कश्मीर: हिंसा के बीच उपचुनाव

कश्मीर घाटी की बात इस समय होनी चाहिए थी तो इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना, जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर चेनानी-नाशिरी सुरंग के तैयार हो जाने के कारण। अपनी कई विशेषताओं के चलते दुर्गम परिस्थितियों में तैयार यह सुरंग वाकई देश की एक उपलब्धि है, लेकिन इस समय चर्चा है तो केवल घाटी में चल रही पत्थरबाजी की।

पत्थरबाजी के साथ ही सुरक्षाकर्मियों के हथियार छीने जाने की घटनाओं में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है। सबसे चिंताजनक स्थिति है राज्य में तैनात पुलिसवालों के घरों पर आतंकियों के हमले की। पहले इस तरह की बातें इक्का-दुक्का होती थीं, लेकिन फिलहाल तो इन हमलों की संख्या भी काफी बढ़ गयी है। बुरहान वानी के बाद सोशल मीडिया पर अपने एजेंडे को लेकर आग भड़काने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। हिजबुल के कथित नये कमांडर जाकिर रशीद भट्ट ने स्वयंभू गद्दी सम्भालते समय ही सोशल मीडिया पर सन्देश दे दिया था कि यदि पुलिस वाले किसी अलगाववादी के परिजनों को तंग करेंगे तो उनके भी घर वालों को छोड़ा नहीं जाएगा। वो चाहे जम्मू रहते हों या कन्याकुमारी। दिल्ली में बैठ कर ‘भटके हुए’ लड़कों को राह पर लाने की सरकार को सलाह देने वाले भी यह भूल रहे हैं कि आज़ादी के नाम पर चलाया जा रहा धंधा भी इन्हीं लड़कों के दम पर टिका हुआ है। टीवी चैनलों पर आजकल कश्मीर एक्सक्लूसिव कार्यक्रमों की बाढ़ आ चुकी है, जिसमें ख़ुफ़िया कैमरों से कुछ लड़कों से बात हो रही है कि कैसे उन्हें पत्थर मारने के लिए पैसे दिए जाते हैं।

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इसमें एक्सक्लूसिव कुछ भी नहीं है, क्योंकि जुम्मे की नमाज़ के बाद घाटी में मस्जिद से निकलने के बाद सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकना एक पुरानी रिवायत बन चुकी है

कश्मीर में हिंसा के बीच ‘बैलेट की जंग’

कुछ अलगाववादियों की तरफ से आज़ादी के नारे की जगह इस्लाम को ऊपर रखने की बात को घाटी से बाहर तमाम लोग नयी चीज के रूप में देख रहे हैं, जिससे पता चलता है कि कितने अंजान बने हुए हैं वो लोग जो कश्मीर पर गाहे बेगाहें अपनी राय देते रहते हैं। धर्म और जाति से केवल यूपी-बिहार में ही राजनीति की दिशा तय नहीं होती। समूचे देश का यही हाल है और कश्मीर भी इसी देश का हिस्सा है।

सेक्युलर कहे जाने वाले शेख अब्दुल्ला भी अपना चुनाव गरमाने के लिए धार्मिक स्थलों का भरपूर इस्तेमाल करते थे और उनकी गिरफ्तारी के बाद लाहौरी नमक और हरे रुमाल का जो इस्तेमाल उनके दल ने किया था उसके बारे में पढ़ना चाहिए। भाजपा के साथ सरकार बना कर महबूबा मुफ़्ती भले ही भगवा राष्ट्रवादियों के बीच प्रसंशा की पात्र बनी हों, लेकिन उनकी सियासत भी मजहब का साथ लेकर ही शुरू हुई थी। उनके पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद साहब भले ही नपातुला बोलने वाले और हमेशा दिल्ली के नजदीक दिखने वाले नेता रहे हों, लेकिन महबूबा की धारा शुरू से ही ऐसी थी कि अलगाववादी और हुर्रियत के लोग उन्हें मेनस्ट्रीम में अपना चेहरा मानते थे, क्योंकि वो कांग्रेस के साथ ही अब्दुल्ला एंड संस की नेशनल कांफ्रेंस से निराश थे। ऐसे गुटों को अब्दुल्ला परिवार दिल्ली का एजेंट लगता था। इस परिस्थिति में पीडीपी का भाजपा से मिलकर सरकार बना लेना घाटी के इतिहास की बड़ी घटना है।

सियासत की इस लड़ाई में बदलते हैं तेवर

मुख्यमंत्री के रूप में महबूबा के एक साल पूरे होने वाले हैं और इस बीच उनके बयानों में जो बदलाव दिख रहे हैं, वो केवल सत्ता में बने रहने के बयान नहीं दिखते। लगता है कि वो वाकई गंभीर हैं लेकिन यह भी सच है की वहां नेशनल कन्फ्रेसं और पीडीपी में से जो सत्ता में रहता है, वह दिल्ली से सुर मिलाता है और बाहर आने पर हुर्रियत के प्रवक्ताओं जैसी बात करने लगता है।

महबूबा मुफ़्ती ने घाटी के अभिभावकों से अपील की है कि कहीं भी मुठभेड़ के वक्त परिवार के लड़कों को बाहर न निकलने दें और उन्हें अलगाववादियों की साजिश का भागीदार न बनने दें, जिसके चलते उन्हें गोलियों का शिकार होना पड़े। महबूबा कह रही हैं कि शांति बहाली न होने कारण ही राज्य में विकास की तमाम योजनाओं को जमीन पर उतारने में सफलता नहीं मिल पा रही है और यही उनके विरोधियों का एजेंडा है, ताकि सरकार की छवि खराब की जाए और विरोधियों के पक्ष में माहौल बने। बुरहान वानी की मौत के बाद उपजे बवाल के समय भी उन्होंने कहा था कि ‘जिन्हें छर्रे लगे हैं वो टॉफी-दूध लेने बाहर नहीं निकले थे।’ घाटी में रह कर इस तरह के बयान पहली बार किसी नेता ने दिया था। कम से कम ऐसे बयानों की तारीफ कांग्रेस और अब्दुल्ला पिता-पुत्र को भी करनी ही चाहिए थी, क्योंकि उमर अब्दुल्ला के मुख्यमंत्री रहते समय भी सौ से अधिक पत्थरबाज मारे गए थे और यह समस्या भी उसी समय से तेजी से बढ़ी है।

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मुख्यमंत्री बनने से पहले महबूबा मुफ़्ती जब विपक्ष में थीं तब उनके प्रमुख कार्यक्रमों में शामिल था सुरक्षाबलों की गोली से मारे गए किसी अलगाववादी के चालीसवें पर उसके घर जाना। वहां वह ‘पीड़ित’ परिवार को कुरान भेंट करती थीं और मृतक के संघर्ष को आगे जिन्दा रखने की बात करती थीं। शायद कश्मीर के सियासत की यह एक ऐसी मजबूरी होगी जिसे बाहर वाले समझ भी न पायें, लेकिन महबूबा का यह एक्टिविज्म ही कश्मीर के सबसे अशांत रहने वाले इलाके को उनकी पार्टी का गढ़ बनाने में सहायक हुआ। उसी क्षेत्र में आने वाली अनंतनाग लोकसभा सीट इनकी पारिवारिक विरासत बन गई।

पीडीपी का चुनाव चिन्ह, हरे झंडे पर कलम-दवात भी घाटी के लोगों के लिए काफी भावनात्मक रिश्तों वाला है, क्योंकि यह पहले मुस्लिम युनाइटेड फ्रंट का निशान था। 1987 के विधान सभा चुनाव के समय फ्रंट को काफी जनसमर्थन था, लेकिन आरोप लगाया जाता है की दिल्ली की शह पर चुनाव में काफी धांधली की गयी, जिससे नेशनल कांफ्रेंस की सरकार बन गयी और फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री की वापसी हो गयी।

आम कश्मीरी पढ़े लिखे लोग इस धांधली के लिए राजीव गाँधी को भी आजतक नहीं माफ़ करते क्योंकि इस चुनाव में कश्मीरियों ने मुस्लिम युनाइटेड फ्रंट के लिए काफी जोश दिखलाया था, लेकिन हार के बाद, धांधली का आरोप लगाते हुए फ्रंट से जुड़े तमाम नेताओं ने चुनावी प्रक्रिया से दूरी बना ली। उनका मानना था की अब लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात नहीं सुनाई जा सकती और फिर शुरू हुआ हिंसा का जबरदस्त दौर।

सैयद सलाहुदीन और यासीन मालिक जैसे लोगों की उपज इसी चुनाव से मिली निराशा से हुई। इस चुनाव के दस साल बाद मुफ़्ती ने कांग्रेस से अलग राह पकड़ ली और अपनी पार्टी बनाई। महबूबा मुफ़्ती को उनके पिता ने आगे बढ़ाया और महबूबा चुनावी रैलियों और प्रेस कांफ्रेंस में अपने चुनाव चिन्ह का इतिहास लोगों को जरूर याद कराती थीं। इनके पिता अनंतनाग से जीतते रहे और फिर 2014 के चुनाव में वहां इनकी जीत हुई थी। तो जिस चेहरे के साथ महबूबा ने राजनीति आगे बढ़ाई और फिर अब उनका जो बदलाव दिख रहा है वह पाकिस्तान या अलगाववादियों के साथ दोनों मुख्यविपक्षी दलों को भी नहीं भा रहा है। राजनैतिक अलगाव अलग मुद्दा है, लेकिन घाटी की अपनी जो विकराल समस्या है उसके समाधान के लिए सभी दलों को एक होना चाहिए जो होता नहीं दिख रहा है जो हो भी कैसे? विपक्ष में रहते हुए महबूबा का भी रवैया वही रहा है, जिससे अर्थ यह लगा लीजिये कि वहां देश के बाकी हिस्सों की तरह विपक्ष भी बस विरोध के लिए ही विरोध वाले काम में लगा हुआ है।

राजनैतिक मोर्चे पर कश्मीर से बड़ी खबर यह है कि वहां महबूबा की पार्टी पीडीपी के संस्थापक सदस्य रहे तारिक हमीद कर्रा अब कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं, कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया जा सकता है। महबूबा के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद कर्रा को पीडीपी अध्यक्ष बनाये जाने का अनुमान लोग लगा रहे थे, लेकिन महबूबा ने उस पद को भी अपने ही पास रखा।

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कर्रा भाजपा के साथ गठबंधन के भी शुरू से ही खिलाफ थे और उन्होंने पिछले साल पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था। वो श्रीनगर से सांसद भी थे, जहाँ उन्होंने फारुख अब्दुल्ला को हराया था। संसद की सदस्यता से भी उन्होंने पार्टी छोड़ते समय ही इस्तीफ़ा दे दिया था।

सत्ता के खेल से कश्मीर भी नहीं है अछूता

इस तरह अब कश्मीर में लोकसभा की दो सीटें, अनंतनाग और श्रीनगर के लिए 9 अप्रैल को उपचुनाव होने हैं। अनंतनाग इसलिए क्योंकि वहां से महबूबा सांसद थीं और उनके इस्तीफे के बाद अशांत माहौल के चलते ही अभी तक उपचुनाव नहीं हुए। कांग्रेस का तारिक हमीद कर्रा को स्वीकार करना भी देश की राजनीति का वही हिस्सा है, जहाँ विचारधारा की जगह चुनावी गणित देखी जाती है।

कर्रा पीडीपी के फायरब्रांड चेहरा रहे हैं। यानी खुलकर अलगाववादियों के पक्ष में वही सब बोलने वाले जो महबूबा या कांग्रेस के नेता नहीं बोल सकते। पीडीपी से इस्तीफ़ा देने के बाद उन्होंने जनता से पीडीपी-भाजपा गठबंधन के खिलाफ जेहाद छेड़ने की आवाज़ लगाई थी, क्योंकि उनके मुताबिक भाजपा के एजेंडे के साथ चलने वाली महबूबा सरकार में कश्मीरियत की हिफाजत नहीं हो सकती। इससे भी बड़ी बात है कि 2008 में कश्मीर में कांग्रेस-पीडीपी गठबंधन सरकार को गिराने में उनकी भी मुखर भूमिका थी।

सियासत देखिये की आज कांग्रेस में उनके शामिल होने पर आज़ाद बधाई दे रहे हैं और पार्टी ट्विटर पर सोनिया जी और राहुल गाँधी के साथ उनकी फोटो लगा रही है क्योंकि मकसद केवल चुनावी गणित ही है।

जिनको आज घाटी में मजहब के इस्तेमाल पर चिंता हो रही है, उन्हें जून, 2008 को भी याद रखना चाहिए जब गुलाम नबी सरकार गिरी थी। मुद्दा था अमरनाथ श्राइन बोर्ड को सरकार की तरफ से 99 एकड़ जमीन दिए जाने का। कर्रा पीडीपी कोटे से वित्त मंत्री थे। सरकार के निर्णय का महबूबा मुफ़्ती ने जोरदार विरोध किया, जिसपर उमर अब्दुल्ला ने कहा की फैसला कैबिनेट का है और उसमें महबूबा के भी मंत्री शामिल थे। पीडीपी सरकार में भी थी और उसने अलगाववादियों के साथ घाटी में इस मसले पर बंद का समर्थन भी किया। घाटी में जबरदस्त हिंसक प्रदर्शन होने लगे, क्योंकि अलगाववादियों को मौका मिल गया।

Srinagar: Protesters, amid tear smoke, hurling stones at security personnel during a clash after a protest over beef ban, near Eidgah in Srinagar on Friday. PTI Photo by S Irfan (PTI9_25_2015_000137B)

हजारों की भीड़ नियंत्रण रेखा पर मुजफ्फराबाद की तरफ मार्च करने लगी इस नारे के साथ की उनका हिन्दुस्तान से कोई व्यापार नहीं होगा और उनके सारे फल पाकिस्तान की मंडियों में जायेंगे। सुरक्षा बलों की फायरिंग में तमाम मौतें हुईं और पीडीपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। बढ़ती हिंसा को देखकर उमर अब्दुल्ला ने श्राइन बोर्ड को खुद ही जमीन वापस करने की सलाह दी, ताकि शांति बहाली हो सके। सेक्युलरिज्म और गंगा जमनी तहजीब की वकालत करने वालों को भी आम कश्मीरियों का यह व्यवहार याद रखना चाहिए, क्योंकि इस तरह के उपद्रव पहले नहीं हुए थे और दो समुदायों के बीच गहरी खाई इसी समय पड़ी जो बाद में और गहरी होती गयी। 

हालात बिगड़ते देख कर राज्यपाल ने एलाटमेंट रद्द कर दिया और घाटी में विरोध प्रदर्शन रुक गए। एलाटमेंट रद्द होने का नतीजा यह हुआ की की जम्मू में हिन्दुओं के विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। एक युवक और एक डाक्टर ने जहर खाकर जान दे दी कि सरकार हिन्दू हित में कुछ नहीं कर सकती, इसका नतीजा यह हुआ कि जम्मू और हिन्दू बहुल इलाकों में भी हिंसक प्रदर्शन होने लगे और फौज की तैनाती करनी पड़ी।

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दिल्ली में सर्वदलीय बैठक बुलाई गयी और एक प्रतिनिधिमंडल श्रीनगर भेजा गया। चूँकि अपनी राजनीति सबपर भारी होती है इस नाते फारुख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती ने उस प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इंकार कर दिया। उधर पीडीपी के अलग होने के बाद अल्पमत में आ चुकी कांग्रेस सरकार के मुखिया गुलामनबी आजाद ने इस्तीफ़ा दे दिया। सोचिये आज कितना बदल चुका है समय की वही महबूबा भाजपा के साथ सरकार चला रही हैं और कांग्रेस कर्रा के साथ अपने नेताओं की तस्वीर दिखा कर खुश है।

महबूबा के लिए बड़ी चुनौती, क्या कायम रख पाएंगी वर्चस्व?

अब श्रीनगर और अनंतनाग की लोकसभा सीटों को जीतना महबूबा के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि अब वो अलगाववादियों की पसंद नहीं रहीं। अलगाववादियों के मुताबिक गद्दी के लिए भाजपा से समझौता करके उन्होंने कश्मीर से गद्दारी की है।

उनके साल भर के शासनकाल में हिंसा भी चरम पर रही है जो शायद वो भाजपा के साथ नहीं रही होतीं तो न होती। हालाँकि पत्थरबाजी के बीच भी गिलानी के रिश्तेदार की सरकारी नौकरी लगी ही है और पाकिस्तान में ‘कश्मीर की आज़ादी’ के लिए लड़ने वालों के बच्चों के लिए आरक्षित मेडिकल की सीटों पर कश्मीरी नेताओं और अफसरों के बच्चों और दूसरे रसूख वालों के बच्चों को जगह मिलने की बात सामने आ ही रही है।

बताया जाता है कि ऐसे बच्चों के प्रवेश के लिए अलगाववादी नेताओं की चिट्ठी की जरूरत होती है जिसमें बताया जाता है कि इसका परिवार हिन्दुस्तान से लड़ रहा है। इस मामले में घोटाले की बात उठी है कि आज़ादी की जंग लड़ते हुए भी हिंदुस्तान के सुरक्षाबलों के सुरक्षित घेरे में रहने वाले इन तमाम नेताओं ने पैसे लेकर सिफारशी चिठ्ठियाँ लिखने का बड़ा काम किया है।

ऐसे ही लोगों के बीच महबूबा के भाई तसद्दुक हुसैन मुफ़्ती भी हैं, जो मुफ़्ती साहब के जीते कभी सियासी गलियारे में नहीं दिखे लेकिन अब वो अनंतनाग से अपनी बहन की छोड़ी हुई लोकसभा सीट पर पीडीपी प्रत्याशी हैं। घाटी छोड़ कर अमेरिका सिनेमेटोग्राफी का कोर्स करने जाने वाले तसद्दुक के लिए भी और महबूबा के लिए भी अब बड़ी चुनौती है कि वो साबित कर सकें कि उनकी पकड़ अपने इलाके में कायम है। विशाल भारद्वाज की फिल्म ओंकारा और कमीने में अपने कैमरे का कमाल दिखा चुके तसद्दुक राजनीति से हमेशा दूर रहे, लेकिन वो अपने इलाके में लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए चुपचाप मदद करते रहे। कॉफ़ी की दुकान खुलवाने से लेकर कढ़ाई-नक्काशी करने वाले पारम्परिक कामगारों के लिए भी उन्होंने बम्बई से आकर काफी मदद की, आर्थिक रूप से और फिर उन्हें बाज़ार दिलाने के लिए भी। अब जब कि हम टीवी में पत्थरबाजी का रेट देख रहे हैं तब तसद्दुक के काम का वजन पता चलता है जो उन्होंने कुछ ही लोगों की मदद की, लेकिन की तो। तसद्दुक का मुकाबला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर से है। जाहिर है कि मीर के पक्ष में पीडीपी के पूर्व फायरब्रांड नेता कर्रा भी रहेंगे ही। ऐसे में देखना है कि कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस को कर्रा का साथ फायदा पहुंचाता है या फिर महबूबा की हिदायतों पर लोग ध्यान देते हैं।

हिंसा से जूझ रही घाटी में किसकी होगी जीत ये देखना दिलचस्प होगा

फारुख अब्दुल्ला भी श्रीनगर से फिर लड़ रहे हैं, जहाँ उनको हराने वाले तारिक कर्रा अब उनके लिए प्रचार करेंगे तो यह सीट भी अब महबूबा के लिए भारी पड़ने वाली है। शांति और आज़ादी अपनी जगह, चुनावी गणित अपनी जगह। यह भी गौर करने वाली बात है की विभागों में फेरबदल से नाराज महबूबा के दो मंत्रियों ने भी अभी हाल में ही पार्टी से इस्तीफ़ा दिया है यह कहते हुए की वह पार्टी कार्यकर्ताओं की सुनने की जगह केवल अपने चचा सरताज मदनी और बरमुला के पार्टी सांसद मुजफ्फर हुसैन बेग का ही सुनती हैं और अब पीडीपी वह पार्टी नहीं रह गयी जो पहले हुआ करती थी।

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