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Дървени греди за покрив

जागो, ग्राहक जागो

आप से बाज़ार है या बाज़ार से आप? ये अर्थशास्त्र का सवाल नहीं है जो चकरा गए मियाँ, दिमाग की बत्ती जलाईये। पर जलेगी कैसे ,वो तो एक खास कंपनी की चूसक गोंद खाने से जलती है। मामला बड़ा गंभीर हो चला है, बच्चे के पैदा होने से पहले ही बाज़ार उसे  घेर लेता है। टीवी पर अपने बेबी बंप सहलाती हुई मां दावा करती है की उसको अपने होने वाले बेबी का इतना ख्याल है की वो एक खास कंपनी के फ़िल्टर का ही पानी पीती है। जैसे उसको पता ही नहीं की देश में अधिकांश हिस्सों में सुबह से ही पानी भरने की लडाई शुरू हो जाती है। खैर ये बात कभी और सही क्योंकि साफ़ वाटर और लू की बात करें तो दिल इमोशनल हो जाता है। अभी बात आप की हो रही है यानि इण्डिया में रहने वालों की बच्चा बाहर की दुनिया में आता है तो,आज की तारीख में पक्का है उसका पाला फिगर कांशस माँ से पड़ता है।चिंता की कोई बात नहीं,यहाँ तो बेबी  फ़ूड का बहुत बड़ा बाज़ार उसको लपकने के लिए तैयार खड़ा मिलता है।

महीने के हिसाब से मिलता है, पिलाना ही पड़ेगा नहीं तो बेबी हेल्दी कैसे बनेगा। हेल्दी नहीं बनेगा तो डार्विन की थियरी नहीं समझ पायेगा। खुद जंक फ़ूड पर रहने वाली माँ डिब्बा बदल बदल कर प्यार लुटायेगी। हे बेबी,कैसी फिल्म थी,देखी है ? कोई बात नहीं बाज़ार बताता है की बेबी को कैसी नैपी चाहिए। वो भी छोटे बच्चे की बहुत बड़ी जरूरत है। माँ – बाप को चैन से सोना है  तो बच्चे को सोख्ता लगा देते हैं क्योंकि बाज़ार बताता है की फलां कंपनी वाले से उसे बड़ा आराम मिलेगा,वो तो बताने से रहा। हाँ सॉफ्ट स्किन को सॉफ्ट ही रखने के लिए तमाम साबुन ,शैम्पू ,तेल का बाज़ार बच्चे को अपने आगोश में लेलेता है।

डिब्बा से छूटते ही सामने आती है मैगी जिसे सदी के महानायक बताते है की खुशियाँ बढाती है। यूरोप में पता चला है की इसमें वैक्स मिलाते हैं ताकि स्टिकी न हो पर ,टाईम किसके पास है। इस दो मिनट वाले आईटम ने तो ऐसा कब्ज़ा किया है की पूछिए मत, इण्डिया में इतनी  मैगी बिकती होगी जीतनी भारत में बीड़ी नहीं बिकती होगी। स्कूल जाने के पहले,पेंसिल का इस्तेमाल सीखने से पहले ही बच्चे को टीवी के रिमोट की ताकत पता चल जाती है। छोटा भीम और टॉम एंड जेरी  के बीच बाज़ार बच्चे को ऐसा लपकता है की माँ बाप चकरघिन्नी बन जाते है। लेकिन सबसे बड़ा बाज़ार अब आता है सामने, दिमाग और शरीर की ताकत बढ़ाने वाले ड्रिंक्स का। अभी कुछ महीने पहले इंग्लैंड में ऐसी ही एक कंपनी का विज्ञापन आया तो अभिभावक उसके विरोध में उठ खड़े  हुए, उनका कहना था की कोई कंपनी कैसे दावा कर सकती है की उसका पाउडर पीने से बच्चों का दिमाग बढेगा। कंपनी ने माफ़ी मांगी और ये भी कहा की ये विज्ञापन भारत के बाज़ार के लिए था। याद करिए की इम्तहान का मौसम शुरू होते ही बच्चों के लिए विज्ञापन शुरू हो गए थे की ‘इक्जाम का भूत भगाओ ,फलाना डिब्बा का पियो ‘ साथ ही लम्बा,तेज़,मज़बूत बनाने वाले डिब्बे तो हैं ही। बच्चे तो बच्चे ही हैं पर बड़ों के दिमाग की भी बत्ती गुल है।

इंग्लैण्ड की तरह यहाँ खाली कौन बैठा है जो जाए केस करने,यहाँ तो खुद दीवारों पर इश्तेहार पढ़ कर हकीम  साहब का पता खोजने में व्यस्त हैं भाई लोग। बच्चा जैसे जैसे बढ़ता जाता है,बाज़ार के बिछाये जाल में फंसता जाता है। फिर बाज़ार ही तय करता है की वो क्या खाए,क्या पहने। माँ -बाप बेचारे तो नहीं पर इतने ज्यादे गंवार हो चुके रहते हैं कि उनकी सोच पहले ही मर चुकी रहती है। उनकी समझ पर बाज़ार का कब्ज़ा हो चुका रहता है। बिचारे कब्ज़ के मारे चूरन खा कर,सोने चले जाते हैं, डरते -डरते की इस बाज़ार में न जाने कल क्या होगा। पर एक आशा की लहर पडोसी के फुल वाल्यूम टीवी से आती है जिसमें कोई विज्ञापन चल रहा है ‘डर के आगे जीत है’। अब किस चीज का ये विज्ञापन है सब जानते हैं। वही जिसको सलवार पहन कर भागने वाले बाबा बताते हैं की टोयिलेट क्लीनर है और बीबीसी ने एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी की कैसे हरयाणा के किसान खेतों में छिड़काव करते हैं क्यों कि कीटनाशक से सस्ती और असरदार बोतल होती है। लेकिन आप तो नेट पर बैठे है,कहाँ झक मार रहे है? गूगल खोलिए, साईट खोजिये और जा कर शिकायत करिए लम्बा,तेज़ और मजबूत बनाने का फर्जी दावा करने वालों की। आप,आम आदमी कुछ करेंगे ही नहीं तो क्या सब जिम्मा आम आदमी पार्टी का ही है!

आम पकने में अभी बहुत समय है, बाज़ार से जरा लौट कर आता हूँ। कुछ मसाला लेकर, फिर मिलते है।

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