गणित गड़बड़ या मशीन ?

टीवी चैनलों पर मोदी के एकाधिकार से दुःखी विपक्षियों पर अब दोहरी मार पड़ी है और सरकार बनाने के एक महीने बाद तक योगी भी अच्छी खासी टीआरपी बटोर रहे हैं। इन सबके बीच एक बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ दिखी की अब राहुल गाँधी को कांग्रेस की कमान पूरी तरह सौंप देने की तैयारी चल रही है।

EVM विवाद पर राष्ट्रपति से मिला कांग्रेस पार्टी का भारी भरकम प्रतिनिधिमंडल

इस खबर का मतलब यही निकलता है कि आने वाले समय में मोदी विरोधी संयुक्त विपक्ष का चेहरा राहुल गाँधी ही रहेंगे। याद रहे कि राष्ट्रीय राजनीति में मोदी और उत्तरप्रदेश में योगी के उदय के काफी पहले से ही राहुल राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता हैं, जिनके नेतृत्व में कांग्रेस रसातल की तरफ बढ़ते जाने का कीर्तिमान बनाती जा रही है। कांग्रेस का सिंडिकेट भले ही राहुल गाँधी को अपना नेता मानने के लिए मजबूर है, लेकिन राजनीति की आवश्यक कुटिलता से कोसों दूर खड़े राहुल गांधी इतनी लम्बी सियासी पारी खेल चुकने के बावजूद अभी भी विपक्ष को एक सवर्मान्य नेता के रूप में स्वीकार नहीं हो सकते। ऊपर से पार्टी की अधोगति को देखते हुए यह अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है कि कांग्रेस के नेतृत्व में होने वाले गठबंधन से भाजपा की सेहत पर क्या असर पड़ेगा। ऐसे में फिलहाल विपक्ष एक दिख रहा है तो मशीन के मुद्दे पर। मतलब इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ही अब गठबंधन की गोंद बनी हुई है। इस गोंद के चलते ही विपक्षियों का एक भारी भरकम प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति से मिलता है, जिसमें सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह तो रहते हैं, लेकिन राहुल गाँधी नहीं जाते।

याद रहे कि सपा से गठबंधन से पहले उत्तरप्रदेश में सोनिया जी का बनारस में रोड शो था, जिसके दौरान वो बीमार पड़ गयीं थीं। उस बीमारी के बाद यह इनका पहला बड़ा कार्यक्रम था, वह भी मशीन के मुद्दे पर। वही मशीन जिसे कांग्रेस सरकार के समय ही चलन में लाया गया था। बनारस में सोनिया जी का रोड शो काफी सफल रहा था। भीड़ भी अच्छी खासी थी लेकिन पूरा होने से पहले ही उनकी तबीयत बिगड़ गयी थी और एसपीजी का सारा तामझाम धरा रहा गया था जब सड़क पर तबीयत बिगड़ने पर वहीं किनारे एक लॉज के कमरे में ले जाकर प्राथमिक उपचार दिया गया। राहत न मिलने पर शो निरस्त हो गया, फिर हवाईअड्डे पर भी उपचार देने के बाद विशेष विमान से दिल्ली ले जाकर सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके बाद फिर गंगाराम अस्पताल में भी लम्बा उपचार चला और वहां से छुट्टी मिलने के बाद वो विदेश चली गयी थीं, विशेष इलाज के लिए। यूपी चुनाव की मारामारी के समय वो विदेश में स्वास्थ्य लाभ कर रही थीं और मार्च में वापस आयीं।

EVM पर दो खेमों में बंटी कांग्रेस

जाहिर है कि तब भी नेतृत्व राहुल गांधी के पास ही रहा ही होगा, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में काफी मेहनत की और नतीजा सामने आने पर दोष मशीन का हो गया। यह अलग बात है कि उसी के साथ पंजाब के भी परिणाम आए और वहां शानदार वापसी करने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह न जाने कितनी बार मशीनों पर पूरा भरोसा जतलाते हुए कह चुके हैं कि अगर गड़बड़ी हुई रहती तो वो मुख्यमंत्री नहीं बन सकते थे, लेकिन उनकी बात दिल्ली वाली कांग्रेस सुनने को तैयार नहीं, क्योंकि वह मायावती और केजरीवाल के उछाले हुए एजेंडे को राष्ट्रीय मुद्दा बना कर विपक्षी एकता की कवायद में लगी है।

evm

EVM मशीन क्यों है कारगर तनिक जान लीजिए

जब हम मशीन से वोटिंग और बैलट पेपर वाली वोटिंग पर बात करते हैं, तब उस समय इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि मशीन से वोटिंग का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि ‘एक भी मत’ अवैध नहीं होता, जबकि पेपर पर मुहर लगाते समय ठप्पा सही जगह न पड़े और दो प्रत्याशियों के नाम के बीच में मुहर आ जाय या फिर स्याही फ़ैल जाय तो मत अवैध हो जाता था। अवैध मतों का मामला भी बहुत निर्णायक होता रहा है, क्योंकि उनके बारे में फैसला जिला निर्वाचन अधिकारी यानि तत्कालीन डीएम का ही माना जाता है, जिसे अदालत में भी चुनौती नहीं दी जा सकती।

मशीन से वोटिंग की जब पहली बार बात आई थी तब उसके विरोध में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता था कि मतदाताओं की बड़ी संख्या अनपढ़ है जो बटन दबाने में गड़बड़ी कर सकते हैं, जबकि यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि ऐसी गफलत के चलते ही बैलट पेपर पर भी कई लोग सही जगह ठप्पा नहीं लगा पाते और उनके मत अवैध या फिर डीएम की इच्छा पर ही निर्भर हो जाते थे। किसी बूथ पर दबंगई से कब्ज़ा करके या अधिकारियों की मिली भगत से दस मिनट के भीतर ही हजारों मुहर मारी जा सकती है जो निर्णायक हो जायेगी, लेकिन मशीन से यह इसलिए तेजी से संभव नहीं है, क्योंकि इसका कंट्रोल यूनिट मतदान कर्मी के पास रहती है और हर बार मतदाता के बटन दबाने से पहले कंट्रोल यूनिट से ओके करना पड़ता है। कब्जे की दशा में भी मशीन से कम समय में अधिक बार बटन दबाना संभव नहीं है क्योंकि विरोधी पार्टी के लोगों को भी सक्रिय होने का समय मिल जाता है। जहाँ तक अवैध मतों का महत्व है तो वो कई बार निर्णायक होते रहे हैं। इसका उदाहरण रोहतक से देवीलाल की हार में देखा जा सकता है। बहुत बड़े कद के जाट नेता ताऊ देवीलाल कांग्रेस के प्रत्याशी से मात्र 303 मतों से हारे थे। आप कहेंगे कि इसमें बड़ी बात क्या है, क्योंकि बहुत से लोग सौ से भी कम मतों से हारते हैं। आज के समय में कम मतों की हार पर शंका नहीं हो सकती, लेकिन ठप्पा वाली चुनाव प्रक्रिया में शंका की पूरी गुंजाइश थी, क्योंकि किसी दल को जब लगता था कि वह किसी ख़ास बूथ पर बहुत पीछे चल रहा है तो वहां प्रशासन की मिलीभगत से अवैध मतों का निर्णायक खेल होता था जिसमें बॉक्स में स्याही डाल देने से लगायत ठप्पे की स्याही के बाल भर के फर्क से भी वैध-अवैध का मामला तय होता था। देवी लाल का नाम इसलिए लिया की उनकी 303 मतों वाली हार में आठ हजार से अधिक अवैध मत भी थे। जाहिर है कि मशीन से वोटिंग पर ये मत अवैध नहीं हुए रहते।

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कई ट्वीट करते हुए मशीनों पर सवाल उठाते हुए उनसे छेड़छाड़ की बात की तो  विश्लेषक यशवंत देशमुख ने मुख्यमंत्री रहते हुए दिग्विजय सिंह के मध्यप्रदेश में अवैध मतों के खेल का उदाहरण दिया, जिसके मुताबिक भाजपा के 35 के आसपास प्रत्याशी जितने मतों से पराजित हुए थे। उनसे कई गुना संख्या उन विधानसभा सीटों पर अवैध मतों की थी। इस प्रकार मशीनों के इस्तेमाल से अवैध मतों की संख्या अब शून्य हो चुकी है।

हार का ठीकरा किसी न किसी पर तो फोड़ना है, तो बेचारी मशीन को ही कठघरे में खड़ा कर दिया

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे पहले मायावती ने झटके से उबरते हुए वोटिंग मशीन में गड़बड़ी की बात की, क्योंकि सपा के बाद बसपा को सत्ता वाला पैटर्न टूट चुका था। मायावती को भरोसा नहीं था की उनकी इतनी बुरी हार होगी। वो न मुसलमानों पर खीझ उतार सकती थीं, न ही दलितों पर इसलिए उन्होंने चुना मशीन को। उनकी पार्टी की तरफ से इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका डाली गयी है, जिनमें उनके वकील पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल हैं, जिन्होंने अदालत में तर्क दिया है की विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ-साथ अब कोई भी मशीन सुरक्षित नहीं रही है। इस नाते चुनाव बैलट पेपर से होने चाहिए। जब सिब्बल साहब यह तर्क दे रहे थे तब तक बसपा से भाजपा में आये दलित पिछड़े वर्ग के तीन कद्दावर नेता भाजपा सरकार में मंत्री बनाए जा चुके थे। स्वामी प्रसाद मौर्या कोइरी मतदाताओं में काफी प्रभाव रखते हैं और उत्तर प्रदेश में बसपा का प्रमुख चेहरा सदन से लेकर सड़क तक पांच साल वही रहे हैं। दारा सिंह चौहान नोनिया समाज से आते हैं और पिछले लोकसभा चुनाव तक वो लोकसभा में बसपा संसदीय दल के नेता थे और बाद में मोदी जी में आस्था व्यक्त करते हुए भाजपा में शामिल हो गए तब भाजपा ने उन्हें पिछड़े प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया था और वो पूरे सूबे में छोटी-छोटी सभाओं में व्यस्त हो चुके थे। यह अलग बात है कि मायावती को दारा सिंह चौहान की संगठन को खड़े करने की क्षमता की जगह सपा के बाद अपनी वापसी पर ही भरोसा था। गड़ेरिया वर्ग से आने वाले एसपी सिंह बघेल भी हाथी छोड़ भाजपा में आ चुके थे, जो आज मंत्री हैं। पूर्वी यूपी में तमाम सीटों पर निर्णायक संख्या वाले दलित राजभर वर्ग के ओमप्रकाश राजभर सपा-बसपा सबसे निराश होकर भाजपा के साथ आ गए और योगी सरकार बनाने में अपनी भूमिका के चलते उन्हें भी मंत्रीपद देकर उनके संघर्षों और हाशिए पर खड़े उनके जातीय वर्ग को अब सम्मान मिला है। भाजपा और संघ की यह जबरदस्त सोशल इंजीनियरिंग महान विचारकों को दिखलाई नहीं पड़ रही है और वो लोग भी मायावती के भ्रम में शामिल हो चुके हैं।

जैसा झटका मायावती को लगा ठीक उसी तरह का झटका राजनैतिक दल बनने की असफल कोशिश में लगे एनजीओ वालों की टोली आम आदमी पार्टी को भी लगा है। अपने आंतरिक सर्वे में यह टोली गोवा और पंजाब में तो सरकार बना चुकी थी।

aap goa

आत्मविश्वास का आलम यह था की परिणाम आने से पहले ही बधाई के पोस्टर बन चुके थे।

aap

गोवा और पंजाब, दोनों जगह कांग्रेस और भाजपा से पहले इसने आक्रामक चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया था, लेकिन नतीजे आते ही हार पर और जनता के मूड पर भरोसा न करते हुए दोषी मशीन को ही बता दिया गया।गोवा में जनवरी से ही टोपी और झाड़ू लिए गोवा बदलने की तैयारियां दिखने लगी थीं, लेकिन 39 सीटों पर लड़ने वाली टोली की 38 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी, जिनमें इनके सर्वे में सबसे आगे रहे मुख्यमंत्री कैंडिडेट एल्विस गोमेज भी शामिल रहे। पंजाब में इनका अनुमान था कि सरकार इन्हीं की है और कांग्रेस थोड़ी बहुत टक्कर दे पाएगी, जहाँ कैप्टन प्रचंड बहुमत से सरकार बना ले गए। शायद मनीष सिसोदिया का यह कहना भारी पड़ गया कि केजरीवाल ही मुख्यमंत्री बनेंगे। ऊपर से सुपर कॉप केपीएस गिल का यह बयान कि आप अलगाववादियों को बढ़ावा दे रही है भी पंजाबियों को दर्दनाक दिनों की वापसी की याद दिला गया। इस टोली के नोट और सेक्स के भी कुछ कारनामे सामने आये। इन सबसे बड़ी बात रही कि दिल्ली में भी काफी पंजाबी हैं जिन्होंने अपनी सरकार का फीडबैक दिया ही होगा। जो भी हो लेकिन केजरीवाल का राष्ट्रीय दल के रूप में उभरने का सपना टूट गया है। हाँ, टीवी पर उनको जगह की कमी नहीं थी क्योंकि तमाम बातें ऐसी हैं जो केवल उनके मुँह से ही निकल सकती हैं, जिसे देश मुँह खोल कर सुनता है। तो मायावती और केजरीवाल का मुद्दा था मशीन की गड़बड़ी, जिसे अब कांग्रेस ने बड़े कैनवास पर ले लिया है।

जब सिब्बल साहब बसपा के पक्ष में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की कमियों की फ़ाइल तैयार कर रहे थे, उसी समय एक और पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोइली बहुत मजबूती से अपना तर्क रखते हुए पक्ष में खड़े हुए। उन्होंने साफ-साफ कहा कि उनके कार्यकाल में भी मशीनों की शिकायत आई थी, जिसके आधार पर तमाम जांच की गई और पाया गया की इनके साथ छेड़छाड़ संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस पार्टी को क्षेत्रीय दलों के ‘लोकप्रियतावादी  हथकंडे’ के झांसे में नहीं आना चाहिए, क्योंकि अपनी रणनीतियों की गलतियों और जनता के मूड को समझने की जगह मशीन को दोष देना पराजयवादी मानसिकता है। लेकिन देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी का कमाल देखिये की उसे माया और केजरीवाल पर अधिक भरोसा है और उनके एजेंडे पर ही चलने का फैसला करते हुए वह सर्वदलीय विपक्षी प्रतिनिधिमंडल लेकर राष्ट्रपति से मिल आयी और उस दल में मोइली साहब भी शामिल रहे, साथ ही उनके हस्ताक्षर भी ज्ञापन पर थे। इसी तरह कैप्टन अमरिंदर कुछ भी कहते रहें मशीन के पक्ष में लेकिन कांग्रेस के मुताबिक वह उनकी निजी राय है, क्योंकि राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद साहब सदन में कह चुके हैं कि यूपी में भाजपा की जीत ईवीएम में हेराफेरी करके हुई है। मतलब कांग्रेस को भी अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री न बन पाने का इतना दुःख है कि वह चुनाव आयोग समेत पूरी चुनावी प्रक्रिया पर ही दोष लगाते हुए जनता के निर्णय को अभी भी पचा नहीं पा रही है। बात भी सही है क्योंकि राहुल गांधी जैसे करिश्माई नेता के होते हुए इतनी बुरी पराजय ठीक नहीं, यह अलग बात है कि कर्णाटक उप चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद वहां के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कह चुके हैं कि उन्हें इन मशीनों पर भरोसा है। मशीन में गड़बड़ी श्रीनगर लोकसभा के उपचुनाव में भी नहीं हुई, जिसके चलते वहां कांग्रेस समर्थित फारुख अब्दुल्ला जीत गए।

‘फेकिंग न्यूज़’- डूबते हुए को तिनके का सहारा

केजरीवाल और मायावती की हताशा से उपजे इस विवाद को बल मिला मध्यप्रदेश से उठी एक फेकिंग न्यूज़ से। यानी सनसनी बनाने वालों ने समझा ही नहीं कि उनकी कतरन कितना काम कर जायेगी। याद रहे कहाँ की मशीनें कहाँ भेजी जायेंगी यह पहले से तय नहीं होता। मध्यप्रदेश के भिंड में उपचुनाव के पहले मशीनों के प्रदर्शन/प्रशिक्षण का कार्यक्रम था, जिसमें राज्य की मुख्य निर्वाचन अधिकारी सलीना सिंह खुद उपस्थित थीं। कहीं की मशीन कहीं भी भेज दिए जाने की प्रक्रिया के तहत वहां कानपुर में इस्तेमाल की हुई मशीन और वीवीपीएटी-वोटर वेरीफिकेशन पेपर आडिट ट्रे मतलब मतदाता ने किसे वोट दिया यह बताने वाली मशीन, गयी थी। यह मशीन अभी खाली नहीं की गयी थी, यानी इसमें अभी कानपुर के आंकड़े फीड थे, जिसे अभी हटाया जाना था, जो निश्चित ही वोटिंग से पहले साफ़ किये जाते। बटन दबाये जाने पर पहली पर्ची निकली राष्ट्रीय लोकदल यानी हैण्डपम्प की,याद रहे पर्ची कुछ ही देर के लिए दिखती है फिर बॉक्स में गिर जाती है। दूसरी पर्ची निकली कमल के फूल की जिसके साथ प्रत्याशी का नाम भी था सत्यदेव पचौरी, जो अब यूपी में मंत्री हैं। इसके बाद सपा और कांग्रेस की भी पर्ची निकली, लेकिन रिपोर्टरों ने केवल भाजपा वाली पर्ची पर ही ध्यान दिया और बोले की बटन दबाते ही कमल निकला, यह तो सेटिंग है। जिस हलके अंदाज़ में यह बात कही गयी उसी हलके अंदाज़ में मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा की इस छापना मत वर्ना थाने में बैठा दूँगी। इस हलके फुल्के माहौल का हुआ क्या यह सबको मालूम है। अखबार में खबर छप गयी मशीन में हेराफेरी की और साथ ही सलीना सिंह का ‘बयान’ भी छपा की इसे छापना मत वर्ना थाने में बैठा दूंगी। बस कव्वा कान ले गया और बन गयी ब्रेकिंग न्यूज़।bhind

चुनाव आयोग को कूदना पड़ा EVM के संग्राम में, दिया खुला चैलेंज

टीवी चैनलों से लेकर केजरीवाल-मायावती और कांग्रेस को फर्जी खबर का सहारा मिल गया। तमाम वेब पोर्टल पर भाजपा से दुःखी लोगों ने लाखों की संख्या में इस खबर को हिट्स दिए और हंगामा खड़ा हो गया। चुनाव आयोग भी सक्रिय हुआ और सफाई देने लगा। साथ ही एम.एस.गिल और डॉ.एस.वाई.कुरैशी जैसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त बिचारे लेख लिख कर या फिर ट्विटर पर लाख समझाते रहे कि इस संस्था पर प्रश्नचिन्ह मत लगाइए और हमारी मशीनें एकदम सही हैं, लेकिन उनकी सुनता कौन ? अब चुनौती दी जा रही है की यूपी के चुनाव रद्द करके ठप्पे वाले करवाए जायें। कुछ दिन तक समझदारी की बातें करने के बाद अब अखिलेश यादव भी इस बहस में कूद पड़े हैं और उन्हें भी मशीन ही गड़बड़ लग रही है। बात बढ़ती देख कर चुनाव आयोग ने भी चुनौती दे दी है सभी पक्षों को कि आइये और मशीन से छेड़छाड़ साबित करिए।

ये मशीन की गड़बड़ी नहीं, विपक्ष की फेल गणित का लोचा है

याद रहे ईवीएम किसी नेट्वर्किंग से नहीं जुडी रहती, वरन यह अपने आप में एक पूर्ण यूनिट या स्टैंड अलोन मशीन है इस नाते इसके साथ हैकिंग तो हो ही नहीं सकती। अगर हर यूनिट की चिप में ही गड़बड़ी की जाय तो वह कैसे संभव है, क्योंकि कौन सी मशीन कहाँ भेजी जाएगी यह पूर्व निर्धारित नहीं होता। ऊपर से हजारों मशीनों में किस तरह से एक जैसी सेटिंग की जा सकती है? खैर पचीस साल पहले मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने वाले केजरीवाल जी ने चुनौती दी है कि वो मशीन में हेराफेरी करके साबित कर सकते हैं। इसका मतलब है कि इन दिनों उन्होंने इलेक्ट्रानिक्स, इलेक्ट्रिक और आईटी-फाईटी वाली जानकारियाँ भी जुटा ही ली होंगी। यहाँ यह भी याद रहे कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले भी केजरीवाल जी ने मशीन में गड़बड़ी की आशंका व्यक्त की थी लेकिन पक्ष में परिणाम आने के बाद शांत हो गए थे, तब कुरैशी साहब ने ट्विट किया था की चुनाव आयोग पर शंका करने वालों को अपने पक्ष में परिणाम आने के बाद माफी मांगनी चाहिए, क्योंकि ये लोग पूरे संस्थान को शंका के दायरे में खड़ा करते हैं। यह अलग बात है कि अपनी पराजय को स्वीकार करने और आत्मावलोकन करने की जगह अब बहुत आसान हो गया है मशीन पर सवाल उठा देना, क्योंकि समीक्षा करने पर गलतियाँ खुद की ही निकलेंगी और अब वह ज़माना गया जब अपनी गलती मान कर उसे सुधारने की कोशिश की जाय। यह अलग बात है कि अभी वक्त भाजपा का है, वर्ना कभी आडवाणी भी इन मशीनों पर सवाल उठा चुके हैं और सुब्रमण्यम स्वामी भी काफी लेक्चर दे चुके हैं, इसलिए आज के हारे हुए पक्ष को भी हक़ है ही कि वह भी सवाल उठाये। सवाल उठाना लोकतंत्र में कहीं से भी गलत नहीं है, लेकिन सवाल वाजिब तो होने चाहिए, केवल सनसनी के आधार पर खड़ा किया गया हंगामा सिर्फ मनोरंजन कर सकता है और कुछ नहीं।  ऐसे हंगामे से भाजपा और मजबूत ही होती जायेगी और विपक्ष और हताश दिखता रहेगा, क्योंकि वोट करने वाली जनता तो समझती है कि उसने किसे वोट दिया है। हेराफेरी मशीन में हुई तो नहीं लगती, जिनकी अपनी गणित फेल हो चुकी है, उनके पास समीकरण सही करने के उपाय फिलहाल नहीं दिख रहे हैं, जिस नाते अब अपने लोगों को दिलासा दिलाने के लिए वो लड़ रहे हैं कि उनके वोटर तो पक्के हैं, बस मशीन ही गड़बड़ हो गयी है। हाँ, कैप्टन अमरिंदर सिंह अलग खड़े होकर चुपचाप यह तमाशा देख रहे होंगे।

यह नोटबंदी से बड़ा मुद्दा है, जिसपर विपक्ष लामबंद हो चुका है, लेकिन नोटबंदी की ही तरह इस मुद्दे पर भी जनता का साथ तो फिलहाल दिख नहीं रहा है, क्योंकि बसपा ने यूपी के हर जिला मुख्यालय पर मशीन के मुद्दे पर प्रदर्शन का आयोजन किया था और लखनऊ में ही उँगलियों पर गिने जाने भर के कार्यकर्ता उपस्थित हो पाए। शायद कैडर को अपनी नेता से अधिक समझ होगी की पार्टी हारी क्यों। ऊपर से बहन जी ने अपने भाई को भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया, ताकि दलित राजनीति में भाजपाई सेंधमारी के बाद फिर से पार्टी को मजबूती दी जा सके और काले धन और अवैध कंपनियों के मकड़जाल के चलते कानूनी शिकंजे में आ रहे भाई को भी अब राजनैतिक अभयदान मिल सके। हालाँकि, अभी इस मुद्दे पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

अब कांग्रेस को भी यूपी के हर जिला मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन करना चाहिए और निश्चित ही उसे अखिलेशवादियों का भी साथ मिलना ही चाहिए, क्योंकि जिन लोगों ने इस गठबंधन को वोट दिया होगा उन लोगों को भी सामने आना चाहिए अपने नेताओं के समर्थन में, जो मानते हैं कि हार का कारण इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ही हैं। हाँ, लम्बे समय तक देश की दशा तय करने वाली कांग्रेस को मायावती और केजरीवाल के एजेंडे पर चलते देखना वास्तव में एक अजीब अनुभव है।

It's only fair to share...Email this to someoneShare on FacebookShare on Google+Tweet about this on TwitterShare on LinkedIn

Facebook Comments