केरल: गॉड के अपने देश में पादरी का पाप

नए साल की शुरुआत में पोप फ्रांसिस ने एक सार्वजनिक पत्र लिखा था जो केवल चर्च के पादरियों द्वारा बाल यौन शोषण के बढ़ते अपराधों के लिए वेटिकन की तरफ से क्षमा याचना थी। पोप फ्रांसिस कई मामलों में क्रांतिकारी माने जाते हैं, क्योंकि वह परम्परागत तरीके से नहीं, बल्कि अलग सोचते हैं और बोलते भी रहते हैं।

चर्च में हो रहे ‘पाप’ को लेकर पोप फ्रांसिस ने जाहिर की थी अपनी चिंता

इसके बारे में भी तमाम लोग कहते हैं कि नए दौर में जब विकसित देशों में लोग चर्च से दूर हो रहे हैं और पिछड़े इलाकों में चर्च के लोगों की अनुशासनहीनता की बढ़ती खबरों से अनुयायियों के बीच अविश्वास बढ़ रहा है, तब पोप के लिए ऐसे बयान आवश्यक हो जाते हैं। जो भी हो, लेकिन 2 जनवरी 17 को पोप का पत्र सामने आने पर पूरी दुनिया में चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने लिखा था कि “पादरियों द्वारा नाबालिगों के साथ यौन अपराधों से खुद मदर भी दुखी हैं। उन बच्चों की पीड़ा असह्य है। हम सब पीड़ितों की तकलीफों में उनके साथ हैं और इस पाप के लिए रो रहे हैं। चर्च रो रहा है। संरक्षक लोग ही अपराध कर रहे हैं। ऐसे अपराधियों को बचाने, ताकत के इस्तेमाल का पाप, ऐसे अपराधों को ढकने का पाप, इन अपराधों के प्रति असंवेदनशील बने रहने का पाप…..चर्च भी रो रहा है। आइये हम अपने भीतर इतना साहस पैदा करें कि हम अपने बच्चों की रक्षा कर सकें, ताकि ऐसे अपराध दोबारा न हों। हम संकल्प लें की ऐसे मामलों (बाल यौन अपराध) में हम ‘जीरो टोलरेंस’ की नीति अपनाएंगे।”

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जाहिर है पोप का नए साल पर यह पत्र काफी दुखद स्थिति बन जाने के बाद ही लिखा गया होगा और इसमें समस्या की गंभीरता भी झलकती है, क्योंकि इक्के-दुक्के मामलों के लिए पोप सार्वजनकि रूप से क्षमा याचना और संकल्प की बात नहीं कर रहे थे। उनको अपने लोगों के बीच चर्च के भरोसे को बनाए रखने का ईश्वरीय आसन मिला हुआ है। इस पत्र की खूब व्याख्या हुई और पोप की इस साफ़गोई की काफी तारीफ भी हुई।

नाबालिग रेप पीड़िता ने दिया बच्चे को जन्म, चर्च के पादरी ने किया था दुष्कर्म

केरल दिल्ली से दूर है, बहुत दूर लेकिन पाठकों की रूचि के अनुकूल वहां की खबरें दिल्ली से भी छपती ही हैं, जिनमें अधिकतर अंग्रेजी अखबार ही शामिल रहते हैं। हिंदी अखबार और टीवी चैनलों ने देश को दिल्ली और उसके आसपास ही केन्द्रित रखा हुआ है, जिसके चलते हिंदी पढ़ने-सुनने वाले केरल की एक बड़ी घटना से वंचित रह गए। 7 फरवरी को कन्नूर जिले के क्रिस्तुराजा अस्पताल में 16 बरस की एक अविवाहित लड़की को बच्चा होता है। बच्चे को वहां से बगल के जिले में एक अनाथालय में डाल दिया जाता है। डिलवरी की प्रक्रिया भी काफी गोपनीय ढंग से होती है और उसका कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता है। न अनाथालय और न ही बाल कल्याण समिति में नियमानुसार सूचना और रजिस्टर नियमित करने की कार्रवाई होती है। एक दिन चाइल्ड हेल्पलाइन को एक गुप्त सन्देश मिलता है की बच्चे का पिता एक काफी प्रभावशाली पादरी है और चर्च की तरफ से मामला दबाने का खेल चल रहा है। हेल्पलाइन से सूचना पेरावूर पुलिस थाने को दी जाती है। पुलिस उस लड़की के घर जाती है जो बताती है कि उसके पिता ने ही बलात्कार किया था। गरीब कृषि श्रमिक पिता भी पुलिस के सामने इस अपराध को स्वीकार करता है।

बाप ने बोला झूठ, ‘मैंने अपनी बेटी का रेप किया है‘ मगर क्यों?

जब पेरावूर पुलिस थाने से गया जांचकर्ता कहता है कि अपनी बेटी से बलात्कार के केस में उसे लम्बी जेल मिलेगी, तब वह गरीब बिफर पड़ता है और उसके साथ ही उसकी पत्नी भी बताती है कि बलात्कार सेंट सेबेस्टियन चर्च के पादरी फादर रोबिन उर्फ़ मैथ्यू वाडक्कमचेरी ने किया और मामला दबाने के लिए मोटी धनराशि भी दी गई है। इसके इतर फादर और चर्च की प्रतिष्ठा पर आंच न आने पाए इसलिए किसी को आरोपी बनाने को कहा गया था। अभागे बाप ने कहा कि ‘मैं किसको खोजता, खुद अपने ऊपर ही आरोप ले लिया।’’ देश के अधिकांश लोगों की तरह यह गरीब परिवार भी जबरदस्त धार्मिक है और चर्च की बदनामी के पाप से बचने के लिए खुद ही अपने ऊपर पाप ले लिया था।

लड़की चर्च से लगे हुए उसी स्कूल में पढ़ती थी, जिसका मैनेजर भी फादर रोबिन ही था और कुकर्म तब हुआ जब वह चर्च में प्रार्थना के लिए गई थी। ध्यान रहे पोप के क्रांतिकारी पत्र के बाद भी स्कूल, चर्च, अस्पताल या फिर अनाथालय की तरफ से पुलिस को कोई सूचना नहीं दी गई थी और मामले को दबाने की पूरी योजना बन गई थी।

28 फरवरी को त्रिचूर जिले से फादर रोबिन को गिरफ्तार कर लिया गया जब वह कनाडा भागने के लिए अपना चर्च छोड़ चुका था, क्योंकि उसे पीड़ित के घर पहुंची पुलिस और उसके बाद स्थानीय लोगों के आक्रोश का पता चल चुका था। हालाँकि, कुछ स्थानीय कैथोलिक लोग इस ‘अपराध’ के लिए लड़की को ही दोषी ठहरा रहे थे।

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फादर रोबिन को शिकंजे में लेती पुलिस

केरल में चर्च के प्रभाव को देखते हुए राजनैतिक दलों में से केवल भाजपा ने ही पहले मुद्दा उठाया। हाँ कुछ गैर सरकारी संगठनों ने भी आवाज़ उठाई, जिनमें चर्च में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम चलाने वाले कैथोलिक सुधारवादी संगठन भी रहे। कैथोलिक लेमैन्स एसोशिएशन के सी.एल.जार्ज ने सरकार से मांग की कि बिशप को भी कायदे से कानून के दायरे में लाना चाहिए और धार्मिक मान्यताओं के चलते उन्हें मिली अलिखित छूट बंद होनी चाहिए, क्योंकि उनकी बड़ी भूमिका रहती है ऐसे मामलों को दबाने में।

यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि अभियुक्त की गिरफ्तारी तब हुई जब वह देश छोड़ने की कोशिश में था, जबकि चर्च के नियमानुसार पादरियों को देश से बाहर जाने के लिए बिशप की स्वीकृति जरूरी होती है। कांग्रेस के बड़े नेता ए.के.अंटोनी ने कड़ी सजा की मांग की, लेकिन विधानसभा में नेता विपक्ष और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के साथ महिला कांग्रेस की तरफ से भी चुप्पी रही। हाँ, सत्ताधारी वामदल की तरफ से भी चुप्पी ही रही, जबकि उसके बड़े नेता, पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने खुलकर इस व्यभिचार के खिलाफ आवाज़ लगाई, जिसका कारण कभी चर्च द्वारा संचालित बड़े अखबार में उनके कार्यकाल में होने वाला लगातार विरोध रहा होगा। और वैसे भी अब उम्र के चलते वह चुनावी रेस से बाहर हैं। कहा तो यह भी जाता है कि अपराध के इलाके के कांग्रेसी विधायक ने भी अपनी पार्टी के लोगों को पीड़िता के घर जाने से रोका, क्योंकि चर्च की नाराजगी चुनावी गणित के हिसाब से ठीक नहीं। वह तो मसला राज्य स्तर का हो गया और तमाम संगठनों ने भी जिनमें कैथोलिक सुधारवादी भी शामिल हैं, मामला दबने नहीं दिया, तब सत्ताधारी वाम दल और विपक्षी कांग्रेस के नेता पीड़िता के घर गए और आरोपी फादर को कड़ी सजा की वकालत करने लगे।

पांच ननों सहित आठ के खिलाफ मामला दर्ज, क्या मिलेगा न्याय?

अब तक इस मामले में कुल आठ गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जिनमें मुख्य आरोपी के अलावा वायनाड जिले के बाल कल्याण समिति के तत्कालीन चेयरमैन फादर थामस जोसेफ थेरिक्कम, अनाथालय की इंचार्ज सिस्टर एफेलिया। अस्पताल की प्रसव सहायिका और कुछ दूसरी नन भी शामिल हैं।

रोमन कैथोलिक चर्च में कार्डिनल लोग शपथ लेते हैं कि वो हर उस बात को गुप्त रखेंगे, जिसके प्रकट होने पर चर्च को नुकसान होगा। जब शपथ ही ऐसी हो तो माननीय पोप क्या कर लेंगे, तमाम चिट्ठी लिखते हुए भी क्योंकि तभी तो फादर रोबिन की धर्म बहनों और बंधुओं की जमात ने पूरी गोपनीयता रखी थी। हालाँकि, किसी दूसरे ने मामला खोल दिया जिसने शायद यह शपथ न ली होगी, या यह भी हो सकता है उसे पोप की जीरो टोलरेंस वाली बात पर अडिग रहने का साहस मिला होगा।

कौन है फादर रोबिन?

सवाल है कि नियमित खर्च के लिए मामूली दस हजार महीने का भत्ता पाने वाले रोबिन ने कुछ खबरों के मुताबिक दस लाख रुपए देकर पाप लड़की के बाप पर डालने की असफल कोशिश की तो उसे इतने पैसे कहाँ से मिले? अस्पताल में भी उसी ने तीस हजार रुपए दिए थे। चर्च में पादरी की भूमिका से पहले फादर रोबिन मलयाली अखबार दीपिका का मैनेजिंग डाइरेक्टर रह चुका था। इस अखबार को मलायम का सबसे पुराना अखबार होने का गौरव प्राप्त है, जिसे 1887 में एक पादरी ने ही शुरू किया था। आज इसके सात संस्करण छपते हैं। इस अखबार पर भी उसी सीरियन-मालाबार चर्च का नियंत्रण है, जिसके अंतर्गत वो सेंट सबेस्टियन चर्च है जहाँ रोबिन पादरी था। यह अखबार ईसाईयों के बीच ही नहीं, बल्कि आम पाठकों के बीच भी काफी पकड़ रखता है। राज्य में कई बड़े-बड़े आन्दोलन भी खड़े करने में इसकी भूमिका रही है। यहाँ तक की राज्य में पहली कम्युनिस्ट सरकार, जो दुनिया में पहली ‘निर्वाचित’ कम्युनिस्ट सरकार थी, को गिराने में भी इसकी भूमिका रही है। यह हमेशा एंटी लेफ्ट रहा है, क्योंकि उसे यह चर्च का दुश्मन मानता है। पिछली बार जब अच्युतानंदन की सरकार थी तो कम से कम एक दो खबरें रोज मुख्यमंत्री के खिलाफ रहती थीं। यही कारण था कि रोबिन का नाम सामने आते ही सबसे पहले अच्युतानंदन ही आक्रामक हुए, वर्ना उन्हें तो अब बुढ़ापे में मार्गदर्शक मंडल में टिका दिया गया है। एक बड़े टीवी चैनल को भी यह अपनी सेवाएं दे चुका है। इसके अलावा वायनाड जिले में इन्डियन फार्मर्स मूवमेंट नाम से एक संस्था गठित करके हजारों किसानों से मोटी ठगी करने का भी आरोप है। बताया जाता है कि इसने कॉफी प्रोसेसिंग कम्पनी खोलने का वायदा करके रकम बटोरी और फिर दिल्ली भाग गया, जहाँ चर्च में ही नियुक्ति हो गई थी। अपने इलाके में वापस लौटने पर चर्च ने इसे बड़ी जिम्मेदारी दे दी और सीरियन-मालाबार चर्च के अधीन लगभग सौ स्कूलों का कार्पोरेट मैनेजर बना दिया गया।

धर्म का ये कैसा प्रभाव, पीड़ित परिवार ने माना भाग्य का लेखा-झोखा!

धर्म का प्रभाव इतना है कि अब भी पीड़ित परिवार के लोग चर्च को कुछ नहीं कह रहे हैं और मानते हैं कि उनके भाग्य में यही था और चर्च के प्रति निष्ठा में कोई कमी नहीं है। पिछले साल ही चर्च के ‘प्रोलाइफ मूवमेंट’ ने उस गरीब मजदूर को सम्मानित किया था, क्योंकि उसे पांचवां बच्चा हुआ था और यह मूवमेंट बड़े परिवारों को सम्मानित करता है, क्योंकि अनुयायियों की संख्या बढ़ती है। इस तरह के किसी भी मूवमेंट से हिंदी पट्टी वाले परिचित नहीं होंगे, जो गाहे-बेगाहे जनसंख्या को लेकर बयानबाजी सुनते रहते हैं।

गिरफ्तारी और बचने का कोई चारा न मिलता देख फादर रोबिन को फिलहाल चर्च से मुक्त कर दिया गया है। आरोपी पादरी के आर्कडायोसिस के बिशप ने भी पीड़ित के प्रति अब अपना सन्देश जारी कर दिया है- ‘प्रभु तुम्हारे आँसू देख रहा है और साथ में खुद आँसू बहा रहा है। मुझे केवल एक चीज कहनी है- ‘’सॉरी’’, प्रभु तुमको इससे उबरने में मदद करेगा। मैं प्रार्थना कर रहा हूँ यह सब प्रभु के सामने रख रहा हूँ। ऐसा कुछ हुआ जो नहीं होना चाहिए था।’

एक नन की किताब ने चर्च में हो रहे यौन शोषण का खुलासा कर हडकंप मचा दिया था, लेकिन इस प्रार्थना के आगे भी त्रिचूर के सेंट मेरी कालेज की पूर्व प्रिंसिपल ,साठ वर्षीया सिस्टर जेस्मी खड़ी हैं जो 33 साल तक नन रह चुकी हैं। उनका कहना है कि चर्च में यौन शोषण आम बात है और इनका आपसी सिंडिकेट एक दूसरे का बचाव करता रहता है।

अधिकांश गरीब और धर्मभीरु पीड़ित ऐसे मामलों में कहीं शिकायत नहीं करते। इन्ही सब मुद्दों को छूते हुए उनकी पेंगुइन इण्डिया प्रकाशित पुस्तक ‘आमीन: एन ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए नन ’ जब बाज़ार में आई तो हडकंप तो मचा, लेकिन दिल्ली की मीडिया और किसी फिल्म की हिरोइन की तरफ से उछाले गए मुद्दे पर टीवी स्टूडियो में नारीवाद और प्रगतिशीलता की धूम मचा देने वाले बड़े बड़े विचारक खामोश ही रहे। जबकि यह भी देश के अल्पसंख्यक समाज से जुड़ा बहुत गम्भीर मुद्दा है।

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उपासना की बजाय वासना का केंद्र बना चर्च?

सिस्टर जेस्मी ने पादरियों द्वारा यौन शोषण का जिक्र करते हुए लिखा है कि कन्फेशन के समय बिना स्वीकृति के किस करने से लेकर एक बार उनके पूरे कपड़े भी उतरवा देने का काम होली फादर ने किया। ऐसी ही शिकायतों के चलते तमाम ईसाई संगठन बिशप हाउस के बाहर प्रदर्शन कर चुके हैं। महिलाओं और नाबालिगों के कन्फेशन के लिए पादरी के बजाय नन रहा करें, क्योंकि पादरी कन्फेशन का अनुचित लाभ उठाते हैं और धर्मभीरु लोग उनके चंगुल में फंस जाते हैं। यहाँ यह भी मार्के की बात है की फादर रोबिन मीडिया और पीआर की दुनिया का पुराना खिलाड़ी होने के नाते बाल यौन अपराधों पर लेक्चर भी दिया करता था और गरीब घर की कुछ लड़कियों को उसने नौकरी के लिए विदेश भी भेज दिया था, जो उसे पापा बुलाती हैं। उसकी इसी छवि के चलते गरीब लोगों को उसपर पूरा भरोसा था। पोप पर तो भरोसा किया जा सकता है, लेकिन चर्च में फैली इस बीमारी को रोकने में कम से कम केरल के चर्च का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं ही है।

पहले भी हुई हैं ऐसी वारदातें, चर्च के नर्क में नन का जीवन

राज्य में भूचाल लाने वाले और देश की न्यायिक व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगाने वाले, सिस्टर अभया मर्डर केस को लोग अब भी याद करते हैं, जब उस नन की लाश एक चर्च के कुएं में मिली थी। उस मामले में चर्च ने आरोपी पादरी को बचाने की पुरजोर कोशिश की थी, इतना ही नहीं उसका नाम सामने आ जाने के बाद भी उसे मुक्त नहीं किया गया था। अभया का दोष यह था कि उसे पादरी और कान्वेंट की नन के बीच अवैध रिश्तों का गलती से पता चल गया था, जब वह अचानक उनके कमरे में पहुँच गई थी। उसे कुल्हाड़ी से काट कर कुएं में फेंक दिया गया था।

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सिस्टर अभया

देश की न्यायिक व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान

आपको इस स्कैंडल और मर्डर के बाद की घटनाओं को पढ़ कर आश्चर्य होगा। 1992 में अभया की हत्या हुई थी और स्थानीय पुलिस ने आत्महत्या का केस मानते हुए डायरी बंद कर दी थी। बाद में ननों के एक समूह ने सीबीआई जांच की मांग करते हुए आन्दोलन किया। 2008 में सीबीआई ने भी कह दिया की केस बंद है, लेकिन अदालत ने जांच करने को कहा तब जाकर गिरफ्तारियां हुईं दो पादरियों और एक नन की। यह भी तब हो सका जब अभया के लिए न्याय मांग रहे लोगों की एक्शन काउन्सिल ने सीबीआई जांच दल के प्रमुख को बदलवाने में सफलता पाई, क्योंकि लम्बे समय से जो अधिकारी जांच का दिखावा कर रहा था, उसके चर्च से मिले होने के आरोप थे। एक्शन काउन्सिल को सीबीआई दफ्तर से लेकर राज्य सचिवालय और दिल्ली तक में लम्बी दौड़ लगानी पड़ी थी। इसमें इस एजेंसी और स्थानीय पुलिस की लड़ाई में केस का एफ.आई.आर. दर्ज करने वाले पुलिस इंस्पेक्टर की आत्महत्या भी हो जाती है। कांग्रेस के नेताओं से लेकर चर्च के प्रभावों के भी लम्बे किस्से हैं, कोई कन्फेशन करने नहीं गया।

हाँ, अभया की मौत के सोलह साल बाद हुई गिरफ्तारी के अगले ही महीने तीनों आरोपियों को जमानत मिल गई और सिस्टर अभया के पिता चौबीस साल तक अदालत में लड़ते हुए न्याय का सपना लिए हुए ही पिछले साल 72 की उम्र में दुनिया छोड़ चले। वह पत्रकारों से कहते थे कि मरने के पहले वह न्याय अपने सामने होते देखना चाहते हैं। नहीं मिला उनको, न अदालत से न ही उनके गॉड से, क्योंकि अभी कुछ साल ही पहले अमेरिका में यौन अपराध का दोषी एक प्रभु भक्त केरल वापस आकर फिर पादरी बन गया। धरम-करम करने वालों से कहा जाता है कि ईश्वर सब देख रहा है, लिखते रहें पोप पत्र।

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