पनामा पेपर्स: पाकिस्तान में हलचल, भारत में सन्नाटा

पिछले एक साल से पाकिस्तान में पनामा पेपर्स को लेकर हंगामा मचा हुआ है और वहां की सर्वोच्च अदालत ने भी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और उनके दोनों बेटों हसन और हुसैन शरीफ तथा बेटी मरियम की जांच के लिए एक स्पेशल टीम गठित कर दी है।

पनामा कांड के फेर में बुरे फंसे नवाज साहब

पाकिस्तान के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी काबिज प्रधानमंत्री के खिलाफ जांच ही नहीं, गठित की गयी है वरन जांच आयोग के सामने पेश होने के लिए भी बड़ी अदालत ने कहा है। यह विशुद्ध लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, वर्ना अभी तक तो जनरल लोग निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष से हिसाब लेते रहे हैं। इस मामले की सुनवाई कर रही पांच जजों की टीम में से दो तो नवाज़ के हटाये जाने के पक्ष में थे, लेकिन तीन का मानना था कि उन्हें अपनी सफाई देने का पूरा मौका मिलना चाहिए। इसीलिए अदालत की तरफ से एक संयुक्त जांच समिति गठित की गयी। इस समिति में आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों के साथ ही मिलट्री इंटेलिजेंस और कुख्यात आईएसआई से भी एक ब्रिगेडियर को अदालत ने रखा है। बड़ी अदालत के इस फैसले से एक आम अवधारणा पुख्ता हो गयी है कि शरीफ परिवार वास्तव में पाकिस्तान को आर्थिक रूप से खोखला करने वाली ताकतों में शामिल है।

शरीफ की ‘शराफत’ पर उनकी हुकूमत का ही भरोसा डगमगाया

अब सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन और लाहौर हाईकोर्ट बार असोसिएशन ने नवाज़ को अल्टीमेटम दे दिया है कि वो एक हफ्ते के भीतर गद्दी छोड़ दें वर्ना उनका खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन किया जाएगा। ध्यान रहे दो साल पहले भी क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान-तहरीके-इन्साफ ने नवाज़ के खिलाफ काफी लम्बा आन्दोलन किया था और चार महीने राजधानी को ब्लॉक करके रख दिया था और सारी गतिविधियाँ ठप्प हो गयी थीं। पनामा पेपर लीक्स को इमरान ने खुदा की तरफ से मुल्क को भेजी गयी सौगात कहा था। फ़ौज के साथ रस्साकसी कर रहे शरीफ के लिए अब 2018 में होने वाले आमचुनावों में वापसी करनी मुश्किल ही लग रहा है, क्योंकि वह पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल राहील शरीफ से तो बच गए लेकिन पनामा पेपर्स में नाम आने के बाद जनता के बीच में फिर जाकर विश्वास जीतना काफी मुश्किल होगा। 

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इस बीच खबर आ रही है कि सऊदी अरब में ट्रंप के साथ तमाम मुस्लिम देशों के प्रतिनिधियों की वार्ता थी जिसके लिए शरीफ भी काफी तैयारी करके गए थे। पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक अपने भाषण का रिहर्सल भी कई बार कर चुके थे, लेकिन उन्हें बोलने का मौका ही नहीं मिला जबकि पाकिस्तान से काफी कम हैसियत वाले मुल्कों के प्रमुखों ने भाषण दिए। ट्रंप ने भी पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया, उलटे भारत को आतंकवाद का पीड़ित बता कर पाकिस्तान अवाम को नमक रगड़ दिया। वहां लोग अब सवाल कर रहे हैं कि पनामा वाले शरीफ सउदिया गए ही क्यों थे? कुल मिलाकर शरीफ के अच्छे दिन फिलहाल दिख नहीं रहे।

पनामा कांड में भारत के भी हाथ हुए हैं मैले

लेकिन एक बात हमें याद रखनी चाहिए की पनामा पेपर्स लीक के मामले में जितनी चर्चा पाकिस्तान में साल भर से लगातार चल रही है उसके मुकाबले में भारत में भारी उदासीनता है, जबकि पांच सौ से अधिक भारतीयों के नाम भी उन कागजातों में दर्ज हैं, जिनसे दुनिया भर में भूचाल मचा और इस खोज में शामिल पत्रकारों की संस्था को पत्रकारिता जगत का सबसे प्रतिष्ठित पुलित्जर एवार्ड भी मिला।

पनामा पेपर्स लीक: ये है पूरा मामला

दुनिया की तमाम समस्याओं की तरह टैक्स हैवेन देश के रूप में पनामा को भी अमेरिकी व्यापारियों ने ही विकसित किया है। बीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी तेल कंपनियों ने अपने देश के भारी टैक्सों से बचने के लिए अपने आयल टैंकर्स का रजिस्ट्रेशन पनामा में करना शुरू किया था। फिर उस छोटे से देश ने अपने विकास के लिए विदेशी निवेशकों के लिए तमाम लुभावने कानून बनाए और आज के समय पनामा कुछ उन देशों में है जहाँ जितनी आबादी है उससे अधिक कम्पनियां रजिस्टर्ड हो चुकी हैं और ये दुनिया भर में कारोबार से लगायत पैसों की हेराफ़ेरी में लिप्त हैं। यहाँ यह भी ध्यान रखने की बात है कि अपने देश के बाहर कोई कंपनी रजिस्टर्ड करना या बैंक खाते रखना कहीं से भी गैर कानूनी नहीं है, बशर्ते अपने देश की एजेंसियों को भी इसकी सूचना हो और जरूरी टैक्स दिए जाते रहे हों, लेकिन अधिकांश मामलों में ऐसा सीधे-सीधे अपनी आय को अपनी सरकार की नजर से दूर रखने के लिए ही किया जाता है और यह अवैध तथा अकूत धन संपत्ति को खपाने का माध्यम बन गया है।

वित्तीय लेन-देन की कलई खोलकर रख दी पनामा पेपर्स ने

काफी बदनामी के बाद पनामा सरकार भी अब अपने देश को टैक्स हैवेन के ठप्पे से निजात दिलाने में लगी है और उसकी आपत्ति ‘पनामा पेपर्स’ नाम पर भी है। इस नाते इस लीक को मोसेक फोंसेका नाम दिया गया जो उस फर्म के नाम पर है, जिसके सिस्टम में हैकिंग करके सारे दस्तावेज़ निकाले गए।

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 दुनिया के कई नेता, अभिनेता, खिलाड़ी और व्यापारियों ने छुपाई बेशुमार दौलत

एक व्हिसिल ब्लोअर या कहिये आर्थिक अपराध के खिलाफ अकेले लड़ाई लड़ने वाले किसी गुमनाम व्यक्ति ने जर्मन पत्रकार सेबेस्टियन ओबरमेयर को मोसेक फोंसेका के कुछ दस्तावेज़ दिए। यह मोसेक फोंसेका 1977 में स्थापित फर्म है जो कानूनी रूप से कम्पनी रजिस्ट्रेशन, कानूनी सलाह और टैक्स बचत जैसे सलाह की सेवा देती है। इसके संस्थापकों में रैमन फोंसेका एक पुरस्कृत उपन्यासकार और काफी सफल वकील है और जर्गन मोसाक आर्थिक मामलों का काफी बड़ा विशेषज्ञ, इन दोनों के नाम पर है फर्म है। इन दोनों का कहना है कि ये कुछ भी गलत नहीं करते, हालांकि पनामा लीक्स के बाद ब्राजील में एक काफी बड़े पैमाने पर फैले घूसखोरी की जांच करते हुए वहां की सरकार ने इस फर्म के एक संस्थापक को गिरफ्तार कर लिया। इस फर्म पर लन्दन के हीथ्रो एयरपोर्ट के गोदाम से हुई सदी की सबसे बड़ी सोने की चोरी, जो अस्सी के दशक में हुई थी का माल खपाने का भी आरोप लग चुका है, लेकिन पिछले साल के खुलासे से पता चलता है कि यह फर्म तीन लाख से अधिक कंपनियों की एजेंट है और उसके क्लाइंट्स में वर्तमान में कम से कम 13 राष्ट्राध्यक्ष और दुनिया भर के नेता, अधिकारी, खेल और सिनेमा जगत के सेलिब्रेटी हैं। यहाँ एक बार फिर यह स्पष्ट रहना चाहिए की कहीं कानूनी रूप से कम्पनी खोलना गलत नहीं है, लेकिन खुलासे से पता चलता है की पनामा से बहुत खतरनाक खेल खेला जा रहा है।

ऐसा खुलासा जिसने दुनिया के दिग्गजों की काली करतूतों की पोल खोल दी

चीन के जिनपिंग के करीबियों से लेकर पुतिन के ख़ास लोगों की कम्पनियाँ और अफ्रीका के तमाम गरीब मुल्कों के नेताओं से लगायत नवाज़ शरीफ की संतानों की कम्पनियां मोसेक फोंसेका के जरिये खुलने और मैनेज किये जाने की कहानी बताती है कि अपने देश की चोरी से यह धंधा करने वाले दुनिया भर में फैले हुए हैं। जाहिर है इसमें अधिकांश पूँजी भ्रष्ट तरीकों से ही अर्जित की गयी है। जनता के नाम पर आने वाले बजट का बड़ा हिस्सा भी इसमें खपा होगा। मनीलांड्रिंग का लम्बा खेल हुआ होगा और कुछ नहीं तो आय पर कोई कर नहीं दिया गया होगा। 

भारत में कहां पहुंची ‘पनामा पेपर्स’ की जांच?

भारत के भी पांच सौ से अधिक लोगों के नाम हैं, जिनमें पता चला है की 370 लोगों को सम्मन जारी किये जा चुके हैं और दो सौ से अधिक लोगों ने वहां कम्पनी होने की बात स्वीकार कर ली है। खुलासा होते ही इस मामले की जांच भी काले धन की जांच के लिए गठित संयुक्त समिति को दे दी गयी थी और चूँकि यह जांच सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्ट टैक्सेस (सीबीडीटी) की अगुआई में हो रही है जो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट देती है इस नाते कहाँ तक प्रगति हुई और कौन-कौन जांच के दायरे में है, यह आम जनता को पता नहीं चल सकता। पाकिस्तान के उलट अपने देश में अभी मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नहीं है। यह अलग बात है कि इसके लिए एक याचिका बड़ी अदालत में पड़ी थी, जहाँ सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि एक वेबसाईट द्वारा दी गयी जानकारी के आधार पर जांच साधारण काम नहीं है और कई एजेंसियां लगी हुई हैं, जिसमें काफी समय लगेगा। अदालत ने भी अगली तारीख जुलाई की दे दी है।

इस बड़े खतरनाक खेल का पर्दाफाश होना आसान नहीं था

सरकार के लिए आसान काम नहीं है तो इसे उजागर करने वालों के लिए भी यह आसान काम नहीं था। जर्मन पत्रकार को जानकारी मिलने से पहले भी जर्मनी की एजेंसियों के कुछ कागजात जुटा कर वहां के सबसे बड़े बैंक कामर्जबैंक पर छापे मारे थे, जिससे मोसाक फोंसेका की तरफ से की जा रही गडबडियों का पता चला था, लेकिन व्हिसिलब्लोअर से मिले कागजों के आधार पर जब एक जर्मन अखबार ने खबर बनाई तो पत्रकारों की एक संस्था इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ़ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म (ICIJ) ने मामले की व्यापकता को देखते हुए इसे अपने हाथों में लिया और शुरू हुआ दुनिया का सबसे बड़ा खोजी पत्रकारिता अभियान, जिसमें अस्सी देशों के सौ से अधिक मीडिया संस्थान जुटे, जिसमें पचीस से अधिक भाषाओँ वाले तीन सौ के लगभग पत्रकार और संपादक शामिल हुए। मोसेक फोंसेका के सन 1977 से लगायत 2015 तक का लेखा जोखा दुनिया के सामने आ गया। डाटा जर्नलिज्म और मोबाइल जर्नलिज्म के इतिहास का बहुत बड़ा काम हुआ और पर्दाफाश हुआ एक बड़े खेल का जो समान रूप से पूरी दुनिया में खेला जा रहा है। खिलाड़ी वही लोग हैं जो अपने देशों में नैतिकता और ईमानदारी का भाषण देते हैं। यह खुलासा होने के बाद मोसेक फोंसेका ने अपने ग्राहकों को सूचना दी कि उसकी कुछ ई-मेल्स लीक हो गयी हैं, लेकिन वो कोई बड़ा खतरा नहीं है। लेकिन इन लोगों को पत्रकारों की सामूहिक ताकत का अंदाजा नहीं था। विकीलीक्स और अभी तक के तमाम खुलासों से बड़ा खुलासा यह साबित हुआ। यही वजह है कि इससे जुड़े लोगों को पुलित्ज़र पुरस्कार मिला। मोसेक फोंसेका सामान भाव से प्रापर्टी माफिया, ड्रग डीलर्स, सिनेमा कलाकार, खिलाड़ी, राजनेता, सबको सेवा दे रही थी। खुलासा होते ही सबसे पहले यूरोपियन यूनियन ने एक 65 सदस्यीय जांच समिति गठित की। अमेरिका से लेकर चीन तक में सक्रियता बढ़ी। चीन, युक्रेन और रूस के कुछ लोगों ने सफाई दी कि अपनी सम्पत्ति की हिफाजत के लिए उन लोगों ने ऑफ़शोर कंपनियों का रास्ता चुना है। वहीं, कुछ लोगों ने सफाई दी कि अपनी मेहनत की कमाई को देश के कड़े टैक्स नियमों से बचाने के लिए ऐसा किया गया।

पनामा कांड को लेकर भारत में बरती जा रही है ढिलाई

वहीं, भारत में पहले जिनके नाम उछले उन सबने एक स्वर में कह दिया की यह मात्र सनसनी है और पनामा की किसी कंपनी में न तो वो डाइरेक्टर हैं न ही उनका निवेश है। ध्यान रहे जिस खुलासे पर पाकिस्तान में नवाज़ की राजनैतिक पारी खतरे में है, उसे यहाँ हलके में उड़ा दिया गया। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का भी इसमें नाम था है और उनकी बहु एश्वर्या का भी। बिना किसी जांच के इन लोगों ने जो सफाई दी उसे जनता ने सच मान लिया। यहाँ फिर दुहरा दूं की कहीं कम्पनी खोलना गलत नहीं है। गलत है तो टैक्स चोरी, मनी लांड्रिंग और ऐसा काम करने वाली कंपनियों में बेनिफीशियल ओनरशिप और बेनामी संपत्ति के खेल का काला धंधा।

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इसे अभी सामाजिक न्याय के नामी योद्धा लालू जी की बिटिया मीसा भारती के सीए की गिरफ्तारी वाले मामले से समझने की कोशिश। उस सीए पर भी वही आरोप हैं जो मोसेक फोंसेका पर हैं। फर्क बस इतना है की दिल्ली वाले इस सीए पर अपने क्लाइंट्स के लिए मात्र आठ हजार करोड़ की गड़बड़ी का मामला है तो मोसेक अरबों-खरबों डालर का खेल कर रही थी।

पनामा पेपर्स कांड: पाकिस्तान में यह मुद्दा गर्माया हुआ है

नवाज़ शरीफ के साथ दिक्कत यह हुई कि परवेज़ मुशर्रफ के समय आर्थिक अपराध के जो आरोप लगाकर देश से बेदखल किया गया था, उसमें के कुछ मामलों के कागजात इस खुलासे में भी शामिल हैं, यानी पाकिस्तान में शरीफ परिवार के खिलाफ जो माहौल बन रहा था उसमें इस खुलासे ने घी डाल कर आग को और भड़का दिया। पिछले साल अप्रैल में खुलासा होने और अपने-अपने खानदान का नाम सामने आने के बाद शरीफ ने राष्ट्रीय टेलीविजन पर आकर सफाई दी और कहा कि यह उनके राजनैतिक विरोधियों की साजिश है। इमरान खान और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के साथ ही तमाम छोटी पार्टियों ने भी शरीफ से इस्तीफ़ा माँगना शुरू किया। जमात-ए-इस्लामी ने जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की तो वहां के जज ने भी कहा कि अगर टीवी चैनलों और अखबारी कतरनों के आधार पर जांच होने लगे तो हर कोई जेल में जायेगा। लेकिन मोसेक फोंसेका दस्तावेजों में कुछ ऐसी संपत्तियों की खरीद में हेराफ़ेरी का खुलासा हुआ, जिनके बारे में मुल्क को पहले से पता था। हंगामा बढ़ने पर शरीफ ने संसद में सफाई दी कि उनके राजनीति में आने से काफी पहले से उनका परिवार पाकिस्तान का काफी संम्पन्न उद्यमी परिवार है। यह सच भी था क्योंकि स्टील से लेकर कागज़ और कपड़े और मुर्गी दाने से लेकर कोला तक, शायद कोई भी धन्धा बचा न हो जिसमें शरीफ ब्रदर्स और उनका इत्तेफाक ग्रुप दखल न देता हो। लेकिन शरीफ अपनी सफाई में पनामा में उनके बेटों और बेटी की कंपनियों के बारे में कुछ कह नहीं पाए।

शरीफ की कुर्सी पर मंडरा रहा है खतरा

ध्यान रहे कि शरीफ के दोनों बेटे मुल्क से बाहर रह कर अपने धंधों को देखते हैं और राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में पीएम की बेटी मरियम नवाज़ को ही आगे बढ़ाया जाता है। मरियम ट्विटर पर भी काफी सक्रिय रहती हैं जहाँ उन्होंने भी खूब सफाई दी ,लेकिन विपक्षी लोग मानने को तैयार नहीं थे। संसद में सफाई को सदन की अवमानना बतलाते हुए इमरान खान की पार्टी फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँचती है। यह वह दौर था जब रिटायर्मेंट के करीब पहुँच चुके सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ के पक्ष में पाकिस्तान में पोस्टर लग रहे थे कि वो सत्ता संभाले। जनता के दबाव को देखते हुए शरीफ ने सुप्रीम के कोर्ट के किसी रिटायर जज से जांच करवाने की बात की, लेकिन पूर्व जज तैयार ही नहीं हुआ। फिर खबर आई की राहिल शरीफ ने खुद नवाज़ से मिलकर जांच करवाने की बात की, फ़ौज वैसे भी धीरे-धीरे तंत्र पर शिकंजा जकड़ रही थी, जिसकी बानगी नवाज़ के सलाहकार के हटाये जाने में दिखी थी। सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी बार में जाँच की याचिका को स्वीकार कर लिया था और एक जजों की पीठ में सुनवाई शुरू हुई अब उसी पीठ के आदेश के मुताबिक़ संयुक्त जाँच समिति गठित कर दी जो अपना काम शुरू कर चुकी है। ध्यान रहे कि इसमें भी फ़ौज से जुड़े दो लोगों को जगह दी गयी है। इसमें बस एक शंका यही है कि अदालत ने जितना कम समय दिया है, उसमें टीम को पनामा से लगायत ब्रिटेन, सउदिया, क़तर और तमाम देशों की यात्रा करनी है। सारे कागजात जुटाने हैं और शरीफ को क्लीन चिट देनी है या फिर दोषी ठहराना है।

कम समय दिए जाने के पीछे तर्क यह है की अगले साल के चुनाव से पहले अदालत किसी नतीजे पर पहुँच जाना चाहती है, क्योंकि विपक्षी बार-बार आन्दोलन की धमकी देते जा रहे थे। जाहिर है शरीफ के लिए यह काफी खतरनाक स्थिति है। ऊपर से अदालत ने जांच टीम की घोषणा वाले फैसले के समय मारियो पूजो के प्रसिद्ध उपन्यास ‘गॉड फादर’ की मशहूर पंक्ति को कोट किया- ‘हर बड़े विपुल धन साम्राज्य की नींव किसी न किसी अपराध पर टिकी होती है।’ हालाँकि यह कथन मूल रूप से फ़्रांसिसी लेखक-विचारक बालजाक का है, लेकिन दुनिया इसे गॉडफादर से ही जानती है। अदालत के इसे कोट करने के साथ ही लोग शरीफ एंड कम्पनी के मुखिया और अपने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को गॉड फादर कहने लगे हैं, जिसने देश को लूट कर अकूत धन का खानदानी साम्राज्य खड़ा कर दिया है। यह गॉड फादर वाली टिप्पणी कितनी भारी पड़ रही है कि पंजाब सूबे के कानून मंत्री ने कहा है कि अदालत ने कुछ अधिक ही बोल दिया है, क्योंकि शरीफ परिवार और उनकी पार्टी किसी गॉड फादर से नहीं, वरन कुरआन से प्रेरणा लेती है। ज्ञात रहे की पंजाब सूबे के मुखिया नवाज़ के भाई हैं। यह अलग बात है कि अदालत की गॉड फादर वाली टिप्पणी को हटाये जाने की याचिका शरीफ के लोग इस डर से नहीं डाल रहे हैं कि कहीं अदालत में फिर कोई कड़ी टिप्पणी कर दी, तो और फिजां खराब हो जायेगी, क्योंकि ऐसे ही समझ में नहीं आ रहा है कि आगामी चुनाव की तैयारी किन मुद्दों को लेकर शुरू की जाय, क्योंकि हर मोर्चे पर पाकिस्तान एक असफल राष्ट्र के रूप में खड़ा है।

अब नवाज़ तो बुरी तरह फंस ही चुके हैं, लेकिन हम लोग तो यह सवाल कर ही सकते हैं कि भारत में इतना सन्नाटा क्यों है, जबकि ब्रिटेन और यूक्रेन में भी यह मुद्दा काफी गरम है?

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