गाय पर निबंध

मनुष्य जब पशु जीवन से मनुष्यता की तरफ अग्रसर हुआ तो उसकी पुरानी बिरादरी के कुछ प्राणी भी सामाजिक जीवन में साथ आए जिनमें कुत्ते, घोड़े, गधे और ऊँट तो थे ही लेकिन गाय का साथ होना एक अलग घटना थी। लुटेरों को छोड़ दिया जाए तो अन्य समुदायों के लिए बाकी जानवरों से अधिक महत्त्व गाय का था क्योंकि दूध मिलता था और खेत जोतने के लिए बैल भी उपलब्ध होने लगे। व्यावसायिक जीवन शुरू करने से पहले ही गाय आर्थिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गयी।

अरब क्षेत्रों में भले ही घोड़े और ऊँट खोले जाते रहे हों लेकिन आर्याव्रत में गाय का स्थान बहुत ऊपर था, वैदिक काल में बड़े योद्धा वही माने जाते थे तो दूसरे समूह की जितनी अधिक गायें हांक ले जाएँ। गायों के लिए ही होने वाले ऐसे युद्धों के लिए लोग अच्छी खासी तैयारी करते थे, तब से गाय बहुत समय तक आर्थिक तंत्र का आधार थी आजकल एकाएक देश में दंगे और सामुदायिक वैमनस्य फैलाने का एक बहुत ही महत्वपूर्ण यंत्र बन गई है।

राष्ट्रीय पशु गणना के हिसाब से इस समय देश में गायों की आबादी बहुत तेजी से गिरी है और एक गौ पूजक देश में यह कुछ लोगों के लिए एक शर्मनाक घटना हो सकती है लेकिन सच यही है कि भारतीय नस्ल की गायें समय के मार की शिकार होती गई और किसी गौ सेवक का ध्यान इधर नहीं गया, यहाँ तक की कभी गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह के साथ लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी या फिर आजकल गौ भक्त बनी फिर रही भारतीय जनता पार्टी के कैडर को कभी ख्याल आया कि लुप्त हो रही देशी गायों को बचाने के लिए कुछ करना चाहिए। अब समाप्त हो रही भारतीय नस्लों का मुद्दा समझने के लिए डार्विन के सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट के सिद्धांत को समझने की जरूरत नहीं है, पहले से ही हमारी गायों को टी–कप काऊ कहा जाता रहा है यानी केवल चाय के दूध भर के काम की। अब इतना कम दूध देने वाली गायों को पाले कौन? ऊपर से गांवों के चारागाह स्थानीय स्वशासन की भेंट चढ़ते गए और प्रधान जी की अनुकम्पा पर उनके ख़ास लोगों का नाम उनपर दर्ज होता गया ऐसे में कौन पाले गाय? आबादी बढ़ती गई और खेत कम होने लगे, जो बड़े किसान भी अपने खेत का एक हिस्सा हरे चारे के लिए छोड़ कर रखते थे उनमें कैश क्रॉप यानी सब्जियां लगाई जाने लगीं, गायों को चराने वाले भी कम होने लगे। ठीक इसी वक्त देश में होती श्वेत क्रान्ति जिसमें हिन्दुस्तानी गायें अपनी जगह खो देती हैं और इस क्रान्ति का वाहक बनती है भैंस। हाँ उस वक्त देश में विदेशी नस्लों की यानी जर्सी और फ्रेजियन नस्ल की गायें आने लगीं जो एक बार में पंद्रह से बीस लीटर दूध मरी हालत में भी देने वाली थीं।

विदेशी नस्ल की गायों के बारे में कहा जाता था कि ये जिस देश की हैं वहां इनका दूध बीस लीटर से कम होने लगता है तो कत्लखाने में भेज दी जाती हैं। यानी उनकी गायें हमारी गायों से कई गुना अधिक दूध देनी वाली और माता वाला कोई इमोशनल या धार्मिक लगाव भी नहीं। एक बार जर्मनी की कुछ शोध छात्राएं काशी भ्रमण पर आई थीं। घूमते-घामते उनकी टीम शहर के बेहद करीब मेरे गाँव तक भी आ गई। उन गोरी महिलाओं के पीछे अगल–बगल के गाँवों के बच्चे भी हुजूम बना कर चल रहे थे जैसे कहीं से भटक के आ गए सांड या भैंसे को गाँव की सरहद पार कराने के लिए हांका लगा करता था। भारत भ्रमण पर निकली उन ‘अंग्रेजिनों’ को अब तक ऐसे रिसेप्शन की आदत पड़ चुकी थी। जब वो सब मेरे दरवाजे पर पहुंची तो वहां उपस्थित घर के बुजुर्गों को लगा कि जनानियों से क्या बात करना, ऊपर से कुछ के कपड़े भी बड़े अजीब से थे, कहें तो इन्डियन कोड के खिलाफ। हालाँकि सबने पैजामा और टॉप के ऊपर कुछ दुपट्टे जैसा लेने की कोशिश की थी जैसा की उनकी इण्डिया गाइड बुक में लिखा रहता है। वो सब आंगन में आ गई जहाँ उनकी काफी खातिरदारी की गई चाय और कम मिर्च वाली पकौड़ी के साथ। हालाँकि उनको हलकी ठंढ के मौसम में भी पसीना होने लगा। घर की महिलायें अंग्रेजों के मुँह से हिंदी सुनकर बहुत कौतूहल से बात कर रही थीं। दोनों पार्टियों की जिज्ञासा शांत हो रही थी अचानक मेरी बड़ी माँ ने पूछ लिया कि आप लोग गाय भी खाती हैं? एकाएक माहौल बदलता दिखने लगा तभी जवाब मिला कि यह पूरी सफ़ेद वाली होली मदर गाय काऊ नहीं खाते, हम लोग लाल और काली गाय खाते हैं और बहुत पहले से हमारे देश में लोग खा रहे हैं और इसमें बुरा क्या है? गाय तो गाय, काली हो या सफ़ेद, इतना काफी था और आँगन से महिलायें छंटने लगीं ऊपर से परिवार के ही एक बालक ने कह दिया कि निपट के ये सब धोती भी नहीं हैं और बस कागज़ से पोंछ लेती हैं। अब तो यात्री समूह का आँगन में रूकना भारी पड़ने लगा और किसी बहाने से उनको बाहर भेजा गया। घर में खुसर फुसर होने लगी कि अब घर भी अपवित्र हो गया जिसकी शुद्धि करनी पड़ेगी। एक सामूहिक चर्चा चली की गाँव के मियां टोला में भी कोई कभी गाय नहीं पकाता, बाहर खाता हो तो पता नहीं लेकिन ये अंग्रेजिन सब तो खुलेआम कह रही हैं कि गाय खाती हैं।

परिवार के ही एक व्यक्ति जो वामपंथी रुझान वाले विद्रोही थे, कहने लगे कि घर की महिलाओं को झिड़कने की ज़रुरत क्या है, वो कह रही हैं कि बहुत पहले से उनके देश में गाय खायी जाती है तो आप लोग मुँह क्यों बिचका रही हैं, गाय तो हमारे देश में भी खायी जाती थी। बहुत पुराने जमाने में हिन्दू लोग गाय खाते थे और किसी मेहमान के आने पर बछड़ा काटना बहुत इज्जत की बात समझी जाती थी, ऐसा वेद में लिखा है। अभी उनकी बात ख़त्म नहीं हुई थी कि तब तक बड़े बाबूजी जो पीछे आ चुके थे झल्लाते हुए बोले – ई सब तोरे कार्ल मार्क्स के बेद में लिखा है का? औरतों के साथ हरमजदगी मत बतियाओ, बाहर जाओ। बेद में लिखा है गाय खाने को? बात बढ़ते देख महिलायें अपने-अपने काम में बिजी होने का बहाना करने लगीं, गायों का इस बहस से कोई लेना देना नहीं। कोई गाय खाय या बकरी लेकिन उसके चक्कर में घर की शान्ति को क्यों भंग किया जाए? लेकिन गाय एक संवेदनशील मसला तो है ही, एक उपयोगी जानवर से बवाल के औजार तक की गाय की यात्रा में कोई यह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि कैसे विदेशी नस्लों ने देश में इतनी पैठ बना ली और किनारे लग गई परम्परागत वाली गौ माता। हृष्ट पुष्ट देशी गायें अब या तो कैलेंडर में ही दिखती हैं या किसी बाबा जी के गौशाला में कुछ एक, जिनका दूध बाबा जी के काम आता है और बाकी जगत जर्सी गायों के हवाले। जब से ट्रैक्टरों का चलन बढ़ने लगा तभी बैलों का भी महत्व कम होना शुरू हो गया था और अब तो आम किसान दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है, खेत जोतने की ताकत रखने वाले बैलों को वहां कहाँ से खुराक जुटायेगा?

विदेशी नस्ल की गायें जब देश में आयीं तो उनके बारे में तमाम किस्से चलते थे कि कितने नखरे वाली होती हैं, जहाँ वो रहती हैं वहां हमेशा साफ़ सफाई चाहिए, एक आदमी को चौबीसों घंटे देखना होगा कि गोबर होते ही उसे साफ़ करे। कूलर या एसी भी चाहिए क्योंकि उनसे इधर की गर्मी बर्दाश्त नहीं हो पाती लेकिन धीरे-धीरे उनका ऐसा हिंदुस्तानीकरण हुआ की पूछिए मत, अब बस वही हैं। हाँ उनके बछड़े भी बेकार होते हैं क्योंकि वो खेतों में चल भी नहीं सकते, उनमें जान नहीं होती कि वो हल खींच सकें। इसका कारण था कि जिस इलाके में उनकी जड़ थी वहां काफी पहले से ही मशीनीकरण हो गया था और खेती बैलों पर निर्भर नहीं थी। हाँ अब तक देशी गायों के भी बछड़े होने पर घर में खुशी नहीं होती थी क्योंकि सबको पता था कि उनका जीवन कसाई के लिए ही बना है और बड़े दुःख के साथ सनातनी हिन्दू लोग भी गौ माता के पुत्र को अपने घर के दरवाज़े के खूंटे से बेदखल करने लगे थे, यही हाल जर्सी के बछड़ों का भी होना तय था, भैंस तो पहले से ही उपेक्षित थी क्योंकि उसके कटड़े भी केवल कसाइयों के लिए ही पैदा होते हैं। देश के कुछ हिस्सों में भले ही बुग्गी में भैंसे जोते जाते रहे हों लेकिन बदलते समय में वो केवल बीफ एक्सपोर्ट में भारत की रैंकिंग बरक़रार रखने के लिए ही हैं। जी हाँ बीफ एक्सपोर्ट में हम पहले नंबर पर हैं तो भैंस के दम पर ही क्योंकि गौ वध तो देश के तमाम इलाकों में आज़ादी के पहले से ही अपराध है और कानून के अलावा हिन्दू जीवन में गाय का महत्व देखते हुए भी मुसलमान इस मुद्दे को संजीदगी से लेते हैं। अब लालू जी का वो बयान कि मांस खाने वाले को क्या फरक पड़ता है कि वो गाय का है या बकरे का, एक मामले में तो पूरी तरह सही है कि जब गाय माता है तो बाकी सब भी तो कुछ न कुछ तो लगने ही चाहिए, लेकिन गाय और सूअर के मामले में देश कुछ अधिक ही सजग है। आज़ादी की लड़ाई के समय से ही गाय और सुअर मंदिर और मस्जिद के लिए भी बहुत काम के जीव बन गए हैं और उसका कोई समाजशास्त्रीय अध्ययन करने की जरूरत भी नहीं है। साफ़ है कि जीवित जाग्रत प्राणियों से घृणा के लिए निरीह पशुओं का सहारा लिया जा रहा है। मादाओं में दूध उनके नवजात के लिए बनता है लेकिन निरीह जानवरों को मनुष्य ने वश में किया और गाँधी जी जैसे संत को भी बकरी का दूध निचोड़ लेने में झिझक नहीं आई और वो अहिंसा के चैम्पियन कहलाए। कभी गौर से देखिये जब कोई गाय दुह रहा हो तो पहले बच्चे को थोड़ी देर उसके थन के पास ही छोड़ते हैं ताकि माँ का दूध उतरने लगे,उसके बाद बच्चा वहां से जबरदस्ती खींच लिया जाता है और फिर गौ माता का दोहन होता है। चूँकि माता की जुबान इंसान को समझ नहीं आती इसलिए दुहने वाले को पता भी नहीं चल पाता की उसकी माता के मन में क्या चल रहा है।

अब तो बहुत बड़ी आबादी के पास न जमीन है न ही समय की गौ माता के लिए एक खूंटा किसी कोने में जमाए। जो लोग गाँव से दूर हैं उन्हें तो पता भी नहीं होगा कि भूंसा क्या हिसाब मिलता है, फसल सबकी ऐसी नहीं होती कि घर से ही भूंसा निकल जाए इसके चलते ग्रामीण इलाके के गौ पालकों को भी गाय पालना काफी महंगा पड़ रहा है। ऐसे में विदेश माताएं ही काम आती हैं। पुराने ज़माने में जब गाँव में दुधारू पशुओं की कमी नहीं थी तो बाजार में मिल्क प्रोडक्ट के नाम पर दो –चार वैराइटी की ही मिठाइयाँ मिला करती थीं। अब जब पशु ख़त्म होते गए तो एक दुकान में ही पचास से अधिक किस्म की मिठाई है, चाकलेट और कैंडी अलग। क्रीम और चीज–पनीर का व्यवसाय अलग। आबादी बढ़ने से शहरों में दूध की जबरदस्त मांग क्योंकि दूध स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है? फिर आता कहाँ से है इतना दूध? विदेशी माताओं से ही न? बाकी कुछ कमी केमिकल से पूरी हो जाती है, मिलावटी दूध पीने से शरीर धीरे-धीरे कमजोर ही होता है क्योंकि अंदर विष जमा होता रहता है लेकिन कभी कोई जन आंदोलन मिलावटी दूध वालों के खिलाफ नहीं देखा गया, शायद किसी ने सोचा ही नहीं जबकि देश के किसी भी शहर में चले जाइए, घरों में दूध के बारे में पूछिए तो एक प्रतिशत लोग भी नहीं होंगे जो मानते होंगे कि उनके यहाँ शुद्ध दूध आता है। फिर क्यों नहीं खड़े होते लोग उस देश के जहाँ कभी सुनते हैं कि दूध–दही की नदियाँ बहा करती थीं, गाय की रक्षा के नाम पर खड़े होने वाले पता नहीं क्यों दूध की शुद्धता के लिए आंदोलन करते नहीं दिखते?

बाकी जहाँ तक बात बीफ की है तो उससे हमें बड़ी विदेशी मुद्रा मिलती है और उस धंधे में शामिल लोग सभी वर्गों के हैं और ताज़ी जानकारी आ रही है कि भाजपा के नामी विधायक संगीत सोम अल-दुआ नाम की कंपनी के निदेशक हैं जिसमें उनके पार्टनर मोइनुद्दीन कुरैशी हैं। यह अलग बात है कि जब यह कंपनी बनी थी तो सोम भाजपा में नहीं थे, वो बसपा–सपा से होते हुए कट्टर हिंदुत्ववादी हुए हैं। जहाँ तक देश में खाने की बात है तो बकरा इतना महंगा है कि आम मुसलमान के औकात की बाहर की बात है और उनके लिए ‘बड़े’ का गोश्त ही टेस्ट बदलने का सहारा था लेकिन इस फील्ड में भी इतने भाई लोग घुस गए हैं कि वह गोश्त भी महंगा हो चुका है। हाँ गौ वध निषेध से किसी का फायदा हो या न हो, देश में गायें बढ़ी की उनकी जगह विदेशी नस्लें हावी हो गई, यह अलग मुद्दा है लेकिन यह कानून पुलिस के लिए बहुत ही दुधारू है। पुलिस हालाँकि सांड और मुर्गे को भी दुह के बाल्टी भर ले लेकिन इस कानून की आड़ में पशु तस्करों से निबटने वालों जवानों के घर जरूर लक्ष्मी बढ़ती हैं, देश में अनेक थाने ऐसे हैं जो घोषित रूप से पशु तस्करों से होनी वाली आय के चलते ही ट्रांसफर–पोस्टिंग के खेल में बहुत महंगे बिकते हैं। यह भी अजीब खेल है कि हम बीफ एक्सपोर्ट में भी टॉप पर हैं तो जिन पोस्ट से पशुओं से लदी गाड़ियाँ एक राज्य से दूसरे की सीमा में जाती हैं, उनका भी रेट बहुत हाई है। कुल मिला कर गाय एक बहुत उपयोगी जानवर ही है जिसको लेकर केरल से कश्मीर तक माहौल आज कल गर्म है। केरल में जब तब होने वाले बीफ फेस्टिवल से और कश्मीर की विधानसभा में बवाल से जबकि कश्मीर में तो डोंगरा राज के समय से ही गौ वध निषेध है। बात भावनाओं की है क्योंकि गाय के दूध से पली पीढियां स्वाभाविक रूप से उसे माँ मानती हैं, अच्छी बात है। फिर बकरी और भैंस ने क्या बिगाड़ा था? सुना है ऊंटनी का दूध भी बहुत पौष्टिक होता है और काफी महंगा मिलता है लेकिन गाय तो गाय ही है, सीधी-साधी जो आजकल देश में आपसी रिश्तों को टेढ़ा करने के काम आ रही है। यह अच्छी बात नहीं, चुनाव तो आते जाते रहते हैं, पार्टियाँ भी स्थायी सत्ता नहीं ले सकतीं लेकिन मनुष्यता बची रहनी चाहिए, इस बात को मनुष्यों को ही समझना होगा क्योंकि जानवर तो बहुत कुछ समझते भी हैं लेकिन उन्की जुबान हम लोग समझ नहीं सकते हैं।

एक बात और स्पष्ट होनी चाहिए कि लाल–काली और चितकबरी वाली भी यानी विदेशी नस्ल वाली भी माँ की कैटेगरी में आती हैं या फिर देशी को ही यह दर्ज़ा हासिल है? अगर देशी को ही है तो बहुत अच्छी बात है और विलुप्त नस्लों की श्रेणी में रख कर उसे बचाने के प्रयास करने चाहिए लेकिन दिल से न की केवल दंगे और बवाल फैलाने के लिए ही।

It's only fair to share...Email this to someoneShare on FacebookShare on Google+Tweet about this on TwitterShare on LinkedIn

Facebook Comments