उल्लू बना गया बीबर

सोशल मीडिया के चलते दुनिया को अनेक नए ढंग के कलाकार मिले हैं, जिनमें प्रमुख नाम कनाडाई गायक जस्टिन बीबर का है। बचपन में उनके गाए कुछ गीतों को उनकी माँ ने यूट्यूब पर डाल दिया और संगीत की दुनिया से जुड़े एक टैलेंट मैनेजर की नजर उन विडियो पर पड़ गयी, जिसने बीबर को मंच प्रदान किया फिर वह किशोर एक सनसनी के रूप में उभरा।

बीबर के भारत आने का जबरदस्त बिगुल फूंका हमारी ‘माननीय’ भारतीय मीडिया ने

आलम यह है की मात्र तेईस साल की उम्र में वह दुनिया का बहुत बड़ा सितारा है, जिसके खाते में ग्रैमी अवार्ड के साथ ही ट्विटर पर नौ करोड़ से अधिक फालोवर्स हैं। हमारे देश में जिन लोगों ने बीबर का नाम नहीं भी सुना होगा उन लोगों का सामान्य ज्ञान मीडिया ने बढ़ाया और मुम्बई में हुए उसके बहुप्रचारित कॉन्सर्ट से पहले इतनी मीडिया हाइप बना दी गयी कि दूर दराज के लोगों को भी उसके बारे में पढ़ने और सुनने को मिल गया।

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उसने परपज टूर नाम से अपना कार्यक्रम बनाया था और यहाँ तो बिना किसी परपज के ही हाइप बना दी जाती है और विदेशियों के नाम पर लहालोट हो जाना कोई बड़ी नहीं। याद ही होगा कि कैसे जब माइकल जैक्सन का कार्यक्रम बना था तब भारतीय संस्कृति की बात करने वाले बाल ठाकरे उसकी मेजबानी करके गर्व महसूस कर रहे थे। जस्टिन शहरी अंग्रेजीदां किशोरों और युवाओं का प्रिय गायक है, यानी वह पीढ़ी जो अंग्रेजी ही ओढ़ती-बिछाती है और नाश्ता भी अंग्रेजी ही करती है।

बीबर सुर्खियों में छाए रहे, लेकिन यह पॉप स्टार तो उल्लू बना गया

जस्टिन के आने से पहले अखबारों में उसकी पसंद के रंग के फूलों से लगायत परदे और सोफे के कवर के बारे स्पेशल चॉइस से लेकर उसके खाने की फरमाइश और बबलगम से लेकर पीने के पानी के बारे में भी विस्तार से छप रहा था, मानो यह ऐसी जानकारी हो जो पाठकों तक पहुंचानी बहुत जरूरी है।

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खाने पीने की लिस्ट देख कर लग रहा था की एक रात का फ़ूड फेस्टिवल होने वाला है। दो फाइव स्टार होटलों में उसके लिए बुकिंग थी और खबर थी की बॉलीवुड भी उसके लिए पार्टी प्लान कर रहा है, लेकिन इस युवा ने बॉलीवुड को मेजबानी का मौका नहीं दिया और शाहरुख से लेकर सलमान की मेजबानी वाली योजना धरी रह गयी। साठ हजार की क्षमता वाले डीवाई पाटिल स्टेडियम में टिकटों की बिक्री बताया जाता है की ईएमआई पर भी हुई, क्योंकि कीमत पांच हजार से पचहत्तर हजार तक बताई गयी। मुम्बई के बाहर के भी लोग पहुंचे 90 मिनट के धमाल का दर्शन करने। फ़िल्मी दुनिया से कौन-कौन लोग, क्या-क्या पहन कर पहुंचे इसकी भी डिटेल दी गयी।

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बीबर ने अपने फैन्स को दिया धोखा, मुंह टपटपाते चलते बने

पूरा हल्ला मचाया गया और जो हुआ उसके बाद तमाम लोग अब सोशल मीडिया पर गालियां बक रहे हैं, क्योंकि लोगों ने देखा कि जब बीबर तौलिये से अपना मुँह पोछ रहा था या पानी की बोतल मुँह में लगाए हुए था तब भी गाने चल रहे थे, जिससे साफ़ होता है की वह लिप सिंकिंग कर रहा था यानि गाना पीछे बज रहा था और वह केवल अपने होठ हिला कर लाइव गाने का आभास करा रहा था।

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बताया जाता है की 90 मिनट के कार्यक्रम में उसने केवल तीन गाने लाइव गाए बाकी रिकार्ड बजता रहा फिर स्टेडियम में भेड़िया धसान करके धमाल मचाने पहुँची भीड़ का कौन सा परपज हल हुआ ?

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लिप सिंकिंग पर ध्यान किसका जाता, ‘बीबर फीवर’ में पगलाए हुए थे लोग

स्टेडियम के भीतर पानी की बोतल और खाने-पीने की चीजें ले जाने की मनाही थी तो पानी भी सौ रुपए बोतल बिका और ठंढे समोसे भी दो रुपए प्रति पीस बिक गए लेकिन किसी ने देश के तमाम इलाकों में चल रहे सूखे और किसानों की आत्महत्या की चर्चा नहीं की और लोग ‘बीबर फीवर’ में पगलाए रहे। आखिर उस भीड़ का परपज क्या है? बीबर ने देश की जनता को क्या समझा जो इस तरह से उल्लू बना कर रातों रात निकल लिया। जी हाँ, वह जिस तामझाम के साथ आया था और चर्चा थी की आगरा और जयपुर भी जाएगा, बॉलीवुड की पार्टी में जाएगा, सब धरा रहा गया और कॉन्सर्ट खत्म करने के बाद देर रात वह मुम्बई से उड़ गया अपने परपज टूर के अगले पड़ाव की तरफ। उसके लिए की गयी सुरक्षा व्यवस्था की भी खूब चर्चा हुई, उसे न जाने किससे जान का खतरा था। जितना जोश उसके आने से पहले दिखाया गया उतनी ही मलानत उसके जाने के बाद हुई और तमाम लोग तो टिकट लेने वालों के साथ धोखा करने के आरोप के साथ उससे माफी मांगने की भी बात करने लगे।

ठगे गए लोग

बड़े जोश से स्टेडियम की भीड़ में शामिल होने वाली तमाम बॉलीवुड सेलिब्रेटी को लगा कि वे लोग ठगे गए हैं और उन लोगों ने ट्विटर पर अपनी भड़ास निकाली, लेकिन इस सबसे क्या फर्क पड़ता है। आयोजकों का अपना परपज तो हल हो ही गया और विदेशियों की नजर में हम हिन्दुस्तानी अमूमन इतनी ही हैसियत रखते हैं कि वो केवल अपना उल्लू सीधा करके निकलते बनते हैं। यह अलग बात है कि बीबर को पैसे की कमी नहीं, लेकिन अगर पहले से घोषणा हो जाती की वह केवल लिप सिंकिंग करेगा, तो निश्चित ही उतनी भीड़ नहीं जमती। कुछ लोगों ने उसके कपड़ों पर भी सवाल उठाए कि जैसे लग रहा था वह अपने सोने के कपड़े पहन कर स्टेडियम में जमा भीड़ को बेवकूफ समझते हुए कुछ उछलकूद करके चलते बना।

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उसके लिए क्या फरक पड़ता है, इतनी कम उमर में जो शोहरत मिल गयी है वह बहुत ही कम लोगों को नसीब होती है। कमी हमारे भीतर की ही उस भीड़ की है जो नाम या ब्रांड के चक्कर में दीवानी हुई जाती है। इस वर्ग के लिए पहनावे से लेकर खानपान तक में ब्रांड की ही बात होती है, वर्ना गायक तो अपने देश में बहुतेरे पड़े हुए हैं जो रात भर लोगों को बांधे रह सकते हैं।

ऐसा कॉन्सर्ट देखकर कौनसा परपज हल हुआ भई?

तमाम ऐसी प्रतिभाएं हैं जो दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रही हैं और बीबर के नब्बे मिनट के कार्यक्रम के लिए लगभग सौ करोड़ का बजट था। बताइए भला कोई कहेगा कि इस देश में कहीं भुखमरी है और बेरोजगार युवाओं की फ़ौज तैयार है? स्टेडियम में जाने वाली भीड़ ही महंगे मोबाईल और लैपटॉप से देश की समस्याओं पर भी चिंतन करती है और देश बदलने का दावा करती है। यही भीड़ भारत माता की जय के नारे के साथ उत्तेजक माहौल भी बनाती है, लेकिन यह डरपोक भीड़ भी है। यह अपने नेताओं की अंधभक्त भी होती है कुछ उसी भाव से जिस भाव से बीबर के लिप सिंकिंग का परफार्मेंस देखने गयी थी।

अफसोस… बीबर फीवर टाइप की बीमारियों से बुरी तरह जकड़ा हुआ है भारत

एक लेख पढ़ रहा था कि उसी समय लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की कश्मीर में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। परपज टूर वाले कॉन्सर्ट में गयी भीड़ यह सवाल भी नहीं उठाती कि जब नब्बे मिनट के कार्यक्रम के लिए आने वाले गवैए के लिए इतनी अधिक सुरक्षा व्यवस्था हो सकती है, तो भयानक रूप से अशांत चल रही घाटी में छुट्टी लेकर शादी में जाने वाले वहीं के नौजवान अफसर के साथ प्रशासन ने पांच-छह सुरक्षाकर्मी भी दे दिया रहता तो देश पर कितना खर्चा चढ़ जाता? आईबी से लेकर लोकल इंटेलिजेंस तक को तो पता ही रहा होगा की माहौल कितना खराब है। बच गया रहता एक कश्मीरी नौजवान जो काफी लम्बे समय तक युवाओं को प्रेरणा देने का काम कर सकता था।

लेकिन आप पूछेंगे कि जस्टिन बीबर के बारे में चर्चा करते समय उमर फैयाज को याद करने का क्या परपज है? है न भाई, हम हिन्दुस्तानी ऐसे ही हैं जो नब्बे मिनट के कार्यक्रम पर सौ करोड़ उड़ा देने को हलके में ले लेते हैं, फालतू के कार्यक्रम के लिए पचास हजार से अधिक का टिकट ले सकते हैं, लेकिन अपने नेताओं के सामने वास्तविक सवाल न उठा सकते हैं, न ही इसके बारे में गंभीरता से चर्चा ही कर सकते हैं। अफसोस भीड़ का बड़ा हिस्सा बीबर फीवर टाइप की तमाम बीमारियों से बुरी तरह जकड़ा हुआ है।

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