घमंड की हार

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पराजय से ऐसा नहीं है कि केवल यादव जी लोग दुखी हैं। तमाम लोग दुखी हैं, लेकिन फेसबुक से लेकर जमीन तक पर जो सबसे अधिक दुखी हैं, उनमें बहुमत यादव जी लोगों का ही है। क्यों भाई? सूबे में जितने भी गरीब और साधारण यादव परिवार हैं, क्या सबके घर में सैफई वाला समाजवाद घुस गया था?

 ‘यादवों’ की राजनीति में सेंध

फेसबुक पर अब पूरी तरह से यादव दिख रहे कुछ चिंतकों से भी आग्रह है कि वो आत्मनिरीक्षण करें कि कहीं वो केवल अपने जातीय दंभ को लेकर ही उत्तेजित तो नहीं हैं? ध्यान रहे मंडल कमीशन के उठान के बाद ‘सदियों से शोषक’ रही जातियों की जगह इसी वर्ग ने ली है, जबकि मुलायम सिंह या अखिलेश यादव के व्यवहार में यह दंभ कहीं नहीं दिखता। लालू प्रसाद के व्यवहार में यह जरूर पहले दिख जाया करता था, क्योंकि राजनैतिक पकड़ के लिए वह जरूरी था। शायद बहुतों को याद होगा मंडल कमीशन लागू हो जाने के बाद लालू जी का ऐतिहासिक भाषण। मैदान के किनारे ठाकुर-भूमिहारों के कुछ लड़के मंडल कमीशन के विरोध में नारा लगा रहे थे, तो लालूजी ने ललकार लगायी- ‘हम नउआ के बेटा न हैं, हमरा अहिर लाठी में तेल पिला कर आया है सब, अभिये तुम लोग का नशा झाड़ देगा’। सूबे में जिस कर्पूरी ठाकुर की समाजवादी विरासत की गद्दी अब लालू जी के पास आ रही थी वह इनके लिए ‘नउआ का बेटा’ भर होकर रह गए थे। व्याख्या करने वाले इसकी सामाजिक व्याख्या करते हुए कहते हैं कि लालू प्रसाद वंचितों, शोषकों में जोश पैदा कर रहे थे कि अब उन्हें डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ज़माना उनका है।

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संवैधानिक ढंग से समाज में आने वाले बदलाव की यह अलग कहानी है। हालाँकि, अपने समाज को उन्होंने क्या दिया? सौ रुपए में कुरता-पाजामा खरीद कर नेता बन जाने वाली भीड़ के सिवाय। जो भी मिला वह देश की संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में ही लोगों को मिला और इसके बाहर से जो भी अर्जित किया हुआ है, वह अनैतिक और असामाजिक कृत्यों का फल है। खुद बी.पी. मंडल जी को ये लोग पार्टी कार्यालयों में भले ही याद करते हों, मुझे नहीं पता लेकिन एक आम यादव मतदाता उनसे अपरिचित ही है।

बिहार के एक बड़े नेता हैं जो अब अपना बुढ़ापा झारखंड में काट रहे हैं, यादव ही हैं। मंडल कमीशन को लागू करवाने की लड़ाई में उनका नाम बहुत ही ऊपर है, उनको भी ये लोग भूल गए। कहा जाता है की रपट लागू करने के बाद दिल्ली में वीपी सिंह और देवी लाल उनके आवास पर गए धन्यवाद देने कि उन्होंने कांग्रेस की तरफ से दी जा रही है लालच की परवाह किए बिना अपने मिशन को जारी रखा था। हो सकता है पोस्ट पढ़ने वाले कुछ लोगों को उनका नाम याद आ जाए। यहाँ यह भी चर्चा होनी चाहिए कि खुद बी.पी.मंडल जी से इंदिरा गांधी रपट में कुछ बदलाव चाहती थीं और बदले में कश्मीर का गवर्नर का पद का प्रलोभन था, उन दिनों वह काँटों का ताज नहीं वरन क्रीम पोस्टिंग थी। मंडल जी तैयार नहीं हुए और जिस दिन उन्होंने रपट पूरी करके प्रस्तुत कर दी उसी शाम बिहार के अपने गाँव के लिए दिल्ली छोड़ दिए थे। खैर यहाँ वह मुद्दा नहीं है, क्योंकि इसपर बात होगी तो बहुत लोगों की तल्खी बढ़ जायेगी। बात है उदास हो रहे लोगों की।

अभी आप देख लीजिये खुद यादव समाज में भी अनगिनत मेधावी लड़के मिल जायेंगे जो तमाम कोशिशों के बावजूद सरकारी सेवाओं में नहीं आ सके हैं, क्योंकि एक ‘विशेष पात्रता’ उनके भीतर नहीं थी। उनका परिवार सक्षम नहीं था, जिस आधार पर आजकल नौकरियां लगा करती हैं। हाँ, मेधावी का मतलब वास्तव में मेधावी, मुलायम मॉडल वाले सिस्टम की पैदाइश नहीं, दिल लगा कर ईमानदारी से पढ़ाई करने वाले। कोर्ट-कचहरी हो या कोई दफ्तर, ऐसा नहीं था की यादव जी के जाने पर सब कुछ फटाफट हो जाता रहा हो। फिर भी एक बड़ा वर्ग ऐसा बन गया था, जिसके भीतर दंभ था और ऐसा था की दलितों के साथ उनके बर्ताव के वातावरण से ही बड़े से बड़ा चिन्तक आज सपा-बसपा को स्वाभाविक साझेदार मानने से हिचकता है।

अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण के साथ ही मंच पर ही उत्साही समर्थकों ने हंगामा किया था और पूरी नयी सरकार, अपने सभी शुभचिंतकों के साथ सुब्रत राय सहारा के यहाँ भोज पर उसी दिन चली गयी।

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समाजवाद एक नए रूप में आ रहा था जो पांच साल दिखता भी रहा और चुनाव से छ: महीने पहले अचानक आक्रामक रूप से, टीवी और अखबारों में काम बोलने लगा।

अरे फैंस बबुआ, जब व्यक्तिगत नुकसान नहीं है तो फिर उदासी काहे की?

जमीन से कटे हुए लोग मुख्यमंत्री के अगल-बगल ही नहीं उनके दिमाग में भी कब्ज़ा बना चुके थे। यह बात मान कर रखिये की यदि मुलायम और शिवपाल चुनाव प्रचार में निकले होते तो इतनी बुरी गत नहीं होती, क्योंकि राजनीति प्रतीकों की ही लड़ाई है। अब इन सब मामलों पर समीक्षा करने का अच्छा अवसर पार्टी के पास है, इत्मिनान से बातें होती रहेंगी। नए मुख्यमंत्री की घोषणा के साथ ही बहस का विषय बदल चुका है फिर भी जातिगत आधार पर दुखी होने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसका कारण यह है कि यदि वायदे के अनुसार नयी सरकार अपना काम करती है, तो जाहिर है कि सबका विकास होगा और यदि ढर्रा पुराना ही रहता है तो लाभ उन्हें ही मिलेगा जो साम, दाम, दंड, भेद से लेते रहे हैं, जिसमें आम जनता की जगह रसूख वालों की ही सुनवाई की परम्परा है। यह केवल यूपी में ही नहीं है, यह समस्या पूरे देश में व्याप्त है। तो अगर व्यक्तिगत नुकसान नहीं है तो फिर उदासी कैसी? यदि अपनी पार्टी के बड़े नेताओं के लिए उदास हैं, तो उसकी कोई वजह नहीं क्योंकि उनके पास सत्ता भले न हो, लेकिन उनके अपने कोई काम नहीं रुकने वाले। चुनाव के दौरान मंचों से एक दूसरे के खिलाफ खूब बयानबाजियां चलती हैं जिसको सुनकर जनता भी अपने अपने स्टैंड पर उछलती रहती है लेकिन नेताओं की अपनी सेहत पर कोई असर नहीं होता, क्योंकि यह सब केवल सत्ता के शिखर पर पहुँचने के प्रयास का एक स्वांग मात्र होता है, जिसका उद्देश्य जनता को बरगला कर अपने पाले में हांकना भर ही है। वही जनता जिसे जनार्दन बोल कर झाड़ पर चढ़ा दिया जाता है, लेकिन उससे दूरी इतनी रखी जाती है जो अंग्रेज भी नहीं रखते थे।

यूपी की राजनीति के इतिहास में ये तस्वीरें वाकई खास है, ये है नए दौर की राजनीति

अब खतम हो गयी वह पीढ़ी जो कहा करती थी की ‘इससे अच्छा तो अंग्रेजों का राज था’। फिर भी प्रजा और तंत्र की खाई चौड़ी ही होती जा रही है। यह विषय लंबा हो जाएगा। बात उदास लोगों की जिनके हाथ से सत्ता चली गयी है और उनकी विचाधारा के एकदम विपरीत वाले काबिज हो कर मुँह चिढ़ा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में नयी परम्परा दिखी जब पूर्व मुख्यमंत्रियों को मंच पर जगह दी गयी।

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मंच सजाने की कला में तो मोदी जी मास्टर माइंड हैं। जाहिर है यह योगी जी के दिमाग से निकला आईडिया नहीं रहा होगा, क्योंकि अपने ऊपर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह सरकार के ‘अत्याचार’ का वर्णन लोकसभा में करते हुए कभी योगी रो पड़े थे और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी उनको आश्वस्त कर रहे थे कि सदन उनके साथ है।

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उन्ही योगी के शपथ ग्रहण में मंच पर एन.डी. तिवारी, मुलायम सिंह और अखिलेश यादव भी थे। मायावती तो वैसे भी अपनी हार के बाद नयी सरकार के शपथ ग्रहण में नहीं आतीं और अगर विधानसभा सदस्य हैं तो इस्तीफा देकर राज्य सभा चली जाती रही हैं। राजनीति का सामान्य शिष्टाचार भी वो निभाने में विश्वास नहीं करतीं। उनके पिछले शपथ ग्रहण के समय मुलायम सिंह को मंच के सामने नीचे जगह दी गयी थी और शपथ ग्रहण के बाद वो नेता जी से मिलने की औपचारिकता निभाने भी नहीं गयी थीं। योगी के शपथ ग्रहण में पिता-पुत्र को जो सम्मान दिया गया वह प्रतीक ही तो है जनता को दिखाने का कि चुनावी रैलियों की बयानबाजी और तल्खी अलग बात है, राजनैतिक शिष्टाचार अलग बात। जाहिर है इससे पराजित दल के समर्थकों को भी सकारात्मक सन्देश मिला होगा। उन्हें अपनी ऊर्जा नकारात्मक चिन्तन की जगह अपनी कमियों को दूर करके फिर धूल झाड़ कर खड़े होने में लगानी चाहिए।

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अजय यादव नाम के एक आई.ए.एस. हैं 2010 बैच के तमिलनाडु कैडर के। उनकी सेवा नियमावली यह कहती है की मूल कैडर में 9 साल की सेवा के बाद ही कहीं डेप्युटेशन पर जाने की अर्जी स्वीकार की जाती है। उन्होंने कार्मिक मंत्रालय को चिट्ठी लिखी की पिता जी की मृत्यु के बाद माँ अस्वस्थ हैं और लखनऊ में उनकी चिकित्सक पत्नी को बिटिया हुई है इस नाते उन्हें यूपी में पोस्टिंग दी जाए। तीन बार उनके आवेदन को कार्मिक मंत्रालय ने वापस कर दिया, क्योंकि आवश्यक सेवा वर्ष अपने मूल कैडर में बिताये बिना अर्जी दी थी। उत्तर प्रदेश के मंत्री शिवपाल यादव ने 2015 में प्रधानमंत्री मोदी को अजय यादव के केस के बारे में चिट्ठी लिखी जिसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से मंत्रालय में चिट्ठी लिखी गयी की अजय यादव की अर्जी पर ध्यान दिया जाए और उनके डेप्युटेशन के मुद्दे को अगली मीटिंग में प्राथमिकता के आधार पर रखा जाए।

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प्रधानमंत्री कार्यालय से कार्मिक मंत्रालय को 26 अगस्त 15 को पत्र लिखा गया और 31 अगस्त को मंत्रालय द्वारा मीटिंग बुलाकर, इसपर विचार करके भी नियमों का हवाला दिया गया और पीएमओ को बताया गया कि ऐसा करना नियमों के आधार पर संभव नहीं है और एसीसी से इस पोस्टिंग पर विचार न करने की सलाह दी गयी, साथ ही यह कहा गया कि आवेदनकर्ता ने जो कारण बताये हैं उनका भी कोई आधार नहीं बनता।

बहुत हुई है ‘यादवीकरण’ की राजनीति!

ज्ञात हो की कार्मिक मंत्रालय के बाद इन अधिकारियों के मामलों में अंतिम निर्णय कैबिनेट कमिटी ऑन अपॉइंटमेंट यानी एसीसी करती है, जिसके मुखिया प्रधानमंत्री होते हैं। इन सबके बावजूद एसीसी ने अजय यादव जी की अर्जी को स्पेशल केस मानते हुए, नियमों में ढील देकर तीन साल का डेप्युटेशन मंजूर कर लिया।

सन 16 की जनवरी में अजय यादव की लखनऊ से सटे हुए जिले बाराबंकी में जिलाधिकारी के रूप में पोस्टिंग भी हो गयी ताकि उनको लखनऊ आने-जाने में भी अधिक समय न लगे। इस स्पेशल केस में सबसे स्पेशल बात यह है की अजय यादव जी शिवपाल यादव के दामाद हैं। उस समय तक तो परिवार में अनबन का ड्रामा या असली खेल भी सामने नहीं आया था। शिवपाल यादव उस सूबे के एक महत्वपूर्ण मंत्री थे, जहाँ भाजपा को अपनी कमर कस कर चुनाव में जाना था और हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे थे। याद ही होगा कि कैसे चुनावी रैलियों में भाजपाई लोग सूबे की मशीनरी के ‘यादवीकरण’ की बात करते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग को आंदोलित कर रहे थे। ऐसे माहौल में भी प्रधानमंत्री खुद नियम के विरुद्ध जाकर एक ‘यादव’ अफसर की अर्जी का निस्तारण कर रहे थे क्योंकि अफसर एक कद्दावर नेता के रिश्तेदार थे, भले ही नेता विपक्षी दल के हों।

इस किस्से को सुनाने का लब्बोलुआब यह है कि इसी को कहते हैं- सबका साथ, सबका विकास। इस नाते जो लोग उदास हैं, उन्हें यह जरूर सोचना चाहिए कि आखिर लखनऊ जाकर जवानी कुर्बान करने से लेकर मुलायम सिंह को बेइज्जत करने का जो जोश था, उसके पीछे की वजह क्या थी?

सच है कि उस समय की भीड़ केवल एक जाति विशेष की न होकर, समाज के उन लोगों की थी जिन्हें हम अखिलेश यादव के फैन कह सकते हैं, समर्थक नहीं। फैन भला-बुरा नहीं सोचता। समर्थक धरातल पर रहते हुए अपने नेता या दल की मजबूती के लिए पसीना बहाता है। उसे पता रहता है कि राजनीति में हार-जीत चलती रहती है और हार आत्मावलोकन का एक मौका लेकर आती है कि उससे कहाँ-कहाँ गलतियाँ हुई हैं।

फैन लोगों को जाने दीजिये क्योंकि अपने हीरो बदलने में देर नहीं लगती, लेकिन समर्थक विपत्ति में भी साथ बैठता है और फिर कैसे उठ खड़े हों इस बारे में सोचता है। जो दुखी हैं क्या उनका दुःख मुलायम या अखिलेश से अधिक है? होली के दिन अखिलेश अपने गाँव में लोगों से होली मिलते दिखे, न भी जाते तो क्या बिगड़ जाता लेकिन फेसबुक पर उसदिन भी तमाम लोग रुदालियाँ गा रहे थे, क्योंकि उनके जीवन में उत्सव की जगह अँधेरा छा गया था। गोया सब कुछ लुट गया हो और आगे भी कुछ न दिख रह हो, क्योंकि उनके अखिलेश चुनाव हार गए। मुलायम सिंह योगी के शपथ ग्रहण में अपने स्वास्थ्य का भी बहाना बना कर अनुपस्थित हो गए रहते, अखिलेश जी भी अपनी कोई समीक्षा बैठक रख लिए होते, क्योंकि योगी जी ने इन लोगों के खिलाफ भी कम आग नहीं उगली है। किसी का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन पिता-पुत्र एक मर्यादा के तहत वहां उपस्थित रहे और मंच पर उनकी भाव भंगिमा भी उन उखड़े हुए लोगों की तरह नहीं थी, जो सियापा फैला रहे हैं।

“यह सपा की नहीं घमंड की हार है”

ये सियापा फैला रहे लोग ही अब इस समय सामाजिक समरसता की बात कर रहे हैं। कुछ ऐसे हैं जो दलितों के साथ भाईचारे की बात कर रहे हैं, ताकि अगले चुनाव में मोदी का मुकाबला किया जा सके। अच्छी बात है लेकिन क्या यह समरसता केवल चुनाव की ही दृष्टि से होनी चाहिए? हमारा जीवन-मरण चुनाव ही है? भाजपा का प्रचंड बहुमत खुद उसके लिए चुनौती है, क्योंकि उम्मीदें और वायदे, दोनों बहुत अधिक हैं, जिन्हें पूरा न कर पाने का कोई बहाना भी नहीं चलेगा। जनता उन्हें फिर चुनाव में देख लेगी, लेकिन जो दंभ घर कर गया था, मित्र उसे दूर करने के लिए यह हार भी जरूरी थी। अगर कुछ बातें कड़वी लिखी गयी हों तो उनके लिए कोई माफ़ीनामा नहीं लिखूंगा, क्योंकि कभी इतने बड़े सूबे के हर इलाके के जमीनी कार्यकर्ताओं को शक्ल और नाम से पहचानने की क्षमता रखने वाले मुलायम सिंह का राजनैतिक-पारिवारिक जो हश्र किया गया उसका मुझे भी दुःख है।

शिवपाल यादव ने सही कहा था की यह सपा की नहीं, घमंड की हार है और मैं अपनी तरफ से उसमें थोड़ा यह भी जोड़ देता हूँ की यह घमंड बाप-चाचा के सम्मान-अपमान के पारिवारिक मसले के अलावा सामाजिक रूप से भी दिख रहा था, जिससे यह धारणा बन गयी थी की यह केवल यादवों की सरकार है जबकि अखिलेश जी की सरकार बनाने में समाज के हर वर्ग का हाथ था। क्या कर लेंगे इस धारणा का क्योंकि राजनीति धारणा और प्रतीकों का ही खेल है। मौका है, विचार करें और खुद को अगली लड़ाई के लिए तैयार करें।

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