बीटेक फ्रॉड

1950 में आईआईटी खड़गपुर की स्थापना के समय नेहरू जी की कल्पना थी की यह संस्थान देश की दिशा बदलने वाले युवाओं को तैयार करेगा, धीरे-धीरे दूसरी जगहों पर भी आईआईटी की स्थापना हुई और कुल सात आईआईटी स्थापित की गयी।

संस्थापकों की परिकल्पना के अनुसार इन संस्थानों ने काम किया और यहाँ से निकले लोगों ने देश दुनिया में काफी नाम कमाया, जो नाम नहीं कमा सके उन छात्रों को भी दाम कमाने में कोई दिक्कत नहीं रही और आज भी आईआईटी में दाखिला लेना गणित के साथ बारहवीं कर रहे हर छात्र का सपना है। यह अलग बात है की आज आईआईटी की संख्या 23 हो चुकी है और इस विस्तार के साथ ही असर संस्थान की गुणवत्ता पर भी पड़ा है।

इंजीनियरिंग के दिन गए भैय्या जी!

जॉबलेस ग्रोथ के दौर में पहुँच चुके देश में फिलहाल आलम यह है कि अब आईआईटी से निकलने वाले छात्रों को भी नौकरियों के लिए भटकना पड़ रहा है और मन मार कर अपनी योग्यता से काफी कम मूल्य पर सेवा देनी पड़ रही है। फिलहाल देश में इंजीनियरिंग करके निकलने वालों का भविष्य चौपट होता जा रहा है और यह हुआ है आर्थिक उदारीकरण के बाद उपजी परिस्थितियों से। उदारीकरण हर क्षेत्र में हुआ और देश में बाढ़ आ गयी इंजीनियरिंग कॉलेजों की। स्किल इण्डिया का नारा भले ही आज मोदी जी लगा रहे हों लेकिन इंजीनियरिंग के नाम पर अनस्किल्ड, अधकचरे ज्ञान के साथ समाज से कटे युवाओं की एक फ़ौज उदारीकरण के बाद इन इंजीनियरिंग कॉलेजों से निकली। बात कड़वी है, लेकिन वर्तमान समय की यह सच्चाई है कि नीतियों में बदलाव करके शह- शहर इंजीनियरिंग कॉलेजों के खुलने से फायदा केवल उनके मालिकों और तंत्र में काबिज दलालों को ही हुआ। कॉलेजों से देश का कोई भला नहीं हुआ और ठगे गए करोड़ों की संख्या में अभिभावक और चौपट हुआ लाखों युवाओं का भविष्य।

रिसर्च से साफ़ हो रहा है कि देश में हर साल निकल रहे इंजीनियरों में से 80% से अधिक में इतनी योग्यता ही नहीं होती की उन्हें उनकी डिग्री के मुताबिक नौकरी मिले, मतलब उनको कोई अपने यहाँ रखना ही नहीं चाहता। अपने जीवन का बहुमूल्य समय और परिवार की गाढ़ी कमाई लुटाने के बाद हाथ में कागज का टुकड़ा लेकर अधिकांश युवा सड़क पर आ रहे हैं।

engineer

इंजीनियरिंग के नाम पर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़

स्पष्ट है कि बारहवीं के बाद कहीं अंडे का ठेला लगा लेता लड़का तो पांच साल में कुछ कमा लेता। किसी दर्जी की दुकान पर मुफ्त में बटन लगाने की सेवा देता तो साल भर में पैंट शर्ट भी सिलना सीख जाता और दो साल में अपना धंधा शुरू कर देता, लेकिन बाप की कमाई से पांच से दस लाख पढ़ाई के नाम पर उड़ा कर सड़क पर आने वाली पीढ़ी को बचाने के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं, क्योंकि भरोसा था की वह इंजीनियर बन रहा है। मेडिकल कॉलेज  खोलने के नियम अभी भी कड़े हैं फिर भी वार्ड ब्याव को सफ़ेद गाउन पहना कर, आला लटकवा कर दिल्ली से आई टीम का इंस्पेक्शन करवा लिया जाता है और सारी बातें लिफाफे के वजन पर ही तय हो जाती हैं फिर भी मेडिकल में उतना फ्रॉड नहीं हुआ है जितना इंजीनियरिंग के नाम पर हुआ। दो-चार रिटायर अध्यापकों को लेकर और ताज़ा एमटेक, एमएससी किये लड़कों को अध्यापक बना कर शुरू हो गया इंजीनियरिंग कॉलेज। दो साल की फीस इकट्ठी हो गयी तो बिल्डिंग चमचमाने में भी कोई दिक्कत नहीं और फिर फंसते आते हैं ग्राहक। कोटा और नेल्लोर जैसे कोचिंग हब इन्हीं सपनों के दम पर फलफूल रहे हैं, जहाँ अच्छे इंस्टिट्यूट में दाखिले का सपना लिए युवा मशीनी ढंग से, लाखों रुपये खर्च करके जवानी रगड़ रहे होते हैं।

इस नौबत के लिए बच्चों से अधिक उनके अभिभावक दोषी हैं। माँ के गर्भवती होते ही डॉक्टर या इंजीनियर संतान का सपना पाल लेते हैं। प्ले स्कूल से शुरू सफर नर्सरी में जाते ही ट्यूशन से जुड़ जाता है और थोड़ी बड़ी क्लास में जाते ही कोचिंग की दौड़ शुरू हो जाती है और एक खुशहाल बचपन की जगह मशीनी जिन्दगी शुरू होती है। कुछ अधिक ही एडवांस शहरी लोग इसी बीच में बच्चे की हॉबी क्लास भी रख देते हैं, यानि बच्चा बन जाता है मशीन जिसे अपने अभिभावकों का सपना पूरा करने के हिसाब से शिड्यूल्ड किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में लर्निंग प्रोसेस कहीं है ही नहीं और न ही हो पाता है स्वतन्त्र विकास।

कभी स्टेटस सिम्बल माना जाता इंजीनियरिंग आज ठन-ठन गोपाल

कभी इंजीनियर बनना एक स्टेटस सिम्बल की भी बात थी। उस परिवार की मोहल्ले में इज्जत बढ़ जाती थी जिसमें कोई इंजीनियरिंग कर रहा होता था, लेकिन आज नौबत तो यह आ गयी है की ‘अच्छा, बीटेक कर लिया, फिर कर क्या रहा है?’ सवाल बहुत चुभते हैं। कॉलेजों की इतनी बाढ़ है की जो चाहे वह इंजीनियरिंग कर सकता है बशर्ते घर में कीमत चुकाने की हैसियत हो। मेरिट से सेलेक्ट होना भी कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि इतनी अधिक सीटें हैं कि सेलेक्शन हो ही जाएगा। 

अधिकांश अभिभावक अभी भी कालेजों की ग्रेडिंग और प्लेसमेंट के बारे में जागरूक नहीं हैं और छात्र का क्या, उसे तो इंजीनियर बनना ही है, जिसके बाद दुनिया उसकी मुट्ठी में। एडमिशन के बाद ही हावभाव बदल जाते हैं, क्योंकि बंदिश वाले स्कूली वातावरण से सीधे एक खुला आसमान मिलता है और मिलते हैं अपने जैसे ही सपने लिए हुए ढेर सारे साथी। अधिकांश कॉलेजों में अध्यापक भी वही लड़के होते हैं जो अभी कहीं कायदे से सेट नहीं हो पाते और बीस-तीस हजार की तनखाह या इससे भी कम में वो उन सपनों को पूरे करने की जिम्मेदारी लिए होते हैं जो लाखों के पैकेज के मकड़जाल में फंस कर छटपटा रहे होते हैं। इन कॉलेजों की गुणवत्ता वाली फाइलें भी मैनेजमेंट की तरफ से ऊपर दिए गए लिफाफे के वजन पर ही क्लीयर होती हैं। स्लेबस और सेमेस्टर में कोई कोताही नहीं होती, ऐसा भी नहीं है की पढ़ने-पढ़ाने का ढर्रा नहीं है।  सब कुछ है। बच्चों का शेड्यूल भी बहुत टाईट है, लेकिन इन सबके बावजूद डिग्री मिलने के बाद वो खाली हाथ रहते हैं। कारण वही है, बीटेक फ्रॉड भी आर्थिक उदारीकरण के बाद का सबसे बड़ा घोटाला है। डिप्लोमा किये हुए लोगों की मांग अधिक है, यहाँ तक कि इलेक्ट्रीशियन और फिटर-प्लम्बर जैसे लोगों की डिमांड बहुत है। नोएडा-गुड़गांव हो या देहरादून से पुणे तक, इस वर्ग के लोगों की कमाई बहुत है और समय से मिलते भी नहीं, लेकिन बीटेक किये हुए और लाखों के पैकेज का सपना देखने वाले दस-पंद्रह हजार में जिन्दगी बर्बाद करते बहुमत में मिल जायेंगे।

engineering-jobs-india-2016

बीटेक की डिग्री के बाद भी अनस्किल्ड है युवक, क्यों? क्या कॉलेजों के पास है इसका जवाब??

इनकी मजबूरी भी है एड़ियाँ घिसना, क्योंकि जिन सपनों के साथ ये घर से निकले होते हैं उनका बोझ ऐसा होता है की फिर वापस घर आकर कहीं दुकान खोलने या कोई धंधा करने में सबसे बड़ा रोड़ा है नकारात्मक भारतीय चिंतन की लोग क्या कहेंगे? यह गैर भय भी नहीं है, क्योंकि खुद का छोड़ लोगों को दूसरे की ही चिंता रहती है और ‘अरे बीटेक करके घर आ गया?’ वाले सवाल गोले की तरह पड़ते हैं। यहाँ यह भी ध्यान रहे की बारहवीं के बाद घर से बाहर निकलते ही खाने-पीने का जो व्यतिक्रम हुआ उससे शरीर भी टूटा हुआ ही होता है, जिस टूटे शरीर के साथ नौकरी की जंग लड़नी है। यह लिखा और बोला खूब जा रहा है की ऐसे बच्चों के पास केवल ग्रेजुएशन की डिग्री मात्र है जिसके आधार पर वह बीटेक वाली नौकरी नहीं पा सकता तो क्या हुआ लेकिन वह उन तमाम सरकारी नौकरियों के योग्य तो है ही जो ग्रेजुएशन के बाद मिल सकती हैं, लेकिन कोई यह सवाल नहीं उठा रहा है की क्या कारण है कि बीटेक की डिग्री के बाद भी वह अनस्किल्ड है? इसमें उस बच्चे या अपनी पूँजी लगाने वाले अभिभावक का क्या दोष? उस नाकारे तंत्र पर सवाल क्यों नहीं उठते जिसके चलते यह हालत बन गयी कि कहा जा रहा है कि ये बेकार की पीढ़ी है, जिसे इस दोराहे पर खड़ा करने वाले तो वही लोग हैं, जिनकी जिम्मेदारी इन कॉलेजों  में गुणवत्ता स्थापित करने की है। किसी बीटेक वाले का उपहास उड़ाते समय इस मुद्दे पर जरूर सोचियेगा, क्योंकि छल का शिकार हुआ युवा उपहास नहीं वरन सहानुभूति का पात्र है जो अनजाने में ठगा गया है। 

स्किल इण्डिया के नारे के साथ ही सरकार ने बीटेक की सीटों में कटौती की योजना तो बना ली, तमाम कॉलेजों में सीटें घट गयीं तो दस साल लूटकर तमाम कालेज बंद भी होने लगे, लेकिन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की कोई बात नहीं होती। बेरोजगारी या योग्यता से कम की नौकरियों की बात केवल इन प्राइवेट कॉलेजों में ही नहीं है, इस समस्या से थोक के भाव खुले आईआईटी, एनआईटी और ट्रिपल आईटी के छात्रों को भी जूझना पड़ा है। जहाँ प्लेसमेंट की दर भयानक रूप से नीचे आ रही है। इन संस्थाओं से निकले छात्र अपनी पढ़ाई से दूर के विषयों में स्टार्टअप शुरू करके जरूर सफल हो रहे हैं, लेकिन भारत सहित दुनिया भर में जॉबलेस ग्रोथ वाले चलन के चलते भारी नुकसान हो रहा है।

आने वाले वक्त में भयंकर छंटनी के दौर से गुजरेंगे इंजीनियर

आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के विकास के चलते अब कार्यालयों से लेकर फैक्ट्रियों तक में आदमी की जगह रोबोट आते जा रहे हैं। जिस कार कम्पनी में हजार लोग एसेम्बली लाइन में लगते थे वहां कुछ ही लोग कम्यूटर पर बैठ गाड़ियों को खड़ी कर रहे हैं। यहाँ तक की अब खबरें भी कम्यूटर सलेक्ट कर रहे हैं। खैर यह अलग मुद्दा हो जायेगा। आईटी सेक्टर का कभी बड़ा जोर था और यह इंजीनियरिंग का सबसे प्रिय ट्रेड हो गया था लेकिन आंकड़ों के मुताबिक इस फील्ड से आने वाले कुछ इंजीनियरों में केवल 18% ही नौकरी पाने लायक समझ रखते हैं। जो समझ रखते हैं उनके लिए भी कोई अच्छी खबर नहीं है, क्योंकि बात चल रही है कि अब आईटी सेक्टर में भयंकर छंटनी का दौर शुरू होने वाला है, क्योंकि छिटपुट छंटनी से काम नहीं चल रहा था और अब एकमुश्त लोग निकाले जायेंगे और यह काम इनफ़ोसिस, विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों में होगा। लाखों लोगों की नौकरियां जाएंगी। 

कमर कस लीजिए अभी से जितने भी इंजीनियर साहब हैं!!!

ध्यान रहे बड़ी कंपनियों में प्रतिष्ठित संस्थानों से निकले और कड़े टेस्ट के बाद ही लोग लिए जाते हैं और अब ऐसे लोगों के सड़क पर आने का दौर शुरू हो चुका है। छोटी नौकरी और कम कमाई वाले लोग जब एकाएक बेरोजगार हो जाते हैं तो उनके साथ खड़े होने वाले कुछ लोग मिल जाते हैं, क्योंकि ये लोग अपने परिवार और समाज के साथ समय बिताते रहते हैं, उनसे जुड़े रहते हैं और फिर इन लोगों के साथ बड़ी देनदारियां भी नहीं जुड़ी रहती हैं और ये फिर से कहीं खड़े होने की जगह तलाश लेते हैं।

हाईफ्लायर जॉब वाले लोग खुद भी आसमानी हो जाते हैं, क्योंकि उनकी कल्चर बदल चुकी रहती है और वो अमेरिकन हो चुके रहते हैं। समय का बहाना बनाते हुए वो जिस समाज से निकले रहते हैं, उससे प्रायः कट चुके रहते हैं। उनके रिश्तेदारों और घर वालों से मिलने का समय नहीं होता, क्योंकि हनीमून के समय से ही वो विदेश भ्रमण अधिक पसंद करते हैं। छुट्टियाँ थाईलैंड या स्विट्जरलैंड में बीतती हैं या फिर देश के ही हसीन वादियों में। उन्हें महीने भर के लिए नुक्कड़ का लाला उधार भी नहीं दे सकता, क्योंकि उनकी अधिकांश शॉपिंग मॉल में ही होती है। किसी दोस्त-मित्र-रिश्तेदार के गाढ़े वक्त में भी ये काम नहीं आते, क्योंकि खुद इनके फ़्लैट और गाड़ी की ईएमआई काफी लम्बी होती है, साथ ही जितने में इन्होंने इंजीनियरिंग कर ली होगी, उससे थोड़े ही कम फीस वाले स्कूल में अपने बच्चे को डाले रहते हैं। हाँ, इनमें कुछ इतने व्यस्त होते हैं कि जिन्दगी की गाड़ी घसीटने के लिए मियाँ-बीवी दोनों खटते हैं और बच्चे पैदा करने की फुर्सत नहीं होती यानी डबल इंकम-नो किड्स (डिंक)। ऐसे लोगों की नौकरी चली जाय तो बहुत दिक्कत होती है और अधिकांश के पास सड़क पर आ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। यह स्थिति आने वाली है और इस मामले में कोई सरकार कुछ नहीं कर सकती। अब सर पीटने के अलावा कोई चारा नहीं है कि किस घड़ी में इस फील्ड में आए।

हालत वाकई खराब है, लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है

मैं निराश नहीं कर रहा हूँ, न ही नकारात्मक चित्र खींच रहा हूँ। तमाम एक्सपर्ट के जो विचार आजकल आ रहे हैं उन्हीं के आधार पर पता चल रहा है की हालत वाकई खराब है। ऊपर से ट्रंप ने स्किल्ड भारतीयों के लिए बड़ी दीवार खींच ही दी है। ऐसे में जरूरी है कि सम्भावित खतरे से सावधान रहा जाए। बात निराश होने की जगह किसी दूसरी सुरंग में रौशनी खोजने की होनी चाहिए और जहाँ अँधेरा रहता है वहां रौशनी की भी गुंजाईश रहती ही है। ये युवा भी अपने लिए रास्ता निकाल ही लेंगे, बाकी पढ़ने-पढ़ाने और योग्यता-क्षमता बढ़ाने पर सरकार का जोर रहता तो क्यों जेएनयू में भी पीएचडी और एमफिल में 80% सीटें कम कर दी जातीं? सरकार नारे लगाकर अपना काम बनाती रहेगी, रास्ता तो इन युवाओं को ही तलाशना होगा, क्योंकि बीटेक में कुछ अंग्रेजी गिटर-पिटर करके उसके दम पर काल सेंटर में भी नौकरी पा जाने के दिन लद गए। यह सेक्टर भी अब बहुत तेजी से गिरता जा रहा है। हाँ, आईटी की जगह सिविल का जो ट्रेंड इधर जोर पकड़ रहा था वह चढ़ने से पहले ही बैठ गया क्योंकि सरकार की कुछ काफी जन लुभावन नीतियों ने कंस्ट्रक्शन के धंधे को भी काफी चोट पहुंचाई है और वहां भी छंटनी चालू है।

इन सबसे ठीक तो देहात के वह युवा हैं जो भोर में ही इस आशा के साथ मीलों दौड़ लगाते हैं की अगली भर्ती में फ़ौज में सेलेक्ट हो जायेंगे तब जिंदगी बदल जायेगी। वही दौड़ जहाँ हजारों को एक साथ दौड़ा दिया जाता है और इस भेड़िया धसान में कुछ सौ आगे निकल पाते हैं फिर वर्दी तान वो खड़े हो जाते हैं इस भरोसे के साथ की कुछ पैसे जुटा लेंगे तो गाँव का घर पक्का करवा देंगे। इनके परिवार की हैसियत नहीं होती की इन्हें इंजीनियरिंग करवा सके। यह अलग बात है की बीटेक फ्रॉड के शिकार कहीं शिकायत भी नहीं कर सकते।

It's only fair to share...Email this to someoneShare on FacebookShare on Google+Tweet about this on TwitterShare on LinkedIn

Facebook Comments