहते हैं, लेकिन चुनावी घोषणा के अनुरूप पहली बार हो रहा है। हालाँकि अखिलेश सरकार ने पावर एंजल करके एक अभियान चलाया था। वह कहाँ तक सफल हुआ, नहीं मालूम लेकिन आजकल टीवी और अखबारों में हर शहर में एंटी रोमियो स्क्वाड की धूम दिखाई दे रही है। कई जगह बेवजह बेकसूरों के साथ बत्तमीजी की भी खबरें आ रही हैं। पुलिसकर्मियों को भी अपने जोन के व्हाट्सअप ग्रुप पर गुड वर्क अपलोड करने के मौके धड़ाधड़ मिल रहे हैं। जाहिर है किशोर और युवा सहमे हुए ही होंगे और जिस निर्दोष को वर्दी वालों का थप्पड़ और लाठी इसी उम्र में मिल जाए वह जीवन भर अपमानित महसूस करता रहेगा।

अपने देश में प्रेमियों को कोड़े लगाने की संस्कृति नहीं है

हाँ, सकारात्मक असर भी दिख ही रहा है, लेकिन क्या यह नहीं होना चाहिए की स्कूलों में किशोरों के लिए इस मुद्दे पर कार्यशालाएं होनी चाहिए। जो पुलिस अधिकारी गर्ल्स कालेजों के सामने खड़े हैं, वो बॉयज स्कूलों में जाकर बच्चों को समझाएं। अखबारों में अभिभावकों के नाम से अपील छपवा दें कि आप इस मुद्दे पर घर के युवाओं से बात करें कि समस्या कितनी बड़ी हो गई है की पुलिस को यह सब करना पड़ रहा है। राज्य स्तर पर यह अभियान एक चुनावी वायदे को अमलीजामा पहनाना तो है ही। लड़कियों में शासन पर भरोसा बढ़ेगा ही, लेकिन कहीं भी युवा जोड़ों को देखकर रोक लेना और उनसे भरी भीड़ या थाने ले जाकर पूछताछ करना, कहीं-कहीं इस अभियान में कुछ स्वंभू संगठनों का भी शामिल हो जाना अच्छे लक्षण नहीं हैं। हम इसी प्रकार की पुलिसिंग के लिए तो तालिबान की आलोचना करते रहे हैं, क्योंकि कोड़े लगाने का रिवाज अपने देश में नहीं है, लेकिन टीवी चैनल चेहरे धुंधले करके उन तमाम किशोरों को दिखा रहे हैं, जिन्हें वर्दी वालों के थप्पड़ पड़ रहे हैं। पैरों पर पुलिस लाठी मार रही है।

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बाकी प्रेम का दुश्मन तो ज़माना रहा है, इतिहास रहा है, लेकिन उसे पनपना होता है तो हो ही जाता है। उस पर कहाँ से अंकुश लगेगा। एक जरूरी बात, छेड़छाड़ के लिए भारतीय दंड संहिता में धारा 354 के तहत पहले से ही दंड निर्धारित है और निर्भया एक्ट के बाद इसे और तगड़ा कर दिया गया है। कई कड़े प्रावधान जोड़ दिए गए हैं। अधिकतम 5 साल और गैरजमानती सेक्शन भी हो गए हैं। लड़की की मर्ज़ी के खिलाफ पीछा करना या कान्टेक्ट करने की कोशिश करना भी 354-D के तहत दोषी सिद्ध होने पर 3 साल की कैद वाला अपराध है और पहली बार में जमानती है लेकिन दूसरी बार भी इसी में धरे जाने पर गैर जमानती अपराध है। अलग बात है कि इनका प्रयोग नहीं हो रहा है, वर्ना सड़कों पर बुड्ढे ही दिखने लगेंगे फिर अब तो लड़के गाना भी नहीं गाते की ‘चल चमेली बाग़ में, मेवा खिलाऊंगा’। अब तरीके बदल गए हैं।

हाँ, एंटी रोमियो स्क्वाड के हल्ले में जूलियट्स के बारे में सोचने वाला कोई नहीं, क्योंकि लड़कियों की चुहल उनके अपने बीच ही सिमट गई है और उनका प्रेम करना अभी भी खतरे से खाली नहीं।

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