बर्मा के बंगाली यानी रोहिंग्या

इतिहास को समग्रता में पढ़ते रहना चाहिए, क्योंकि उसी की नींव पर हमारा वर्तमान टिका हुआ है लेकिन इसी के साथ वर्तमान की घटनाएँ हमें इतिहास के प्रति भी दुराग्रही बनाती रहती हैं। हम उस दौर में जी रहे हैं जब सारे लोग भयंकर पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं और त्वरित न्याय देने के उन्माद में हैं।

इस दौर में मानवता या विश्व बंधुत्व की बात बेमानी हो चुकी है, क्योंकि इतिहास के साथ ही वर्तमान की घटनाओं ने चिंतन के भी अपने-अपने गुट बना दिए हैं, जहाँ मानवाधिकार की जगह बड़ा मुद्दा है अपनी वाली राजनीति। ऐसे में रोहिंग्या दमन का मुद्दा भी राष्ट्र और धर्म जैसे मामलों में पिस चुका है। लाखों के जीवन का मुद्दा इस विकसित इक्कीसवीं सदी में भी आदिम दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। अतः इस पर आप किसी न्यायपूर्ण निर्णय की आशा किसी भी पक्ष से नहीं कर सकते। नस्लीय और मजहबी आधार पर जैसे दुनिया तमाम समस्याओं से जूझ रही है, वही हाल इसका भी है। और हाँ उस इलाके में तेल भी नहीं है, न ही सामरिक दृष्टि से महाशक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है। जिन्हें दुनिया रोहिंग्या कहती है, उन्हें बर्मा में बंगाली कहा जाता है। इण्डिया से आये हुए और उनका दमन शुरू हुआ अंग्रेजों से आज़ादी के बाद और यह करने वाले खुद को सोशलिस्ट,कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी भी कहते रहे हैं, यानी दुनिया के जितने भी अच्छे-अच्छे वाले वैचारिक वाद हैं, उन सबके अनुयायी।

बर्मा से आए इन रोहिंग्या मुसलमानों का इतिहास भारत से भी जुड़ा है 

बात सही है कि सांस्कृतिक रूप से भारतवर्ष काफी पुराना क्षेत्र है, लेकिन भौगोलिक और राजनैतिक रूप से भारत नाम का राष्ट्र पूर्ण रूप से 1947 के बाद ही अस्तित्व में आया है। किन्तु-परन्तु के बाद भी तथ्यों के आधार पर आप इससे असहमत नहीं हो सकते तो चलिए थोड़ा पीछे चलते हैं। मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने अपने बेटे शाह शुजा को बंगाल और उड़ीसा का गवर्नर बनाया था। शुजा की राजधानी ढाका थी और आज भी उस शहर में बड़ा कटरा नाम से वह खंडहर है, जो शुजा ने अपने रहने के लिए बनवाया था। शाहजहाँ की बिमारी की खबर लगते ही उसके बेटों में सल्तनत पर कब्जे के लिए छटपटाहट शुरू हुई और शाह शुजा दिल्ली की तरफ प्रस्थान करता है, किन्तु एक और दावेदार बड़े भाई दारा शिकोह की फ़ौज से उसकी रास्ते में भिडंत हो जाती है। काफी घमासान के बाद दोनों संधि करते हैं और शुजा फिर वापस बंगाल की तरफ चल देता है, दारा का वायदा रहता है की शुजा काफी रेवेन्यू देने वाले बंगाल पर ही राज करे। ऐसी स्थिति इसलिए आयी क्योंकि दारा ही शाहजहाँ के साथ रहता था और औरंगजेब दक्कन और मुराद गुजरात के गवर्नर थे। ढाका पहुँचने तक शुजा को खबर लगती है कि बादशाह की बिमारी की खबर सुनते ही, मौत की अफवाह भी उडी थी। औरंगजेब भी आगरे की तरफ चल चुका था और उसने सबसे बड़े भाई दारा की फ़ौज को नेस्तनाबूद करके दारा का क़त्ल कर दिया था। वैसे भी दारा सभी भाइयों में सबसे कमजोर लड़ाका माना जाता था। शाह शुजा फिर सल्तनत की राजधानी की तरफ मार्च करता है लेकिन आगरा पहुँचने से पहले ही औरंगजेब की सेना से पराजित हो कर बंगाल की तरफ वापसी करता है। मुग़ल इतिहास के सबसे कुशल लड़ाके औरंगजेब ने शुजा का पीछा नहीं छोड़ा और उसकी फ़ौज शुजा को ढाका से भी खदेड़ने के लिए बंगाल पहुँच गयी। कई मोर्चों पर हार के बाद शुजा ने जान बचाने के लिए सल्तनत की सीमा से भागने का निर्णय लिया। शाह शुजा अपने हजारों सिपाहियों के साथ चिटगाँव के रास्ते श्रीचन्द्र सुधर्मा के राज्य रखाइन में शरण लेता है। वही रखाइन जिसे पुर्तगालियों ने अराकान नाम दिया। वही इलाका जिसके निवासी आज विवाद का मुद्दा हैं। शुजा के साथ उसके ढेरों वफादार सिपाही, हरम की महिलायें और हीरे जवाहरात भी थे। राजा ने वायदा किया था की जवाहरातों के बदले शुजा को मक्का के लिए जहाज दिया जाएगा। हालाँकि, यह नौबत नहीं आई क्योंकि औरंगजेब का दूत वहां तक पहुँच गया था। इतिहास का समग्रता में अध्ययन बहुत रोचक होता है। मणिपुर में इम्फाल के पास शुजा केव है, जिसके बारे में कहा जाता है कि अपने अंतिम समय में शाह शुजा ने वहां के राजा की अनुमति से शरण ली थी। शुजा के साथ के सिपाहियों, सरदारों में से अधिकांश को अराकान के राजा के यहाँ नौकरी मिल गयी थी। शाहजहाँ द्वारा शाह शुजा का डिप्टी नियुक्त किये कुंवर राघव सिंह के इतिहास के बारे में चर्चा करने की यहाँ जरूरत नहीं। हाँ, यह जरूर ध्यान रहे की मुगलों से पहले चिटगांव तक रखाइन के राजा का कब्ज़ा था।

रोहिंग्या समुदाय 12वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस गया

चिटगांव से अराकान की सड़क को अभी भी शुजा रोड ही कहते हैं। इतनी लंबी कहानी बस यह स्पष्ट करने के लिए ही है कि आज बर्मा के जिस इलाके में जो हो रहा है, वहां से भारत का भी पुराना रिश्ता है। रखाइन पाली भाषा के रख्खपुरा का अपभ्रंश है और हाँ राष्ट्रवाद के उभार के साथ इलाके का नाम अरकान की जगह फिर से रखाइन ही कर दिया गया है। राजा श्री चन्द्र सुधर्मा के दरबार में मुसलमान कवियों के होने का भी प्रसंग है, जिनमें से एक अलावल को ‘पंडित कवि’ की उपाधि भी मिली हुई थी और ‘पद्मावती’ उनकी प्रमुख रचना है जो जायसी के ग्रन्थ पर ही आधारित है। लब्बोलुआब यह कि सब कुछ कितना जुड़ा हुआ है आपस में। सांस्कृतिक और राजनैतिक रूप से भी रखाइन प्रांत का बंगाल से लगाव रहा है। अंग्रेजों से पहले ही पुर्तगाली और खुद उस इलाके के शासक बंगाली मजदूरों को उधर लेकर जाते थे। वह इलाका धान की समृद्ध खेती का क्षेत्र रहा है। किसी ज़माने में चावल निर्यात करने का सबसे बड़ा बंदरगाह भी वहीं था। हाँ, ब्रिटश राज के दौरान काफी बड़ी संख्या में बंगाल से उधर लोग गए। कारण चाहे उधर की समृद्धि रही हो या बंगाल के अकाल, इनमें हिन्दू-मुसलमान, दोनों थे। मजदूरों के रूप में अंग्रेज भी हजारों को हांक कर ले गए। साथ ही उस इलाके में कुछ मुसलमान ऐसे भी हैं जिनके पूर्वज सातवीं-आठवीं सदी में ही अरब से आने वाले समुद्री बेड़ों से वहां उतरे। बर्मीज राष्ट्रवाद के उभार के साथ ही दिक्कत शुरू होती है बांग्ला भाषी मुसलमानों को। हालाँकि, इसकी नींव भी अंग्रेजों ने ही डाली थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इस इलाके के बांग्ला भाषियों को अंग्रेजों ने हथियार देने शुरू किये जापानियों के खिलाफ डिफेन्स लाइन तैयार करने के लिए। और जो बौद्धधर्मी थे वो धार्मिक कारणों से जापानियों को अपना हितैषी समझने लगे थे। विश्वयुद्ध की छाया में ही वहां सन 1942 में बौद्धों और रोहिंग्या के बीच भयंकर कत्लेआम हुआ। ध्यान रहे तब बर्मा ब्रिटिश कब्जे में था और बर्मा की लेजिस्लेटिव काउन्सिल में अरकान के मुसलमान भी निर्वाचित होते थे।

जिस समूह से चुने जाते थे सांसद, उनसे छीन लिया गया वोट देने के अधिकार

1948 में बर्मा की आज़ादी के बाद भी उसकी संसद में इस इलाके से रोहिंग्या मुसलमान निर्वाचित हुए थे। यहाँ तक की मुसलमान महिलायें भी सांसद बनीं। हाँ, इनमें एक गुट ऐसा भी था जिसने भारत की आज़ादी की लड़ाई के समय बर्मा मुस्लीम लीग भी बना लिया और वो पाकिस्तान में मिलना चाहते थे। भौगोलिक और धार्मिक कारणों को आधार बनाते हुए इन नेताओं ने जिन्ना को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन जिन्ना अंग्रेजों से एक और मोर्चा नहीं खोलने के पक्ष में नहीं रहे और यह मांग की कोशिश बेकार गयी। यह भी ध्यान रखना चाहिए की इस इलाके ने नेता जी की आजाद हिन्द फौज को भी बढ़ चढ़ कर सहयोग दिया था। हर जगह, हर तरीके के लोग होते हैं। खैर आज़ादी के बाद बनी लोकतान्त्रिक व्यवस्था अधिक दिन तक चल नहीं पायी और चरम राष्ट्रवाद के नारे के साथ सन 1962 में जनरल ने विन के नेतृत्व में फ़ौज ने वहां की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। जनरल द्वारा यह सत्ता पलट अपने आप में अनोखा था, क्योंकि इसे इस तरह अंजाम दिया गया था कि सेना के डिप्टी कमांडर को भी खबर नहीं थी। चूँकि इसमें केवल एक हत्या हुई थी, इसलिए दुनिया की मीडिया ने भी इसे रक्तहीन सत्ता हस्तांतरण ही कहा था। शुरू के बारह साल तक मार्शल लॉ रहा और सैन्य दमन चरम पर था, लेकिन हमारे लिए पाकिस्तान बड़ा मुद्दा है, इसलिए दूसरे बाजू में क्या चल रहा है यह हमारी रूचि का विषय नहीं रहा।

रोचक बात है की जनरल ने सत्ता पर कब्जे के पीछे तर्क दिया की लोकतान्त्रिक ढंग वाली सरकार राष्ट्र को सुरक्षित नहीं रख सकती, क्योंकि चीनी मूल की कुछ जातियां अपने लिए अलग क्षेत्र की मांग कर रही थीं। जनरल को यह भी लगता था की उसकी जमीन पर चीन और अमेरिका टकरा सकते हैं तो सबसे पहले चीन मूल के लोगों को खदेड़ने का कार्यक्रम चला और लगभग दो लाख चीनी खदेड़ दिए गए, उनकी दुकानों और घरों की लूट हुई। जापानियों के लिए लड़ चुके जनरल ने विन का राष्ट्रवादी कद इसलिए भी बड़ा था, क्योंकि वह नामी राष्ट्रवादी जनरल आंग सान का सहयोगी रह चुका था, वही आंग सान जिनकी बिटिया सू की हैं। सत्ता संचालन के लिए एक क्रांतिकारी परिषद् का गठन किया गया, जिसका आधार मार्क्सवाद और बुद्धिज्म को बताया गया, इसमें बंगालियों के लिए जगह नहीं थी। हालांकि, यह आधार पूरी तरह फर्जी ही रहा। मार्क्सवाद की राह पर चलते हुए सबकुछ सरकार के कब्जे में हो गया। स्कूल, कालेज, उद्योग से लगायत किसी भी प्रकार का प्रकाशन भी। हाँ, इस बीच मार्क्सवाद ने थोड़ी और उछाल ली और सरकार ने खुद को पूरी तरह सेक्युलर घोषित करते हुए बुद्ध शासन परिषद को भी अवैध घोषित कर दिया, जो अभी तक ने विन के साथ थी। यह शासन 26 साल चला और बर्मा दुनिया की सबसे बदहाल अर्थव्यवस्था वाले देशों में शुमार हो गया और इस काल का नाम था ‘बर्मीज वे ऑफ़ सोशलिज्म’। यह भी ध्यान रहे कि इस बीच जनरल ने विन राष्ट्रपति के रूप में भी निर्वाचित हो गया था। बढ़ती बेरोजगारी, जनता के असंतोष, यहाँ तक की रोज मर्रा के चावल की भी बढ़ी हुई कीमतों को जनरल राष्ट्रवाद और सशक्त बर्मा का फर्जी नारा देकर दबा रहा था। चीनी भाषा की पढ़ाई और उसके इस्तेमाल पर रोक का आदेश देकर वह बहुसंख्यक आबादी की नजर में शक्तिशाली शासक था। दुनिया की नजर में भी इतना शक्तिशाली की उसने संयुक्त राष्ट्र संघ के महसचिव रहे अपने देश के नागरिक यू थांट का अंतिम संस्कार भी विवाद और छात्रों पर गोली चलाये बिना नहीं होने दिया। अलग बात रही की दुनिया ने उस पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि कम्युनिस्टों का वह अपना था और अमेरिका को कुछ पड़ी नहीं थी, उधर की। यही कारण था की छात्र-मजदूर आंदोलनों के इतिहास में बड़े बड़े आन्दोलन वहां हुए, जिनमें सरकारी गोलियों से सैकड़ों मरे फिर भी हिंदुस्तान क्या, दुनिया के लिए उनका कोई महत्व नहीं।

दुनिया में कहीं के नागरिक नहीं रहे रोहिंग्या

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय भी एक बहुत बड़ी आबादी बर्मा में शरण लेने घुसती है, जैसा कि किसी भी कनफ्लिक्ट जोन में होता ही है। श्रीलंका से भागे तमिलों की तरह या मध्य एशिया से भाग रहे मुसलमानों की तरह। यह सच है की उधर की आबादी के लिए रखाइन की तरफ भागना आसान था। जनरल विन ने सन 1978 में ऑपरेशन किंग ड्रैगन शुरू किया, जिसका मकसद बताया गया की यह बंगलादेश से आये घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए है। कहा जाता है कि भाषा के आधार पर लगभग ढाई तीन लाख लोगों को बांग्लादेश की सीमा में खदेड़ दिया गया। उनकी बस्तियां फौजियों ने फूंक दी। बांग्लादेश ने इन्हें शरण दी और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने उन्हें शरणार्थी का दर्ज़ा देते हुए राहत कार्यक्रम शुरू किये। फिर आता है 1982 का ‘म्यांमार नेशनलटी लॉ’, जिससे अब रखाइन के बांग्ला भाषियों का दुर्दिन शुरू हुआ। 135 जातीय समूहों को बर्मा का मूल निवासी मानते हुए बांग्ला भाषी या रोहिंग्याओं की नागरिकता ही समाप्त कर दी गयी, यानी आज़ादी के समय जिस समूह से सांसद भी चुने जाते थे, वह अब वोट देने के अधिकार से ही वंचित कर दिया गया। वो दुनिया में कहीं के नागरिक नहीं रहे। आधुनिक युग में लाखों लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार बड़ी घटना थी, जिस पर दुनिया मौन रही। फर्जी कम्युनिस्ट मिलट्री शासन से लड़ने के नाम पर शांति का नोबल पा चुकीं सू की भी इस मामले पर खामोश ही हैं, जबकि ने विन उनके पिता का सहयोगी रह चुका था। ऊपर से रखाइन प्रांत में हर बंगाली परिवार के लिए मिलट्री-सरकारी कार्यों में प्रतिदिन की बेगारी अनिवार्य कर दी गयी जबकि उन्हें किसी भी तरह की सरकारी सेवाओं-सुविधाओं से वंचित कर दिया गया। यह मध्य युग की नहीं, इसी युग की बात है।

timthumb

म्यांमार से बड़ी तादाद में खदेड़े जा रहे रोहिंग्या मुसलमान छोटी-छोटी नावों में भरकर समुद्र के रास्ते आ रहे हैं।

इस लॉ के पास होने के साल भर पहले ने विन इस्तीफ़ा देकर अपनी कठपुतली लोकतान्त्रिक सरकार बना चुका और सन 88 तक अप्रत्यक्ष रूप से उसी का शासन रहा जब उसने आधिकारिक रूप से संन्यास ले लिया, लेकिन अपने विदाई भाषण में बोल गया की ‘फ़ौज हवा में गोली नहीं चलाती इसलिए सभी निवासियों को कायदे से रहना चाहिए’। हाँ, यह जरूर रहा की बर्मीज चाइनीज लोगों को देश से खदेड़ने के बाद उसने बंगालियों को खदेड़ने का मुद्दा राष्ट्रवाद से जोड़ कर आने वाली सरकारों पर छोड़ दिया था जो अब आसान इसलिए भी हो गया था कि ये वहां के नागरिक ही नहीं रहे। रोचक बात यह भी है कि दुनिया भर में साम्यवाद के पतन के साथ ही बर्मा में भी सोशलिस्ट काउन्सिल का राज 88 में ख़तम होता है, क्योंकि मार्क्सवाद के खिलाफ जनता सड़क पर आती है, हजारों मौतें होती हैं। सूकी बड़ी नेता के रूप में उभरती हैं, लेकिन सत्ता पर कब्ज़ा फ़ौज का ही रहता है। फ़ौज आम चुनाव करवाती है जिसमें सूकी की पार्टी को बहुमत मिलता है और सूकी हाउस अरेस्ट कर ली जाती हैं, जिनकी रिहाई 2010 में हो सकी फिर भी बंगालियों का मुद्दा अपनी जगह ही रहा। सेना बौद्ध आबादी को बचे-खुचे चीनी मूल के और ढेर सारे बंगाली मूल के लोगों के विरुद्ध भड़का कर दंगे करवाती रही।

बर्मा में बौद्ध बहुसंख्यक हैं, जहां बहुत से लोग रोहिंग्या को अवैध प्रवासी मानते हैं

हाल का सबसे बड़ा उपद्रव रहा सन 2012 में जब रोहिंग्या और बौद्धों के बीच झड़प शुरू हुई, यह वास्तव में बहुत भयानक संघर्ष था, जिसकी शुरुआत एक बलात्कार और हत्या की खबर से हुई थी, जिसमें पीड़ित और आरोपी दो अलग समुदायों से होने की खबर फैली।

हालाँकि, बाजार से खरीददारी करके लौट रही बौद्ध महिला के पोस्टमार्टम में सरकारी डॉक्टर ने बलात्कार की पुष्टि नहीं की और तीन आरोपियों में दो बंगालियों के साथ एक बौद्ध भी था। सामान्य स्थिति में जो एक आपराधिक घटना मात्र के रूप में दर्ज होती है, वह संक्रमण और परस्पर अविश्वास के दौर में भयानक रूप ले लेती है, इस बात से हम भारतवासी बढ़िया से परिचित हैं।

कट्टरपंथी बौद्ध संगठनों और कट्टरपंथी रोहिंग्या मुसलमानों के बीच कई बार खूनी झड़प हो चुकी है

रखाइन प्रांत में पहले केवल बौद्धों एवं बंगालियों के बीच झड़प होती है जो बाद में बौद्धों एवं अन्य मुसलमानों की झड़प में बदल जाती है। यह वही घटना थी जिसके विरोध में बम्बई के आज़ाद मैदान का दृश्य याद आता है। सोशल मीडिया ने बर्मा में भी खूब आग लगाई और घर जल गए। स्थिति इतनी भयानक हो गयी कि रखाइन प्रांत में आपातकाल लगा दिया गया, सरकार ने दंगे भड़काने के आरोप में यूएन मानवाधिकार परिषद के दस कर्मचारियों को भी गिरफ्तार किया, जिन्हें छुडवाने के लिए खुद यूएन कमिश्नर रंगून पहुँचते हैं, जिनसे वहां की सरकार ने कहा की पहले कम से कम एक लाख बंगालियों को बांग्लादेश या कहीं और ले जायें तब रिहाई होगी। इस बात पर सहमति नहीं बन सकी और ऊपर से हिंसाग्रस्त इलाकों में राहत कार्यों के लिए पहुँची विदेशी संस्थाओं को कह दिया गया की मुसलमानों की कोई मदद न करें। इस दौर में प्राकृतिक आपदाओं और कई दूसरी जगहों की तस्वीरों को कहीं बौद्धों का तो कहीं बंगालियों का अत्याचार बता कर खूब प्रसारित किया गया और फेक न्यूज़ से आग भड़काने की यह पहली बहुत ही बड़ी घटना रही, जिसका असर अभी तक है क्योंकि दोनों समुदायों के बीच अब एका होने की कोई संभावना नहीं दिखती।

ज्यादातर रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश, भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड में शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं

फिर भी सच यही है की सेना और आम बौद्धों की दोहरी मार बंगालियों पर पड़ी और भारी मात्रा में उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। बहुत बड़ी आबादी जान बचाने के लिए बांग्लादेश की तरफ भागी और वहां से होते हुए भारत में भी आई। अंतर्राष्ट्रीय दबाव में बर्मा की सरकार ने जो राहत शिविर लगाए वह भी बांग्लादेश की सीमा के नजदीक बाड़े बनाकर, यहाँ भी इस बात का ध्यान रखा गया की बांग्लादेश की तरफ जो भागना चाहें उन्हें जाने दिया जाए। इसके अलावा खुद रात के समय रखाइन और बांग्लादेश के बीच की नाफ नदी के सहारे भागने वाले बंगालियों की कमी नहीं, जिन्हें वापस खदेड़ने के लिए बांग्ला सेना तैयार रहती है। लगातार चलने वाला यह सिलसिला इस अगस्त में और तेजी पकड़ता है जब बर्मा सरकार के मुताबिक रोहंगिया आतंकी संगठन ने पुलिस पोस्ट पर हमला करके कुछ जवानों की जान ले ली। इस घटना के बाद से सरकार का दमन बहुत बढ़ गया और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रपट के मुताबिक फौजी लोग बौद्धों के साथ मिलकर बंगालियों की बस्तियां फूँक रहे हैं और बौद्ध इनके खिलाफ रैलियां कर रहे हैं। पाकिस्तान में जन्मे और फिर सउदिया में बस गए रोहिंग्या अता उल्लाह को हरकत-अल-यकीन नाम के एक आतंकी संगठन का मुखिया माना जाता है। इसके अतिरिक्त रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी भी है और कुछ छोटे गुट हैं जिनके बारे में बर्मा सरकार कहती है की तालिबानियों से लगायत अल कायदा तक से उनके सम्पर्क हैं और ये बर्मा में अलग इस्लामिक राज्य के लिए लड़ रहे हैं। सरकार के मुताबिक़ इन गुटों की गतिविधियों के चलते ही बर्मा की फ़ौज रखाइन में केवल ‘आतंक निरोधक अभियान’ चला रही है।

ढाई लाख से अधिक रोहिंग्या बांग्लादेश में प्रवेश कर चुके हैं

आतंक और आतंक के खिलाफ अभियान, दोनों बहुत मुनाफे का धंधा है जिसमें दोनों पक्ष मजे में रहते हैं और पिसती है जनता। मुस्लिमों के साथ हिन्दू बंगाली भी चपेट में हैं ही, लेकिन जिस तरह मध्य एशिया से भाग रहे लोगों के पास कुछ कागजात तो हैं कि वो कहाँ के हैं, उस तरह का कोई कागज इन बंगालियों के पास नहीं है। यह सच है की फ़ौज आतंक के दमन के नाम पर उन गरीबों का दमन कर रही है, जो खुद ही पीड़ित हैं और फिलहाल तो आतंकी नहीं ही हैं। दुनिया इसे अपने अपने हिसाब से देख रही है। आंग सान सूकी इसे आतंक के खिलाफ अभियान बता रही हैं, तो दूसरी नोबल विजेता मलाला उन्हें शांति का मतलब समझा रही हैं। पलटवार करते हुए तमाम लोग खुद अपने देश में बलूचों की हालत देखने की सलाह मलाला को दे रहे हैं। बर्मा के लिए राहत की बात है की चीन उसके साथ मजबूती से खड़ा है और कम्युनिस्ट अखबार लिख रहे हैं की मलाला को बर्मा की जमीनी हकीकत एकदम मालूम नहीं है, सरकार अपना काम ठीक कर रही है, ठीक यही बात तो सूकी भी कह ही रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से शरणार्थियों के लिए कुछ कानून हैं, लेकिन यह संगठन भी बर्मा के बंगालियों के लिए कानूनी रूप से क्या कर सकता है, जब उनके पास कहीं की नागरिकता के प्रमाण ही नहीं हैं। सिर्फ इसी अगस्त से ढाई लाख से अधिक रोहिंग्या बांग्लादेश में प्रवेश कर चुके हैं। बर्मा तथा बांग्लादेश के बीच इनको लेकर विवाद काफी पुराना है जो अनेक बैठकों के बाद बस इसलिए नहीं सुलझ पा रहा की बर्मा उन्हें बंगाली मानता है और ढाका उन्हें अपना नागरिक मानने को तैयार नहीं। ऊपर से अब बांग्लादेश बर्मा के साथ मिलकर रोहिंग्या आतंक के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान की बात चला रहा है और चाहता है की रखाइन में स्थिति शांतिपूर्ण हो जाए ताकि उसके देश में शरण लिए हुए रोहिंग्या वापस लौटें, यह दूसरी शर्त बर्मा को स्वीकार नहीं।

myanmar-budhist-govt-forcing-the-rohingya-muslim-population-to-leave-the-country

भारत की स्थिति – भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान

मनमोहन सिंह की सेक्युलर सरकार ने 2012 के बाद के दंगों और उसके पहले भी आये रोहिंग्या शरणार्थियों के हित में कोई नीति नहीं बनायी तो हिन्दू जनभावनाओं वाली मोदी सरकार से भी इस मसले में कोई सार्थक अपेक्षा करना बेमानी है क्योंकि पीड़ित मुसलमान भी हैं, कड़वी है लेकिन यही सच्चाई है। इन बंगालियों के पास भले ही कोई शरणार्थी पहचान पत्र न हो, लेकिन दुनिया के भ्रष्ट देशों में शुमार भारत में इनमें से कुछ के पास भी आधार और पैनकार्ड पहुँच जाना कोई अचरज वाली बात नहीं। तमिलनाडु से अंग्रेज हजारों तमिलों को चाय, काफी और रबड़ के बागानों में काम करने के लिए बंधुआ मजदूर बना कर दो सौ साल पहले श्री लंका ले जाना शुरू किये थे। श्री लंका की आजादी के लम्बे समय बाद भी तमिल अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहे जिसका चरम कभी दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी संगठन लिट्टे के रूप में आया। उस चरम अवस्था में जारी संघर्ष के दौरान सन 1983 से 87 के बीच ही डेढ़ लाख से अधिक तमिल शरणार्थी भारत आये जिनके लिए विशेष राहत शिविर लगाए गए। अभी भी तमिनाडु में सौ से अधिक ऐसे शिविर हैं जहाँ अमानवीय स्थिति में ये अपनी ‘मूल धरती’ पर रह रहे हैं जिन्हें प्रति परिवार बीस किलो चावल और हजार रूपये महीने की सहायता भारत सरकार से मिलती है और विदेशी एजेंसियों की मदद अलग। अपनी मौत से पहले वाले चुनाव के दौरान जय ललिता ने इनके संसद लिए दोहरी नागरिकता का कानून पास करवाने का वादा किया था। उस राज्य की राजनीति में इनका मुद्दा इतना स्थान रखता है की भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह श्रीलंका में हुए कामनवेल्थ सम्मेलन में इसलिए नहीं जा पाए थे की तमिल संगठनों ने भारी विरोध किया था। यह चुनावी राजनीति में झुक जाने की शर्मनाक स्थिति थी अगर तमिल सामूहिकता की बात करें तो  राजीव गांधी की हत्या भी तो तमिलों का ही कृत्य थी।

चीन से हमारे रिश्ते बिगड़ने का मुख्य कारण दलाई लामा को शरण दिया जाना ही रहा है। तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद सीआईए ने कुछ तिब्बती नागरिकों को प्रशिक्षित करके वहां विद्रोह करवाने का लम्बा मिशन चलाया जिसके लिए पाक अधिकृत कश्मीर और अब बांग्लादेश वाले हिस्से में कुछ स्थान चुने गए थे। भारत ने ऐसे किसी भी मिशन के लिए अपनी जमीन देने से इंकार कर दिया था और पाकिस्तान के साथ शुरू में अमेरिकी लगाव का यही प्रमुख कारण बना। कुछ ही वर्षों के बाद सीआईए ने मिशन बंद कर दिया यह नोट लिखते हुए की तिब्बती दुनिया की सबसे डरपोक और नाकारा नस्ल है, इनका कुछ नहीं हो सकता। इस नाते पूँजी और श्रम लगाना व्यर्थ है। अब यहाँ बौद्ध धर्म को बीच में मत लाइयेगा, क्योंकि बर्मा में बौद्ध ही लड़ रहे हैं और लिट्टे से लड़ने वालों में भी ये रहे हैं। अब भारत में देख लीजिये, लगभग हर बड़े शहर में तिब्बती मार्केट है। इन शरणार्थियों को अंतर्राष्ट्रीय मदद के रूप में राशन मिलता है और इनके बगल में लगी हिन्दुस्तानी की दुकान से आप सामान भी नहीं लेते हैं। चूंकि इनका खर्च शरणार्थी आयोग, विदेशी एजेंसियों के जिम्मे है इस नाते ये नागरिकता का अधिकार न होते हुए भी आराम से जिंदगी जी रहे हैं और तमाम हिन्दुस्तानियों से अच्छी हालत में जी रहे हैं। खासकर भारत में ही पैदा हुई नयी पीढ़ी। दुनिया भर में इनके लिए जगहें निर्धारित हैं। बस चीन और इस्लामिक मुल्कों को छोड़ कर। यह लिखने का मतलब इनकी निंदा नहीं, वरन यह कहना है इसी तरह बर्मा के बंगालियों को आधिकारिक रूप से शरण देने में अड़चन यह है कि वो मुसलमान भी हैं, कड़वा लेकिन सच यही है। हाँ, यह दिक्कत अफगानी मुसलमानों को शरण देने में क्यों नहीं है। थोड़े से ही सही, लेकिन देश में वो भी हैं, इसपर आप अध्ययन करिए।

wh_53170590

म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों पर हमलों के विरोध में उतरे भारतीय मुस्लिम

बांग्लादेश से नार्थ ईस्ट की तरफ भागे हुए चकमा और हाजोंग शरणार्थियों के लिए इसी साल सरकार ने नागरिकता पर विचार करने का विचार किया है, इनकी संख्या लाखों में है जिनमें चकमा हिन्दू और हाजोंग बौद्ध होते हैं। राज्य सरकारें और तमाम संगठन ऐसे किसी भी प्रयास का लम्बे समय से विरोध करते रहे हैं, क्योंकि उनका जनजातीय ढांचा गड़बड़ होने का अंदेशा है। इसके जवाब में गृह राज्य मंत्री किरण रिजूजू ने कहा था कि नागरिकता की शर्तों में इन्हें एसटी का दर्ज़ा और जमीन खरीदने का अधिकार नहीं रहेगा। पिछले साल जब सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें नागरिकता पर विचार करने को सरकार से कहा भर था तो अरुणाचल के छात्र संगठनों ने काफी उत्पात किया था। राजीव गाँधी के समय असम का विवाद भी बंगलादेशी शरणार्थियों के मुद्दे पर ही हुआ था। जाति-माटी-बेटी के नारे के साथ असाम में सरकार बनाने वाली भाजपा ने जब पिछले साल शरणार्थियों के मुद्दे पर कुछ उदार होने का रुख दिखाया तो माहौल गरम हो गया, क्योंकि राजीव गाँधी ने जो असम समझौता किया था, उसमें एक महत्वपूर्ण शर्त पर उन्हें झुकना पड़ा था जो थी की मार्च 1971 के बाद वर्तमान बांग्लादेश की तरफ से आये किसी व्यक्ति की असाम में नागरिकता नहीं जी सकती, वह चाहे हिन्दू हो या मुसलमान।

रोहिंग्या मुसलमानों को शरण नहीं देना चाहता भारत

सी परिस्थिति में भारत सरकार जो खुद अपने आम नागरिकों तक मूलभूत सुविधाएँ पहुँचाने के लिए संघर्ष कर रही है, रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए क्या कर सकती है ? अदालत भी इस पर क्या कर सकती है। वैसे सुना है अदालतें भी जनभावनाओं का ध्यान कभी कभी रखती हैं। ऐसे में मानवीय मूल्यों की बात करें तो पीड़ित-वंचितों को शरण देना कहीं से भी गलत कदम नहीं होगा, भाषा के आधार पर ही बंगालियों का नरसंहार करने वाला पाकिस्तान भी अब बर्मा के बंगालियों के लिए घड़ियाली आँसू बहा रहा है। पेट्रो डालर की बुलंद इमारत पर खड़े खाड़ी के कुछ देश भी मानवता दिखाने का ढोंग रच रहे हैं। कहने को तो मक्का में ही हाजियों के लिए बने तम्बुओं के शहर अभी खाली हैं, लेकिन वहीं बगल में यमन में कालरा से लाखों तड़प रहे हैं। कम से कम संयुक्त राष्ट्र संघ को ही इस मानव जनित त्रासदी पर किसी सामूहिक निर्णय पर पहुंचना चाहिए, लेकिन वह संभव इसलिए नहीं लगता, क्योंकि चीन और भारत बर्मा के साथ एक साथ खड़े मिलेंगे। शाह शुजा से लगायत दलाई लामा की लम्बी कहानी के बावजूद। शायद रोहिंग्या इस नए दौर में भी वो पीड़ित हैं, जिनका कागज़ पर कोई देश नहीं और सरकारें कागज़ देखती हैं।

It's only fair to share...Email this to someoneShare on FacebookShare on Google+Tweet about this on TwitterShare on LinkedIn

Facebook Comments