शहीद

‘इट इज नॉनसेन्स दैट पीपल ज्वाइन आर्मी टू सर्व द कंट्री’ इसका हिंदी अनुवाद कठिन नहीं है। यह बहुत फेमस कथन है फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम या जिसे हम सन 71 की लड़ाई कहते हैं उस समय के चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ का।

विजय के बाद इंदिरा जी ने जब उनसे कहा की ढाका जाकर सरेंडर स्वीकार करें तो उन्होंने कहा था की सम्मान सेना के पूर्वी मोर्चे के कमांडर को मिलना चाहिए, तब ढाका मोर्चे के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने यह काम किया। पहले कथन और इस प्रसंग के बारे में सोचिये और सोचिये की क्या हस्ती थे शैम बहादुर।

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इंदिरा गांधी के साथ फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

यह अलग बात है की जब फील्ड मार्शल बीमार होकर तमिलनाडु के मिलट्री अस्पताल में बिस्तर पर थे, तब राष्ट्रपति कलाम उनसे मिले, तब कलाम साहब को पता चला की तीस साल से जो एलाउंस-एरियर मिलना चाहिए था वह मिला ही नहीं। कलाम साहब के हस्तक्षेप से उन्हें तीस साल के भत्ते का चेक मिला वह भी उस समय जब वह पैसा इस्तेमाल करने की हालत में ही नहीं थे।

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भारत के इस महान सेनानी की जब मौत हुई तब राजकीय सम्मान तो जरूर दिया गया लेकिन सरकार की तरफ से केवल रक्षा राज्य मंत्री उपस्थित रहे और न कोई बड़ा नेता न ही तीनों सेनाओं के प्रमुख वहां रहे। कारण शायद यह रहा हो की शैम बहादुर बड़ी हस्ती तो रहे भारतीय फौज के इतिहास में, लेकिन अब नेताओं को उनकी जरूरत नहीं थी। मृत्यु के समय राष्ट्रपति भी कलाम साहब नहीं वरन प्रतिभा पाटिल थीं। अब बढ़ते हैं आगे।

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रिकार्ड में मारे गए सैनिकों के लिए शहीद शब्द इस्तेमाल नहीं होता

सूचना के अधिकार के तहत गृहमंत्रालय के पास एक आवेदन आया की ‘कानून एवं संविधान के तहत शहीद (मार्टर ) शब्द का अर्थ एवं परिभाषा बताई जाय’। मंत्रालय ने अपने यहाँ और रक्षा मंत्रालय में कागज़ घुमाया और आवेदनकर्ता को गोलमोल जवाब दिया, जिससे असंतुष्ट होकर सूचनाधिकार के सर्वोच्च अपीलीय अधिकारी मुख्य सूचना आयुक्त को आवेदन गया। उन्होंने रक्षा एवं गृह मंत्रालय के अधिकारियों से वार्ता की जिससे निकल कर आया की रक्षा मंत्रालय अपने फौजियों के लिए शहीद शब्द का प्रयोग नहीं करता वरन उनके लिए ‘बैटल कैजुअल्टी’ शब्द इस्तेमाल होता है। गृह मंत्रालय ने बताया की उसके अधीन जो सशस्त्र बल हैं उनके जवानों के लिए ‘ऑपरेशन कैजुअल्टी’ शब्द इस्तेमाल होता है। इसके पहले भारत सरकार सदन में भी स्पष्ट कर चुकी है की रिकार्ड में शहीद शब्द इस्तेमाल नहीं होता है।

…तो फिर इस शब्द का इतना प्रयोग क्यों करते हैं नेता और मीडिया

ऐसा जवाब पिछली सरकार में गृहराज्य मंत्री लोकसभा में दे चुके हैं और मोदी सरकार में भी एक भाजपा सांसद के ही सवाल का उत्तर देते हुए भी गृहराज्य मंत्री ने दी है। यानि सरकारी रिकार्ड और नेताओं की जानकारी में है की देश की सरहद पर या सरहद के भीतर भी किसी अभियान में मारे गए सैनिक या अर्ध सैनिक बल के लोगों के लिए शहीद शब्द इस्तेमाल नहीं होता, तो फिर इस शब्द का इतना प्रयोग क्यों होता है ?

वैसे आप में से अधिकांश लोग जानते ही होंगे की हड्डी या खड़िया को देह में रगड़ने से शरीर में कैल्शियम नहीं पहुँच सकता तो फिर टूथपेस्ट बेचने वाली कम्पनियाँ ‘कैल्शियम वाला’ टूथपेस्ट बेच लेने में कैसे सफल हो जाती हैं? क्या दांत में रगड़ने से कैल्शियम दांतों को मजबूत बना सकता है, यह अलग बात है की अब योरोप में दातुन के प्रयोग का वीडियो विज्ञापन आने लगा है लेकिन हमारे देश में तो वृक्षारोपण के नाम पर पेड़ काटने का अभियान ही चल रहा है। शहर दर शहर विकास बढ़ते-बढ़ते गाँवों को भी लील रहा है और नीम के दरख्त उखड़ते जा रहे हैं, इस वाले विकास में कनेर और बबूल की झाड़ उगाई जा रही है क्योंकि टूथपेस्ट में कैल्शियम मिल रहा है। पहले हमें इसकी जरूरत नहीं थी, देशी तरीकों से ही दांत मजबूत रहते थे फिर अखबारों और बाद में टीवी से पता चलता गया और हम कैल्शियम वाले टूथपेस्ट की गिरफ्त में आ गए क्योंकि सफ़ेद कोट पहन कर, डाक्टर जैसा दिखने वाला बतलाता रहा, डॉक्टरों के सुझाए ब्रांड हमारे घरों में घुस गए। हालाँकि डाक्टर साहब यह नहीं बतला पाए की दांत पर घिसने से कैल्शियम कैसे उसको मजबूत बनाएगा क्योंकि न निगलने की चेतावनी भी बहुत बारीक हर्फों में छपी ही होती है। कुछ समझे?

अब आगे बढ़ते हैं मार्टर शब्द का अर्थ पहले चर्च की तरफ से जान देने वाले योद्धाओं के लिए होता था यानी उनके लिए जिन्होंने ईसाइयत की रक्षा में अपनी जान दी। कैल्शियम वाले टूथपेस्ट की तरह बहुत से प्रतिमान हमारे भीतर जगह बना चुके हैं जिनसे हम चाह कर भी बाहर नहीं आ सकते क्योंकि तमाम मान्यताएं ऐसा घर कर लेती हैं की वो मरने के साथ ही जाती हैं, जीते जी नहीं उतरतीं। शब्दकोषों को खंगाले तो मिलता है की शहीद या मार्टर शब्द किसी ख़ास विचारधारा के लिए जान देने वालों के लिए इस्तेमाल होता है, खासकर धार्मिक।ऐसे में जानबूझ कर नेताओं और मीडिया ने इसका प्रयोग क्यों शुरू किया?

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नेता, खासकर सत्ताधारी क्यों चाहेंगे की आप किसी परिवार के जवान की बार्डर पर मौत को बैटल कैजुअल्टी कहें? फिर आप उन नीतियों की चर्चा करेंगे जिनके कारण मौत हुई, आप सरकार की क्षमता पर सवाल उठायेंगे तो अपने ही चुने गए लोगों की काबिलियत पर सवाल उठायेंगे जिन्हें फिर अपने गिरेबान में झाँकना पड़ जायेगा। फिर अगर वो नेता कह दे की ज्वाइन करते समय ही जवान को और उसके परिजनों को पता रहता है की यह ऐसी सेवा है जहाँ उसकी मौत भी हो सकती है तब तो आप और भड़क जायेंगे।

नहीं समझे? सीमा सुरक्षा बल का मोटो हुआ करता था ‘duty unto death’ अब धीरे धीरे वह बदल गया और उसका हिंदी रूपांतरण ‘जीवन पर्यन्त कर्तव्य’ हो चुका है। अगर आप तनिक ठहर कर सोचें तो दोनों का अर्थ एक ही है और काफी अंतर भी है। अंग्रेजी वाले डेथ शब्द जो है वह रिटायरमेंट के बाद घर पर भी जाकर देश बीएसएफ की सेवा करते रहने का नहीं है। याद रहे यही बल देश की सीमाओं की फ्रंट लाइन पर रहता है, अंग्रेजी वाला मोटो इशारा करता है की खतरे कितने हैं, बात वही आखिरी गोली तक लड़ने वाली ही है लेकिन थोड़ा घुमा कर कही गयी है। नीति निर्माताओं को लगा की इससे थोड़ा निगेटिव सन्देश जा रहा है तो इसे राष्ट्रभाषा में बना दिया गया।

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सरकार के जाल में फंस जाती है आम जनता

तो जब शहीद शब्द सरकारी शब्दावली में नहीं है तो उछाला क्यों जाता है? वह इसलिए की चीन युद्द के बाद अगर लता गातीं की ‘बैटल कैजुअल्टी’ को याद करो तब नेहरू जी रोते नहीं, सीन से गायब हो जाते। उन्हें जवाब देना पड़ता की हम कौन सी कूटनीति पर चल रहे थे की हिंदी चीनी भाई भाई हो ही रहा था की राजस्थान से भी सैनिकों को एकाएक बर्फ में झोंकना पड़ गया। भाजपा से आजतक लोग सवाल पूछते की जब चरवाहों ने सूचना दे दी थी की कारगिल में कुछ अनावश्यक मूवमेंट दिख रहा है तो आर्मी ने समय पर एक्शन क्यों नहीं लिया? सरकार की कौन सी लापरवाही थी की देश के इतने अधिक जवानों की कैजुअल्टी एक ही मोर्चे पर हो गयी? तब आप दुखी होते और अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछते।

फ़ौज में कौन जाते हैं इसको लेकर मोदी जी का नजरिया कुछ ऐसा था

हाँ पता नहीं याद हो की न याद हो, लोकसभा चुनाव अभियान में मोदी जी ने भी गुजरात मॉडल की तारीफ करते हुए कहा था की गुजरात में समृद्धि है इस नाते वहां से कम युवा फौज में जाते हैं। मतलब की खाने-पीने का ठीक ठाक जुगाड़ रहे तो कौन जाय फौज में, हांय! अब सुबह दौड़ लगाते उन लड़कों को देखिये जो आर्मी की फिजिकल निकालने की तैयारी करते हैं और फिर भर्ती वाले दिन उस शहर की हालत देखिये जहाँ सामान्य सैनिक की भर्ती रैली होती है। असफल युवाओं की निराश लौटती भीड़ का कई बार व्यवहार देख कर कोई नहीं कह सकता ये सब देश भक्त भी हो सकते हैं। तो शहीद शब्द दिमाग में आते ही आपके सामने एक पुरानी अवधारणा आ जाती है और आप श्रद्धा से नत हो जाते हैं, जो कहीं से गलत भी नहीं है और उस मृतक के लिए सम्मान पूरी तरह उचित है लेकिन आप सरकार के जाल में भी फँस जाते हैं।

सरकारी कागजों में जो ‘बैटल कैजुअल्टी’ है वह जनता की भावनाओं में ‘शहीद’ है

कैजुअल्टी के कारण पर न जाकर आपके भीतर, खुद को ही कमजोर करने वाली तो कभी जोश भर देने वाली भावनायें हिलोरें लेने लगती हैं। कभी आपके आँखों में आँसू आते हैं तो कभी आप की भुजा फड़कने लगती है। सत्ता को तो चाहिए ही की आप ऐसे ही रहें और विपक्षी भी ‘शहादत’ को भुनाने में पीछे कहाँ रह सकते हैं। तो लब्बोलुआब यह की सरकारी कागजों में जो बैटल कैजुअल्टी है वह जनता की भावनाओं में शहीद है वर्ना देश के लिए तमाम काम करने वाले न जाने कितने लोग रोज सड़क दुर्घटनाओं में मर जाते हैं लेकिन हमें यह भावना बनाए और बचाए रखनी चाहिए। भले ही फील्ड मार्शल को अपने एरियर के लिए तीस साल का इंतजार करना पड़ा हो, वह भी कलाम साहब थे तो मिल गया वर्ना ‘देश’ के ही खाते में रहता। देश समझना इतना आसान भी नहीं है,आप करते रहिये कैल्शियम वाला मंजन।

कभी सोचा है की शहीद या मार्टर से मिलता जुलता हिंदी शब्द क्यों नहीं इस्तेमाल किया जाता? जबकि आज़ादी के बाद एक से एक क्लिष्ट संस्कृत शब्द और सूक्तियों को खोज कर सरकारी-अर्ध सरकारी योजनाओं, उपक्रमों एवं उपाधियों के नाम एवं मोटो रखे गए?

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