स्टिंग वाली पत्रकारिता

कुछ समय पहले तक मीडिया को लोकतंत्र का एक खम्भा माना जाता था फिर धीरे-धीरे लगने लगा कि यह खंभा हिल रहा है और फिर एक ऐसा समय भी आ गया जब मीडिया बस एक इंडस्ट्री के रूप में ही स्थापित है। इसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है, क्योंकि ऐसी हालत ही पैदा हो चुकी है कि अब समझदार लोग इस इंडस्ट्री का खेल समझ चुके हैं।

पब्लिक इंटरेस्ट न्यूज़ के नाम पर कुछ भी मतलब कुछ भी

यह गिरावट शुरू हुई टीवी चैनलों की आपसी गलाकाट ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव देने की हवस से। जी हाँ, सही पढ़ा आपने क्योंकि चौबीसों घंटे न्यूज़ देने के नाम पर उनके बीच एक ऐसी प्रतिस्पर्धा पनप गई जिसका असर हुआ की असल खबरें मरने लगीं और उनकी जगह स्टूडियो में खबरें गढ़ने का धंधा शुरू हो गया। इस मामले में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के साथ भी धंधे का ख्याल रखा जाता है और नैतिकता, मिशन, सरोकार जैसी बातें केवल कांफ्रेंस हॉल में या नामी पत्रकारों के ब्लॉगपोस्ट में होती हैं। स्क्रीन पर चाहिए तो सिर्फ ऐसी पैकेजिंग जो अधिक से अधिक ग्राहकों को टीवी स्क्रीन से चिपकाए रखने में सफल हो इन सबके बीच खबरें भी जगह पा ही जाती हैं। लेकिन आप आजकल की स्थिति देखिये तो लगता है की केवल उत्तरप्रदेश में ही चुनाव हुए हैं और मणिपुर, गोवा और पंजाब इस देश में नहीं हैं। जिस तरह का अतिरेक हुआ है, उसके पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दे दिया जाएगा कि लोगों की उत्सुकता योगी जी के बारे में जानने की अधिक है, तो इसका मतलब यह नहीं होता की नेशनल चैनल भी दिन भर केवल योगी जी क्या कर रहे हैं, यही बताते रहें। दूसरे नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री क्या कर रहे हैं, यह भी तो बताना चाहिए भाई लेकिन नहीं। पब्लिक इंटरेस्ट न्यूज़ के नाम पर मीडिया वही परोसती है, जिसमें उसका इंटरेस्ट होता है और मजबूरी में दर्शक उसे ही देखते रहते हैं। खबर का अंश न भी हो तो मात्र मनोरंजन के लिए। हमेशा बात उठती रहती है कि चैनलों के ऊपर लगाम लगाई जाए, लेकिन लगाएगा कौन ? सरकार को भी तो जनता का मनोरंजन करते रहना होता है और इसके लिए इन चैनलों की जरूरत पड़ती ही रहती है।

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मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल

केरल में एक बड़े मीडिया समूह के चैनल लॉन्चिंग के साथ ही बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ चली जिसकी परिणति यह हुई की एक मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा और बाद में उस चैनल के सीईओ से लगायत पूरी सम्पादकीय टीम को जेल जाना पड़ा, लेकिन दिल्ली में बैठकर नैतिकता झाड़ने वाले और ट्विटर पर समाज सुधार अभियान चलाने के लिए समय-समय पर अपना एजेंडा ट्रेंड करवाने वालों के बीच ख़ामोशी ही रही, जबकि मीडिया की विश्वसनीयता पर बड़ी बहस हो सकती थी।

शरारत और सनसनी का कारोबार?

नीरा राडीया टेप और एस्सार टेप में जिनके नाम सामने आये वो उसके बाद भी देश को ‘दिशा’ देने का अपना मिशन निर्बाध रूप से चला ही रहे हैं, ऐसे लोगों के लिए केरल की घटना सामान्य ही रही, लेकिन कम से कम अपने पाठकों और दर्शकों को बताना तो चाहिए ही कि मीडिया कितनी आगे बढ़ कर ब्रेकिंग न्यूज़ लाती है, वह भी जनहित में। मंगलम समूह मलयालम का बड़ा मीडिया समूह है, जिसकी नींव कभी अख़बार के हॉकर रहे एम.सी.वर्गीज ने डाली थी। साठ के दशक में उनके द्वारा शुरू किया गया अखबार मंगलम आज सात संस्करणों वाला बड़ा मलयाली अखबार है। इस मिशन से हुई कमाई से इस समूह ने अस्पताल, स्कूल, इंजीनियरिंग कालेज सहित तमाम उपक्रम खड़े किये हुए हैं। भला हुआ कि चैनल लॉन्चिंग से कई साल पहले ही एम.सी.वर्गीज साहब दुनिया से जा चुके हैं वर्ना मलयाली मीडिया के एक काफी सम्मानित नाम को अपने समूह के कारनामे को भी छापना पड़ सकता था। उनके मरने के बाद बेटों ने साम्राज्य संभाला और समय के साथ बदलते हुए चैनल की भी तैयारी की। साल-डेढ़ साल से काम चल रहा था और 26 मार्च को धूमधाम के साथ चैनल लॉन्च हो गया। लॉन्चिंग बुलेटिन में ही बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ चली और राज्य के परिवहन मंत्री ए.के. ससीन्द्रन का पर्दाफाश किया गया।

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ए.के.ससीन्द्रन

चैनल के मुताबिक यह बड़ा स्टिंग ऑपरेशन था, जिसमें एक दुखियारी महिला अपने किसी काम के लिए मंत्री जी से गुहार लगा रही थी और बदले में मंत्री जी उससे यौन सुख चाहते थे। कुल मिलाकर स्टिंग यह था कि काम करने के बदले में मंत्री महिलाओं का यौन शोषण करते हैं और उनके इस कारनामे का मंगलम टीवी ने पर्दाफाश किया।

ब्रेकिंग न्यूज़ की दौड़ में पत्रकारिता का होता कत्ल

चैनल की लॉन्चिंग बुलेटिन हिट हो गई और सूबे में हडकंप मच गया। लोगों को कांग्रेस सरकार की याद आ गई जब एक महिला सरिता के चक्कर में तमाम बड़े-बड़े नेताओं की लुंगी खुल चुकी थी और खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमन चांडी के पीए की भी गिरफ्तारी हुई थी। मामला सोलर पैनल बांटने से जुड़े घोटाले का था, जिसे वहां लोग अब भी सरिता ऊर्जा के नाम से याद करते हैं। लगा की वाममोर्चे की इस सरकार में भी उन्हीं दिनों की वापसी हो चुकी है। सियासी तूफ़ान के बीच परिवहन मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा, जिसकी ब्रेकिंग न्यूज़ दिल्ली की मीडिया ने भी चलाई, क्योंकि मंत्री के सेक्स स्कैंडल का मामला था, ऐसी खबरों में जनता की रूचि भी खूब होती है, क्योंकि लोग चटकारे लगा कर इन खबरों का आनंद लेते हैं।

मंत्री ने यह कहते हुए इस्तीफ़ा दिया की वह बिलकुल निर्दोष हैं और किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। इसपर भी आम जनता की पहली प्रतिक्रिया यही थी की ऐसा तो सभी बड़े आरोपी कहते ही हैं क्योंकि जांच करने वाला तंत्र भी उन्हीं लोगों का होता है।,

चारा फेंक कर फंसाने वाली ये कैसी पत्रकारिता?

मजे की बात यह है कि रिकार्डिंग केवल मंत्री जी के आवाज़ की ही सुनाई गयी, दूसरी तरफ से क्या बात हो रही है यह नहीं पता चल सका। इस स्टिंग में बतायी जा रही दुखियारी महिला की तरफ से न तो कहीं पुलिस या महिला आयोग में शिकायत दर्ज करवाई गई, न ही वह मीडिया के सामने आई जैसा कि ऐसे तमाम मामलों में होता है। हाँ, मंगलम टीवी अपने इस खुलासे को मिली पहचान से काफी उत्साहित था और काफी प्रतिस्पर्धा वाले बड़े बाज़ार में सफलतापूर्वक घुसने का डंका बजा रहा था। लेकिन स्टिंग के तरीकों को लेकर कुछ लोगों ने शंका व्यक्त करते हुए कहा की यह मामला हनी ट्रैप का लग रहा है। यानी मंत्री को चारा फेंक कर फंसाने की पत्रकारिता हुई है। 

जब यह आवाज़ तेज होने लगी तो चैनल के सीईओ अजित कुमार ने कहा कि उनको अपने निर्भीक पत्रकारों पर गर्व है और उनके पास टेप उस पीड़ित महिला ने ही पहुंचाया था और चलाने से पहले मंत्री जी के आवाज़ की पहचान कर ली गई थी। हनी ट्रैप की संभावना पर भी उन्होंने कहा की अगर ऐसा भी है, तब भी अनुचित नहीं क्योंकि मंत्री का पद जिम्मेदारी वाला होता है और बड़ी मछलियों को फंसाने और समाज से गन्दगी साफ़ करने के लिए ऐसा करना कहीं से भी गलत नहीं। मंत्री ने एक महिला से अनुचित तरीके से बात की है और यदि यह बात आपसी सहमति का मामला है तो मंत्री खुद सामने आकर सफाई दें। उन्होंने कहा की उनके चैनल के चलते ही मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा, जो हमारी विश्वसनीयता के लिए काफी है।

चैनल अपना सीना ठोंक रहा था। दूसरे चैनलों के दर्शक अब मंगलम टीवी से चिपक चुके थे और केरल के कुछ बड़े पत्रकार इस तरह की पत्रकारिता के बारे में फेसबुक पर सवाल उठा रहे थे। इसी बीच चैनल की एक पत्रकार नीमा अशरफ ने इस्तीफ़ा दे दिया और यह कहा कि इस तरह से ही बड़े लोगों को फंसाने के लिए ही चैनल में एक स्पेशल टीम बनाई गई है। मीटिंग में कुछ ऐसे लोगों की लिस्ट भी हम लोगों को दी गई थी, जिनके बारे में अनुमान था कि वे आसानी से फंस सकते हैं।

अब आप सोचिए कि दर्शक और विज्ञापन जुटाने की मारामारी में जांबाजों को कितनी मेहनत करनी पड़ती है। नीमा ने यह भी कहा कि वह उस टीम का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन उन्हें पता था कि कुछ पक रहा है। अब धीरे-धीरे मामला खुल गया और साफ़ हो गया कि चैनल की ही टीम ने मंत्री को फंसाया था और बात करने वाली कोई दुखियारी महिला नहीं, वरन ‘इन्वेस्टीगेशन टीम’ की ही एक ‘रिपोर्टर’ थी। मामला खुलते ही तमाम  लोग नीमा अशरफ पर ही शक करने लगे और उनकी फेसबुक वॉल उनकी परेशानी का सबब भी बन गई, हालाँकि वो साफ़ कर चुकी थीं कि इस मामले में उनका हाथ नहीं है। महिलाओं का किसी भी क्षेत्र में काम करना लाख विकास और प्रगितिशीलता के बावजूद अभी तक सहज नहीं है। उसपर से ऐसा मामला सामने आ जाने के बाद केरल में महिला पत्रकारों के ऊपर भी तमाम सवाल होने लगे। ध्यान रहे मीडिया समूहों की कार्यशैली और उनकी तरफ से रिपोर्टरों को दिए जा रहे टारगेट की जगह यह सवाल महिला पत्रकारों से हो रहे हैं। 

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तमाम बड़े नेताओं ने महिला पत्रकारों के फोन उठाने बंद कर दिए कि उनको ए.के. ससीन्द्रन वाला हाल नहीं चाहिए। नैतिकता-अनैतिकता की भी तमाम बातें हो ही रही हैं। हनी ट्रैप का खुलासा होने और सरकार की तरफ से जांच शुरू करने और मीडिया-सोशल मीडिया से लगायत जनता में भी थुक्काफजीहत होने के बाद चैनल के सीईओ अजित कुमार ने माफ़ी मांगी और कहा की उनकी एक रिपोर्टर ने मंत्री का व्यवहार सामने लाने के लिए स्टिंग किया था और उसके ऊपर कोई दबाव नहीं था, उसने जनहित में आगे बढ़ कर खुद यह काम किया था।

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मंगलम टीवी चैनल के सीईओ अजित कुमार

पुलिस जांच शुरू हो गई और बवाल बढ़ता देख चेयरमैन साजन वर्गीज ने इस्तीफ़ा दे दिया। महिला पत्रकारों के संगठन ने एक महिला के ऐसे इस्तेमाल के विरोध में प्रोटेस्ट मार्च निकाला। सरकारी मशीनरी तेज होती है और चैनल के सीईओ अजित कुमार सहित पूरी सीनियर सम्पादकीय टीम की गिरफ्तारी हुई। हाँ, गिरफ्तारी के पहले अजित कुमार ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी कि उनकी कार से उनका लैपटॉप और स्मार्ट फोन चोरी हो चुका है। जाहिर है यह रिपोर्ट भी ‘इन्वेस्टीगेशन टीम’ की सलाह पर ही लिखाई गई लगती है, क्योंकि हार्ड डिस्क और मेमरी कार्ड में ही तो सबूत रहे होंगे। वैसे बचना तो फिलहाल मुश्किल लग रहा है, इन जांबाज पत्रकारों का।

मजे की बात है कि चैनल के तौर तरीकों की निंदा करने वाले पत्रकार भी अपनी बिरादरी के लोगों की गिरफ्तारी के बाद दुखी हो गए, क्योंकि उनके मुताबिक़ बारह घंटे की पूछताछ के बाद गिरफ्तार करने का फैसला हजम करने लायक नहीं है। हालांकि वह कथित महिला पत्रकार सामने नहीं आई जिसका इस्तेमाल हुआ। गिरफ्तार लोगों में इन्वेस्टीगेशन टीम का हेड जयचंद्रन भी शामिल है, जो वहां काफी नामी पत्रकार है। यह एक बार काफी पहले भी जेल जा चुका है जब एक कांग्रेसी विधायक के साथ मिलकर उसने फर्जी चिट्ठी तैयार की थी, जिसके आधार पर एक मंत्री पर हवाला कारोबार में शामिल होने का आरोप लगा था। यह मामला संसद में भी उठा था और जांच के बाद सबकुछ फर्जी पाया गया।

मंगलम अखबार एक बार इसरो को भी बदनाम कर चुका है, जब उसमें हफ़्तों एक जासूसी काण्ड का खुलासा होता रहा, जो जाँच में फर्जी पाया गया। उस मामले में मालदीव की एक महिला के इसरो के कुछ वैज्ञानिकों से संबंध बताये गए जो पाकिस्तानी आईएसआई के लिए काम करती थी और रॉकेट तकनीक के बारे में सूचनाएं पाकिस्तान भेजती थी। इस स्टोरी के आधार पर सीबीआई जांच भी बैठानी पड़ी थी और सुप्रीम कोर्ट में साबित हुआ कि वह केवल डेस्क पर बैठ कर लिखी गई गप्प थी

निर्दोष का गला घोंटता ‘स्टिंग’ ऑपरेशन

स्टिंग वाली पत्रकारिता अपने आप में बहुत खतरनाक है, क्योंकि बिना संदर्भ-प्रसंग के किसको किस हालत में ट्रैप कर लिया जाय कहा नहीं जा सकता। ऊपर से आजकल की खोजी पत्रकारिता भी पत्रकारिता के स्थापित मापदंडों को कब का भूल कर केवल सनसनी परोस रही है।

सेना के लांसनायक राय मैथ्यू की आत्महत्या की खबर अभी ताज़ी ही है, जो ऐसी ही जांबाज पत्रकारिता की भेंट चढ़ गया

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कैंटोनमेंट के भीतर जाकर जहाँ बिना अनुमति तस्वीरें लेना प्रतिबंधित होता है, उसका विडियो बना कर पोस्ट कर दिया गया। ऐसा करने वाली पत्रकार पूनम अग्रवाल खुद को बड़े-बड़े मामलों की एक्सपर्ट बताती हैं, लेकिन ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट के बारे में उनको नहीं पता, इसीलिए जब मैथ्यू की आत्महत्या के बाद सेना की शिकायत पर उनके खिलाफ नासिक पुलिस ने केस दर्ज किया, तो पत्रकारों में हलचल होने लगी और इसे पत्रकारिता पर हमला बताया जाने लगा। स्टिंग पोस्ट करने वाले वेब पोर्टल से लेकर तमाम नामी पत्रकारों ने प्रशासन के कदम को पत्रकारिता का गला घोंटने वाला कदम करार दिया। कोई यह नहीं बता रहा है कि जब सबकुछ सही ही था, तो बाज़ार में अपना पैर जमाने की कोशिश में लगे उस पोर्टल से वह विडियो, मैथ्यू की आत्महत्या के बाद हटा क्यों दिया गया ? 

सबसे अलग देने की कोशिश में कब मीडिया ने नए और अनैतिक तरीकों को गले लगा लिया यह याद करने की जरूरत नहीं। पाठकों या दर्शकों के लिए अब खबरें भी कुछ देर के मनोरंजन का साधन ही बन कर रह गई हैं और यह हालत उन्ही लोगों ने पैदा की है, जिनकी जिम्मेदारी थी कि केवल खबर देने से ही वास्ता रखें, लेकिन अब मामला जमीनी खबरों से बहुत आगे, हवा में चला गया है।

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