अयोध्या पर बातचीत: किससे और कब तक?

सुब्रमण्यम स्वामी की राम जन्मभूमि-बाबरी मसले के त्वरित निस्तारण की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सलाह दी है कि दोनों पक्ष, अदालत के बाहर मिल बैठ कर मामला सुलझा लें, क्योंकि यह आस्था और जन भावना से जुड़ा हुआ मुद्दा है। जरूरत पड़ी तो मुख्य न्यायाधीश स्वयं ऐसी किसी बातचीत में मध्यस्थ होने के लिए तैयार हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर कौन करेगा पहल?

जमीन, मकान, दुकान को लेकर जब सगे भाइयों में कलह होती और नाते-रिश्तेदार सुलह सपाटे से थक जाते हैं तो मामला अदालत में जाता है। कई बार विवादित संपत्ति में ताला लगा रहता है और जिस पीढ़ी ने मुकदमा दायर किया था, वह खप जाती है। अगली पीढ़ी भी तारीख पर तारीख देखती रहती है। सभी राजनैतिक दलों ने मिल कर जिस मसले को देश का अहम मुद्दा बना दिया है और उसी के आधार पर चुनावी राजनीति होती रही है, उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट भी हाथ खड़े करके आपस में समझ लेने की सलाह दे रहा है। यह मामला उन्नीसवीं सदी से मुकदमा देख रहा है, जब फैजाबाद के मजिस्ट्रेट ने विवाद होने पर वहां स्थलीय निरीक्षण करके अपनी टिप्पणी दर्ज की थी। उसके बाद हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। अभी दस साल भी नहीं हुए हैं और जज साहब समझ लेने की सलाह दे रहे हैं। उनकी सलाह का सम्मान होना चाहिए क्योंकि मामला दो समुदायों की आस्था का जुड़ा हुआ है, जिसे बहुसंख्यक लोग राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ चुके हैं। इस पर आगे बात करेंगे कि कैसे राजनेताओं ने एक दीवानी के मुकदमे को किस तरह अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है, जनता का क्या है? वह तो हांकने पर चल ही देती है। मुकदमे पहले बात आपस में समझ लेने की।

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तारीख पर तारीख… कई पुश्तें निकल जाती है लेकिन फैसला नहीं आता

बनारस के दोषीपुरा मोहल्ले में एक कब्रिस्तान का मुकदमा 1878 से चल रहा है। मतलब जब पहली बार हवाई जहाज उड़ा, उसके भी क्वार्टर सदी पहले से। इसे शायद देश का सबसे पुराना मुकदमा होने का भी सौभाग्य प्राप्त है। बाकी हमारे सिस्टम का यह दुर्भाग्य है। शिया कहते हैं कि उन्हें यह जमीन काशी नरेश ने धार्मिक कार्यों के संपादन के लिए दी थी, इस नाते पूरा अधिकार उन्हीं के समुदाय का है। सुन्नी कहते हैं कि उनकी भी ‘दो’ कब्रें वहां हैं, इस नाते उनका भी हक है। लगभग सभी अदालतों में सुन्नी हारते रहे हैं। बड़ी अदालत ने भी उन कब्रों को हटाने का आदेश 1981 में दिया था, जिसे लागू करने में उत्तर प्रदेश की सरकार ने कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो जाने का तर्क देते हुए अमल नहीं किया था।

जनवरी 2013 में मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर साहब की अदालत में तारीख थी। उन्होंने दोनों पक्षों से पूछा- ‘आखिर किस चीज के लिए लड़ रहे हैं आप लोग, कब्रिस्तान के लिए? अरे आपस में बैठ कर सुलह कर लीजिये और बंद करिए इस मसले को’। ध्यान रहे यह न राष्ट्रीय मुद्दा है, न ही इससे राजनैतिक दलों को चुनावी बूस्टर मिलता है। अदालत से बाहर आकर शिया पक्ष की तरफ से जवाब मिलता है कि मुमताज महल को शाहजहाँ ने पहले बुरहानपुर में दफनाया था, जहाँ से उखाड़ कर भी ताजमहल में कब्र बनायी गयी। जब शाहजहाँ ऐसा कर सकता है, तो ये लोग क्यों नहीं जो अपनों की कब्रें होने का दावा करते हैं। हम लोग एकदम अल्पसंख्यक हैं जिस नाते अदालत से पक्ष में फैसला आने के बावजूद हमारे साथ न्याय नहीं हो रहा है। दूसरा पक्ष कहता है, ऐसे ही कैसे छोड़ दें, हमारे अपने दफन हैं वहां। चीफ जस्टिस ने यूपी सरकार से भी मामले को खतम कराने में सहयोग देने की बात की थी, कोशिशें जारी हैं।

यह जितना धार्मिक मामला है उससे बहुत अधिक राजनीतिक

अब बात करते हैं अयोध्या की जिसके बारे मद्रास वाले सुब्रमण्यम स्वामी से लगायत हैदराबादी बैरिस्टर और कश्मीर के फारुख अब्दुल्ला तक, समूचे देश की अपनी-अपनी राय है और सबको बात करने का हक़ भी है, क्योंकि यह जितना धार्मिक है मामला उससे बहुत अधिक राजनैतिक भी, क्योंकि आज़ादी के बाद मूर्ति रखे जाने के साथ ही हिन्दू महासभा सक्रिय थी, लेकिन वास्तव में जमीन को लेकर जिन दो पक्षों में विवाद था, उनके एक ही इक्के पर पान घुलाते हुए, एक साथ अदालत जाने की बातें तो हम बहुत पढ़ सुन चुके हैं।

बातचीत का यह दौर अब का नहीं बल्कि बरसों से चला आ रहा है

रह-रह कर इन दोनों पक्षों के अलावा तीसरी पार्टियों की भी ललकार सुनाई पड़ती थी, लेकिन उसका कोई विशेष महत्व नहीं था, क्योंकि मूर्ति रखे जाने के बाद फैजाबाद के मजिस्ट्रेट ने केवल पुजारी को धार्मिक कर्मकांडों के लिए वहां जाने की अनुमति दे रखी थी और दर्शनार्थियों के लिए वह स्थान प्रतिबंधित था। अस्सी के दशक में गोरखपीठ के महंत अवैद्यत नाथ ने जन्मभूमि मुक्ति के लिए एक यात्रा की तैयारी शुरू की थी और यही समय था की सैयद शहाबुद्दीन के संयोजन में बाबरी कोआर्डिनेशन कमेटी भी बनी। हाँ, यह जरूर याद रहे कि बाबरी कमेटी ताला खुलने के बाद बनी थी।

अभी तक आम हिन्दू-मुसलमान का इस मसले से कोई अधिक मतलब नहीं था। तब चौबीस घंटे वाले चैनल भी नहीं थे, इसलिए राम चबूतरा है कि बाबरी मस्जिद, यह आम जनता से दूर का मसला था। शाहबानो के मामले में राजीव सरकार के निर्णय से हिन्दू संगठनों को उग्र होने का मौका मिल गया। 62 वर्षीया शाहबानो के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, जिसका पहले तो राजीव गांधी ने स्वागत किया लेकिन जब मौलानाओं ने इसे अपने मामलों में अदलात का हस्तक्षेप करार देकर उसका विरोध करना शुरू कर दिया, तो बहुमत वाली कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। इसी समय एकदम हाशिये पर खड़े होने की कोशिश कर रही भारतीय जनता पार्टी का पालमपुर में अधिवेशन हुआ (पार्टी का गठन 1980 में हुआ था)। इस अधिवेशन में पार्टी ने राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए हिन्दू हितों के लिए संगठित होने का संकल्प लिया। ध्यान रहे यहाँ वही चर्चाएँ हैं, जो पब्लिक डोमेन में तो हैं लेकिन प्रतीकों की राजनीति करने में और उसे प्रचारित करने में तब से आज तक की परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं, इस नाते किसी को उनका ध्यान नहीं। न ही इस बारे में नयी पीढ़ी को पता होगा। चूँकि अदालत ने कह दिया है कि बात करिए तो पिछली बातों की चर्चा जरूरी हो जाती है। श्री रामजन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति के प्रवक्ता अशोक सिंघल थे तो शैयद शहाबुद्दीन वाली बाबरी कमेटी के सूबे के सह संयोजक जफ़रयाब जिलानी थे और उनके साथ कमेटी का एक प्रमुख चेहरा थे आज़म खान साहब।

भव्य राम मंदिर का निर्माण राजीव गांधी का था सपना!

ताला खुलने की कहानी भी बड़ी रोचक है। उस समय राजीव गांधी के अन्तरंग मित्र रहे सुब्रमण्यम स्वामी अगर कहते हैं कि भव्य राम मंदिर का निर्माण राजीव गांधी का सपना था, तो वो उनके साथ ही उठते-बैठते थे, सही कह रहे होंगे। इसे मानने में आपको हिचक हो सकती है, क्योंकि स्वामी कब क्या बोल दें, इसका कोई भरोसा नहीं।

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स्वामी आज कट्टर भाजपाई दिखते हैं और सोनिया गाँधी और उनके परिवार के बारे में कभी भी सम्मान वाले शब्द नहीं इस्तेमाल करते तो उसके पीछे की कहानी लम्बी है। उनके मित्र के पुत्र राहुल उनके लिए ‘भोंदू’ हैं। बोफोर्स मामले में वो हमेशा राजीव गाँधी के साथ रहे और उनके मुताबिक राजीव ने कोई दलाली नहीं ली थी, उनके पैसे ‘सोनिया गाँधी के मित्र’ क्वात्रोची ने खाए थे। उनका बयान यहाँ तक भी था कि अटल बिहारी वाजपेयी ने क्वात्रोची को भगाने में निष्क्रिय रह कर सोनिया गाँधी की मदद की थी। वो वाजपेयी के खिलाफ भी काफी अनाप-शनाप बक चुके हैं। शायद यही कारण है कि मोदी सरकार में मंत्री पद की जगह उन्हें केवल सोनिया-राहुल को घेरने का जिम्मा मिला और राम मंदिर का एजेंडा। पुरानी बातों को याद रखना चाहिए, क्योंकि बात करते समय सारी बातें होनी चाहिए।

राजीव के निर्देश पर दोनों पक्षों के बीच वार्ता का हुआ था प्रयास

राजीव गाँधी हिन्दू वोटरों को लुभाने के लिए कमर कस रहे थे। नयी पार्टी भाजपा का कोई प्रभाव नहीं था, लेकिन उसका एजेंडा इन्हें दुखी कर रहा था। विश्वहिन्दू परिषद् ने ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ का नारा दे दिया था।

गृहमंत्री बूटा सिंह राजीव के निर्देश पर दोनों पक्षों के बीच वार्ता की लगातार कोशिश कर रहे थे। मोतीलाल नेहरू के बड़े भाई नन्दलाल नेहरू के वंश के अरुण नेहरू यानी खानदान में राजीव गाँधी की ही पीढ़ी के अरुण नेहरू प्रधानमंत्री के विश्वस्त सहयोगी थे। बाद में बोफोर्स मसले पर राजीव गाँधी को छोड़ वीपी सिंह से मिल गए। कई लोग मानते हैं कि ताला खुलवाना इन्हीं की सलाह थी, तो कुछ मानते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह की राय थी। जो भी रहा हो, दिल्ली से ताला खोलने का आदेश लखनऊ पहुंचा तो तत्कालीन उच्चाधिकारियों ने फैजाबाद की अदालत के आदेश का हवाला देते हुए असमर्थता जाहिर की।

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बाएं से तीसरे तल्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के साथ

सरकार ने उस स्थानीय अदालत से ताला खुलवाने का आदेश पारित करा दिया। अब आम जनता के लिए रामलला का दर्शन सुलभ हो गया और निकला गया बोतल में बंद एक जिन्न जिसका प्रभाव आज तक है। 31 अक्टूबर 84 को ही पहले वहां जन्मभूमि मुक्ति समिति का एक कार्यक्रम था, लेकिन इंदिरा गाँधी की हत्या उसी दिन हो जाने फिर बड़े पेड़ के गिरने से हुई धमक के चलते माहौल शांत था।

अब दोनों पक्ष काफी उग्रता से आगे बढ़ने लगे। हिन्दू संगठनों को लगने लगा कि राजीव उसका एजेंडा हैक कर रहे हैं, तो मुसलमानों की अगुआई करने वालों को लगा कि अब मस्जिद की खैर नहीं। यह सन 1986 की बात है। शाहबानो के केस में जबरदस्त विरोध दर्ज करवाकर सैयद शहाबुद्दीन अपने को स्थापित कर चुके थे। इस बीच बूटा सिंह दोनों पक्षों से लगातार वार्ता कर रहे थे और ध्यान रहे कि अब उन दोनों असल पक्षों का महत्व खत्म होता जा रहा था, जिनके बीच जमीन का झगड़ा था। हिन्दू संगठन जन्मभूमि मुक्ति मोर्चे पर थे तो बाबरी कमेटी मस्जिद को आजाद कराने के लिए कमर कसे हुए थी। उसे राजीव गांधी का नरम हिंदुत्व रास नहीं आ रहा था और वह उनके ऊपर शंका कर रही थी जो बाद में सही साबित हुई। बूटा सिंह की तमाम कोशिशों के बाद भी बात बन नहीं रही थी। 

विश्व हिन्दू परिषद की गतिविधियों और सरकार की उदासी को देखते हुए शैयद शहाबुद्दीन ने 12 मार्च 1989 का दिन निर्धारित कर दिया बाबरी मार्च का। उधर, उसी तारीख को हनुमान चालीसा पाठ का दिन भी तय हो गया। गाँव-गाँव बजरंग दल की बैठकें इस मुद्दे पर होने लगी थीं। यहाँ यह भी सही है कि अभी तक दोनों पक्षों को जनसमर्थन नहीं मिल रहा था, लेकिन सरकार को टकराव दिखने लगा था। बूटा सिंह ने शहाबुद्दीन को पत्र लिखकर मार्च स्थगित करने और वार्ता की टेबल पर आने के लिए कहा। कांग्रेस के सभी मुसलमान सांसदों को भी सक्रिय किया गया और शहाबुद्दीन ने मार्च स्थगित करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा का बाबरी कमेटी की यूपी इकाई ने विरोध किया और कुछ दिन बाद फैजाबाद में एक मीटिंग रखी, जिसमें जिलानी और आज़म खान के सामने कुछ वक्ताओं ने शहाबुद्दीन पर बूटा सिंह यानि केंद्र का एजेंट होने का आरोप लगाया। काफी मान मनौव्वल के बाद ये लोग शहाबुद्दीन और बूटा सिंह से मिले और हिन्दू संगठनों से भी वार्ता के लिए तैयार हो गए, लेकिन शर्त थी कि सन 86 से पहले का स्टेटस जो कोर्ट ने तय किया था, कि केवल पुजारी को वहां जाने की अनुमति रहे। यह शर्त राजीव गाँधी की ताला खोल अभियान के खिलाफ थी। उधर, हिन्दू संघर्ष समिति के प्रवक्ता अशोक सिंघल का कहना था कि बात होती रहनी चाहिए, लेकिन श्री राम जन्मभूमि छोड़ने की बात नहीं की जा सकती। सरकार बात कर रही थी तो फिर शिलान्यास ?

इस बारे में फर्स्ट पोस्ट की एक पुरानी रपट के मुताबिक तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने बताया था, जब वो नरसिम्हा राव से बगावत करके अपनी कांग्रेस बनाए थे। तिवारी ने कहा था की राजीव गाँधी बूटा सिंह के साथ गोरखपुर के पास देवरहवा बाबा के दर्शन को गए, साथ में मुख्यमंत्री भी थे। बाबा ने प्रधानमन्त्री से कहा- “बच्चा, हो जाने दो।” तिवारी कहते हैं की “बच्चे ने हो जाने दिया।”

शिलान्यास था विश्वहिन्दू परिषद के एजेंडे में और इसके लिए देश भर से ईंटे और चंदे जुटाने का जागरण अभियान शुरू हो चुका था। असम, पंजाब से लगायत श्रीलंका तक में राजीव गाँधी की नीतियों के चलते देश को बहुत नुकसान हो रहा था और खुद कांग्रेस भी जनता की नजरों में गिरती जा रही थी। ऊपर से वी.पी. सिंह की बगावत को कम्युनिस्टों के साथ भाजपा का भी समर्थन था। राजीव गाँधी को अगले चुनाव में विजय मुश्किल लग रही थी। उन्होंने आने वाले आम चुनाव के लिए अपना अभियान अयोध्या में दर्शन-पूजन से शुरू किया और वहां भाषण में देश में ‘राम राज्य’ लाने का वायदा किया। कहा जाता है की भाषण मणिशंकर अय्यर ने लिखा था लेकिन ‘राम राज्य’ का जिक्र अय्यर के पर्चे में नहीं था। वह राजीव गांधी की अपनी सोच थी। कांग्रेस के राम राज्य वाले वायदे से विश्व हिन्दू परिषद् का आन्दोलन और तेजी से गति पकड़ता है, क्योंकि उसे लगा कि राजीव उसका एजेंडा ले उड़ेंगे। यहाँ यह भी याद रहे कि उस समय सूबे के बड़े कांग्रेसी नेता दाऊ दयाल खन्ना भी परिषद के समारोहों में दिखते थे और आन्दोलन को पूरा समर्थन था। इसी समय बूटा सिंह लखनऊ आते हैं और उनकी मुख्यमंत्री तिवारी के साथ अशोक सिंघल से वार्ता होती है। बीच में अदालतों का भी इस्तेमाल होता है। सरकारी अनुमति से विवादित परिसर से सटी नजूल की जमीन पर 9 नवंबर 1989 पर विश्व हिन्दू परिषद् का शिलान्यास संपन्न होता है। बाबरी कमेटी को ठगे जाने का एहसास होता है। शहाबुद्दीन से लगायत शाही इमाम तक खुल कर अपने पक्ष का दर्द बयान करते हैं, लेकिन राजीव गाँधी आग लगा कर आगे बढ़ चुके थे।

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1989 में हुआ शिलान्यास समारोह

यह तो हुई पहली बार सरकारी स्तर पर खूब ढेर सारी बात। दोनों पक्षों को बैठा कर बात करने की बात। हाँ तब कांग्रेस के नेता तारिक अनवर ने पार्टी के मुसलमान नेताओं की बैठक के बीच राजीव गाँधी से जरूर कहा था कि अब यह मुद्दा विश्व हिन्दू परिषद् और बाबरी कमेटी के लिए बड़ा मुद्दा बन चुका है और दोनों पक्ष अपनी लाइन से हटने के लिए तैयार नहीं होंगे, क्योंकि उनकी राजनीति का यही आधार है। यहाँ यह भी याद रखना चाहिए कि अदालत की तरफ से नियुक्त पुजारी, महंत लालदास ने शिलान्यास का विरोध किया था।

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इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी अपना रथ लेकर निकल गए, जिसकी चर्चा करने का कोई मतलब नहीं क्योंकि सबको याद होगा की कैसे देश में जबरदस्त ध्रुवीकरण शुरू हो गया और जिस मुद्दे को कांग्रेस अपना बनाने की कोशिश में थी, उसने भाजपा को बहुत अधिक ताकत दे दी। गर्व से कहो हम हिन्दू हैं और जय श्री राम के नारे की सवारी से भाजपा चढ़ बैठी। 

हम फिलहाल चर्चा करेंगे दोनों पक्षों में सरकारी स्तर पर करवाई जा रही बात की। आज की अदालती मंशा के अनुरूप आपस में मसला सुलझा लेने की। चंद्रशेखर ने अपने कम समय के ही कार्यकाल में इस मुद्दे पर खूब बात करवाई और दोनों पक्षों को भी ध्यान से सुना। उन्हें अपने-अपने पक्ष में प्रमाण रखने का भी मौका दिया। लोगों ने रखा भी। यहाँ तक कि एक पक्ष के बड़े विद्वान ने राम को इजिप्ट का फराओ होने का भी प्रमाण दिया, यह लिखते हुए की भारत से उनका नाता ही नहीं था। लेकिन चंद्रशेखर वाकई मुद्दे को लेकर गंभीर लगते थे। उस वक्त दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार अदनान खशोगी, हथियार के सबसे बड़े दलालों में से एक, भारत आया। वह चंद्रास्वामी का चेला था। उस समय तक यहाँ के अखबारों में भी उसकी विलासिता और हवा में होटल जैसे हवाई जहाज़ों की खबरें छपती थीं। उसके बारे में कहा जाता था कि शाह फहद से लेकर जार्ज बुश और सद्दाम हुसैन से भी वह जब चाहे बात कर सकता है। पालम हवाई अड्डे से उसका काफिला सीधे भोड़सी आश्रम आया। चंद्रास्वामी के मुताबिक उसे दिखाना था कि भारत के प्रधानमंत्री कितनी सादगी से रहते हैं। खैर, उसके सम्मान में भाजपा सांसद डॉ. जे. के. जैन की कोठी में भोज हुआ, जिसमें आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद नाना जी देशमुख, विष्णु हरि डालमिया से जुड़े लोगों के अलावा फारुख अब्दुल्ला और तमाम मुलसमान नेता भी उपस्थित थे। किसी भी बड़े समारोह के एक अहम चेहरा बन चुके सुब्रमण्यम स्वामी भी थे। भोज के बीच में अदनान के लिए सऊदी सुल्तान फहद के फोन आने का ड्रामा भी हुआ था। यहाँ बात मंदिर निर्माण के लिए जन सहमति बनाने की भी हुई। चंद्रास्वामी के सचिव, मामा जी के यहाँ आयोजित भोज में जामा मस्जिद के नायब इमाम भी पहुंचे, हालाँकि उन्होंने बाद में सफाई दी कि उन्हें अदनान की उपस्थिति की सूचना मिली, तो निकल लिए। अदनान के खैर मकदम की विपक्षियों ने आलोचना शुरू की और साथ ही भाजपा ने जैन को अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटा दिया। अदनान अखबार वालों को बता रहा था कि कैसे जेद्दा में विकास कार्यों के लिए सैकड़ों साल पुरानी मस्जिद दूसरी जगह रिलोकेट की जा चुकी है और अगर जरूरत समझी गयी तो सउदिया से बाबरी के लिए भी फ़तवा दिलवा दिया जाएगा। कांग्रेस के कुछ प्रवक्ताओं ने कुछ नेताओं ने इस कुख्यात व्यक्ति को मिल रही इज्जत की आलोचना करनी शुरू कर दी थी, तब तक पार्टी प्रवक्ता गाडगिल साहब का अधिकारिक बयान आ गया कि खगोशी ने अपने दोनों बेटों के साथ राजीव गाँधी से मुलाकात की। तब व्हाट्सअप का ज़माना नहीं था, इसी कारण विरोध कर रहे कांग्रेसी नेताओं को इस मीटिंग का अंदाजा नहीं था। खशोगी ने दोनों पक्ष के लोगों को उनकी सामाजिक संस्थाओं के लिए काफी मदद की भी पेशकश की थी। हालाँकि, जामा मस्जिद की तरफ से बयान आया कि हम अपने अंदरूनी मामलों में सउदिया का कोई फ़तवा नहीं मान सकते। जब यह चर्चा आम हो गयी कि यह व्यक्ति बाबरी में मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है, तो दिल्ली में सउदिया के राजदूत ने बयान दिया कि अदनान जो भी कह रहा है वह उसकी व्यक्तिगत राय है। अदनान वापस लौट गया। याद रहे कि भारत आने से तीन साल पहले उसकी स्विटजरलैंड में गिरफ्तारी और अमेरिकन कोर्ट से बरी किये जाने की भी घटना हो चुकी थी। यह सन 91 के शुरू की बात है। फिर मार्च के महीने में राजीव गाँधी ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जो केवल वीपी सिंह के जोश को ठंढा करने के लिए बनवाई गयी थी। मई में राजीव गाँधी की हत्या हो जाती है।

आया बातचीत का नरसिम्हा राव युग

अब बातचीत का नरसिम्हा राव युग आता है। आईबी की तत्कालीन रपटें कहती हैं कि विश्वहिन्दू परिषद अब बात की जगह उग्रता से आगे बढ़ रही थी और राजनैतिक दल के रूप में भाजपा भी मंदिर वहीं बनायेंगे के नारे पर ही टिकी हुई थी। फिर तो कहानी सबको पता ही है। कुलदीप नैयर अपनी पुस्तक ‘बियोंड द लाइन्स’ में लिखते हैं कि जब कारसेवक विवादित परिसर में घुस गए तब भारत के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पूजा पर बैठ गए और जब जगह समतल होने की सूचना मिली, तब उनकी पूजा समाप्त हुई। यानी काफी लम्बी पूजा चली। राहुल गाँधी ने कभी कहा था कि गाँधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री रहा होता तो मस्जिद नहीं गिरती। राहुल को ताला खुलने और शिलान्यास की कथा पढनी चाहिए। अयोध्या 92 देश के इतिहास की बड़ी घटना बन गयी जो आगे से राजनीति निर्धारित करने लगी और आम जनता तो तब भी वैसे ही थी जैसे अभी, लेकिन समुदायों के बीच मनभेद और मतभेद की खाई चौड़ी होती गयी। अब अयोध्या का मसला दो जमीन के विवाद से बहुत आगे निकल चुका है। वाजपेयी सरकार ने भी खूब बात की, जिसकी चर्चा जरूरी नहीं क्योंकि बात से क्या निकलता है यह दिख ही रहा था।

18 अक्टूबर 2013 के लिए विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या में संकल्प दिवस की तैयारी शुरू की थी, जिसके पहले प्रदेश की समाजवादी सरकार के गृह विभाग के एक पत्र ने हलचल मचा दी। विभाग के सचिव की तरफ से डीजीपी, एडीजी (कानून व्यवस्था) और फ़ैजाबाद के अधिकारियों को एक पत्र लिखा गया जिसका विषय था ‘सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण की तरह श्री राम जन्मभूमि पर संसदीय कानून बना कर मंदिर का निर्माण’, मजमून था की उपरोक्त विषय पर प्रमुख सचिव गृह की अध्यक्षता में 14 अक्टूबर को बैठक बुलाई गयी है। इस बारे में अखबार में छपते ही हडकंप मच गया। प्रमुख सचिव गृह ने इसे क्लर्क की गलती यानि टाइपिंग मिस्टेक बताया, सचिव हटाये गए। सेक्शन अफसर सस्पेंड हुआ और आज़म खान ने बयान दिया की यह सरकार के खिलाफ साजिश लगती है, चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि समाजवादी सरकार है। यहाँ यह भी याद रहे की कारसेवकों पर गोली चलवाने से पहले ही, मुलायम सिंह की ही सरकार में जब अयोध्या की टेढ़ी बाजार पुलिच चौकी को थाना बनाया गया तो उसका नाम रखा गया ‘थाना श्रीराम जन्मभूमि’, कुछ लोगों ने विरोध किया की विवादित नाम क्यों रखा गया है,तब तो थाना बाबरी मस्जिद भी रखा जा सकता था। सरकार ने बोर्ड पर से ‘श्री’ शब्द हटा दिया और जिस जगह पर कानून व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी प्रशासन की है, वह इलाका अब थाना राम जन्मभूमि के अंतर्गत हो गया।

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सुप्रीम कोर्ट भी जलीकट्टू से लेकर डांसबार और दही हांडी पर फैसले दे देती है, लेकिन अयोध्या उसे लगता है कि बातचीत से सुलझा लेना चाहिए क्योंकि अदालत के विचार से ऊपर का विषय है। करते रहें लोग बात। यह अच्छी बात है लेकिन यह भी ध्यान रहे कि काफी लोगों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जिस फैसले की तारीफ़ की थी, वह भी बंटवारे का फैसला था, जबकि मुकदमा बंटवारे का नहीं, बल्कि मालिकाना हक़ का दायर है। भले अयोध्या के लोग कहें कि सुब्रमण्यम स्वामी का इस मसले से क्या मतलब, लेकिन वो राजीव गाँधी के पुराने दोस्त हैं जिन्हें ताला खुलवाने से लेकर शिलान्यास की अनुमति देने वाले राजीव गाँधी याद होंगे। स्वामी जो कहते हैं कि अगर राजीव दोबारा प्रधानमंत्री बन गए रहते, तो मंदिर बन गया रहता तो उसका आधार ताला खोलना ही है जो बातचीत से नहीं, अदालत से आदेश निकलवा कर खुलवाया गया था।

स्वामी लगे रहेंगे, क्योंकि सरकार उन्हें मंत्री बनाने वाली तो है नहीं। ऐसे में बात होती रहे, लेकिन किससे और किस-किसके बीच? स्वामी यह भी कह रहे हैं क उस स्थान पर 1949 से लगातार पूजा हो रही है, अब इसे कोई अदालत छेड़ने से रही। याद रहे प्रणव मुखर्जी ने ताला खोले जाने की घटना को अपनी पुस्तक ट्रबुलेंट इयर्स  में ‘इरर ऑफ़ जजमेंट’ लिखा है।

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