यूपी: करते रहें समीक्षा

‘कार्यकर्ता वगैरह कुछ नहीं, आई डोंट बिलीव, जनता वोट करती है, वही मेरी कार्यकर्ता है और उसे मेरे ऊपर भरोसा है’, चुनाव अभियान के दौरान कोई सिटिंग विधायक ऐसा कहने की जुर्रत नहीं कर सकता।

आप सोचते होंगे कि किसी बाहुबली के लिए ऐसा कहना आसान होता होगा तो एकदम नहीं, क्योंकि उनके पास भी कार्यकर्ताओं की चौड़ी फ़ौज होती है और दोनों पक्षों को हमेशा एक-दूसरे की जरूरत होती है। लेकिन आज़मगढ़ की निज़ामाबाद विधानसभा सीट से विधायक आलम बदी में इतनी हिम्मत है की ऐसा टीवी पर कह सकें। आज जब राजनीति रणनीतिकारों की फौज और गाड़ियों के काफिले की मोहताज है तो इस दौर में आलम बदी जैसे विधायक भी हैं। समाजवादी पार्टी के टिकट पर वो इस बार भी जीत गए हैं और यह उनकी चौथी जीत है, लेकिन आप उनको देखेंगे तो विधायक शब्द से आपके भीतर जो भाव आते हैं वो गायब हो जाएंगे।

एक विधायक ऐसा भी- सादगी की मिसाल

78 साल के हैं और उम्र के तकाजे के चलते थोड़ा ऊंचा सुनते हैं और इस नाते बोलते भी ऊंचा हैं, जिसके चलते कुछ लोग मोहब्बत में उनको बहिरू भी बोलते हैं। आप इनको ढूँढने निकलें तो बाजार की किसी चाय के ठीहे पर भी आसानी से मिल सकते हैं और सड़क पर अकेले ही पैदल चलते हुए भी। पहली बार जब सपा के टिकट पर लड़े थे तो पार्टी से जो सहयोग राशि मिली, उसमें से कुछ बच भी गया था, जिसे मुलायम सिंह को वापस दे आए थे। बारहवीं के बाद डिप्लोमा करके जूनियर इंजीनियर बन गए, लेकिन विभाग का सिस्टम नहीं जमा तो नौकरी छोड़ कर बाजार में फर्नीचर की दुकान खोल ली थी कि रोजी-रोटी चलती रहे। राजनीति में आने के बाद भी अहंकार उनसे कोसों दूर है। सरायमीर के पूर्व पंचायत अध्यक्ष ओबैदुर रहमान साहब कहते हैं कि पहले टर्म में ही उन्होंने अपने क्षेत्र के दुर्वासा और दत्तात्रेय धाम में विशाल विश्राम गृह बनवाया। क्षेत्र के लोगों में उनके जाति-धर्म की जगह उनके स्वभाव से प्यार है।

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लीक से हटकर विधायक है आलम बदी

इलाके में योगी आदित्यनाथ से आशीर्वाद प्राप्त हिन्दू युवा वाहिनी सक्रिय है। एक बार वाहिनी ने शहर में अतिक्रमण के खिलाफ धरना दिया तो विधायक जी भी उनके बीच जा कर शामिल हो गए। वो किसी के लिए फालतू की सिफारिश भी नहीं करते, जिसके चलते लोग नाराज भी रहते हैं लेकिन यह नाराजगी अलग ढंग की है। उनके इलाके में ठेकेदार लोग काम करने से भी डरते हैं, क्योंकि पुराने इंजीनियर होने के नाते ये खुद एस्टीमेट तैयार करवाते हैं और काम में हीला-हवाली नहीं चलने देते, क्योंकि कमीशन का कोई चस्का ही नहीं है।

बिना केजरीवाल जैसा दिखे वो सादगी की मिसाल हैं, क्योंकि सत्र के समय लखनऊ में भी इनके पास गाड़ी नहीं होती। विधायक बनने पर दो गनर मिले तो नियम का हवाला दिए जाने पर एक को रखने के लिए किसी तरह राजी हुए यह कहते हुए कि उन्हें किसी से कोई खतरा नहीं है। अंग्रेजी कायदे से आती है, लेकिन फोन रखते हैं एकदम साधारण वाला। बिना इंटरनेट के, बटन वाला यानि उनको लगातार अपडेट रहने की भी फ़िक्र नहीं। अब ऐसे नेता को क्या जरूरत कार्यकर्ताओं के हुजूम की? जनता वोट करेगी ही और इस चुनाव में भी इनका निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा प्रत्याशी बीस हजार वोट पीछे रहा, जबकि इनका बैनर पोस्टर पर भी कोई जोर नहीं होता और जितना खर्च आजकल छात्र संघ चुनावों में होता है, उससे कम में ये जीत जाते हैं। हां, निजामाबाद कोई मुस्लिम बहुसंख्यक सीट भी नहीं है। हां, भाजपा को भी लगभग 43 हजार वोट मिले।

‘यूपी के मुस्लिम बहुल इलाकों में बीजेपी को पड़े जमकर वोट’, इस बात में है कितना दम ?

अब थोड़ी बात उस भ्रम की कि मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिया है। सूबे में मात्र सात विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुसलमान वोटर पचास प्रतिशत से अधिक हैं और इन सभी सीटों से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार जीते हैं। अगर आपका इंटरनेट चल रहा हो और उसका इस्तेमाल करना जानते हों तो आप जनगणना और चुनाव आयोग के आकंड़ों के आधार पर इसको जांच सकते हैं।

जिस देवबंद की सीट को कुछ लोगों ने मुद्दा बनाया उस विधानसभा में मुसलमान मतदाता 35 प्रतिशत भी नहीं हैं और 2016 के उपचुनाव में ही एक मुसलमान प्रत्याशी की जीत हुई थी और उसके पहले सत्तर के दशक में। तमाम फतवों और मुजफ्फरनगर-अख़लाक़ के बावजूद बसपा के खाते में इस कौम के अधिक वोट नहीं जा पाए तो वह मायावती का नए ढंग का ब्राह्मणवाद है।

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पूर्वी यूपी में मौलाना आमिर रशादी कौम के बीच काफी सम्मानित नाम हैं। इनके चलते बसपा को इलाके में वोट मिले ही हैं कोई दो राय नहीं और हो सकता है कि इनके जैसे कुछ कारकों के चलते ही बसपा का मत प्रतिशत सपा से अधिक है, क्योंकि हरिजन मत भी यादवों से अधिक हैं, अगर केवल जाति की बात की जाय तो। बसपा की इकलौती प्रचारक मायावती इलाके में रैली करने भी आईं, लेकिन जिस परम्परा को वो गाली देती रही हैं उसमें तो बहुत कुछ बदल गया है लेकिन मायावती जी बदलने वाली नहीं। जब मुख्तार अंसारी के बड़े भाई लोग यानि सिबगतुल्लाह और अफजाल उनके घर गए थे तो नंगे पैर उनकी तस्वीरें बाहर आई थीं। बहन जी ने सफाई दी थी की अपने घर में वो खुद बाहर के चप्पल लेकर नहीं आतीं इस नाते अंसारी बंधुओं के नंगे पैर होने की बात चल गई, लेकिन बहन जी ने रानी की सराय की रैली में क्या दिखाया ? मंच पर केवल उन्हीं के लिए सोफा लगा था और रैली में टोपी लगा कर आई भीड़ अपने मौलाना को देख रही थी, जिनकी आवाज़ पर बहुत बड़ी तादाद में लोग इकट्ठे हो जाते हैं।

जहां मुस्लिम मतदाता 30% से अधिक, वहां सपा-बसपा का वोट शेयर भाजपा से ज्यादा

इधर के ही इलाके में सूबे में जीतने वाले सबसे अमीर प्रत्याशियों में पहले नंबर पर बसपा के शाह आलम उर्फ़ “गुड्डू जमाली” हैं। हलफनामे के मुताबिक़ सौ करोड़ से अधिक के असामी, सपा के कैंडिडेट से हांफते हुए जीते। आठ सौ से भी कम वोट के मार्जिन से। हां, यह भी याद रहे कि आलम बदी का सीधा मुकाबला बसपा के हिन्दू प्रत्याशी से था और गुड्डू जमाली के मुकाबले सपा का हिन्दू प्रत्याशी था। साफ़ है इन दोनों जीते हुए प्रत्याशियों को केवल उनकी बिरादरी का ही वोट नहीं मिला है। याद रखने लायक बात यह भी है कि उन 82 सीटों पर जहां मुस्लिम मतदाता 30% से अधिक हैं, सपा-बसपा का वोट शेयर भाजपा से अधिक है। मुसलमान क्यों भाजपा को वोट करेगा भाई ? उसने तो पूरी ईमानदारी से उन्ही पार्टियों को वोट दिया है, जिन्हें करता रहा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर और दादरी यदि अखिलेश सरकार की विफलता थी, तो उन दोनों स्थानों पर भाजपा से जुड़े लोगों की सक्रियता किसी से छुपी नहीं। दोनों जगहों पर जो आरोपी थे उनका भगवा सम्मान होते मुसलमानों ने देखा है। मुस्लिम युवतियों के बारे में जो चल रहा है की व्हाट्सअप पर ग्रुप बना कर तीन तलाक के मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में थीं तो उन युवतियों ने व्हाट्सअप पर ही फ्रिज में गोश्त चेक कर मार दिए जाने की खबरें भी देखी ही होंगी। लखनऊ में शिया बिरादरी के कुछ वोट अटल जी के जमाने से ही भाजपा को जाते रहे हैं। इसके अलावा इक्के-दुक्के अपवाद ही होंगे, क्योंकि भाजपा को पता है की उसे वोट नहीं मिलने। इस नाते उसने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया, जबकि अल्पसंख्यक मोर्चे का भी पूरा ढांचा है और इस मोर्चे के सदस्यों को बड़ा तबका कौम का गद्दार मानता है। कुछ उसी शिद्दत से जैसे जफ़र सरेशवाला और केन्द्रीय मंत्री अकबर साहब को तमाम लोग सरकारी मुसलमान कहते हैं।

अखिलेश बाबू को अपनों ने ही ले डूबाने में नहीं छोड़ी कोई कसर!

जो लोग बिहार के चुनावों को याद रखते हैं उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि आज़म खान जैसे नेता भी मंच से कह चुके हैं की अगर हमसे नाराजगी है तो बसपा को वोट देने की जगह भाजपा को दे देना। ऐसा बयान उन्होंने तब दिया था जब एक सभास्थल के पास उन्हें कुछ घरों पर बसपा के झंडे दिखे थे। ऐसे बयानों का भी बड़ा असर होता है। इसके उलट याद करिए मोदी के रोड शो के दिन काशी विश्वनाथ मंदिर की तरफ जाने वाली गली के बाहर मस्जिद पर लगा ‘साथ पसंद है’ वाला पोस्टर या कालभैरव दर्शन के समय सड़क पर सपा के झंडे लहराते कार्यकर्ता। इन सबपर भाजपा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। आज़म खान भले सपरिवार जीत गए हों, लेकिन उन जैसे नेताओं ने भी सपा के खिलाफ माहौल बनाने में काफी मदद की, जबकि अपनी कौम का कितना भला किया वह वही जानें।

काम बोलता है- सच में ‘काम बोलता है’ तभी तो…

सच्चर कमेटी की रपट मुसलमानों की बड़ी आबादी को दलितों-आदिवासियों से भी बुरी गत में रखती है तो उसके दोषी कौम के वो लीडरान भी हैं, जो गम में खाते हैं डिनर हुक्काम के साथ। चाहे कृषि विकास दर की बात हो या औद्योगिक विकास दर की, दोनों मामलों में अखिलेश सरकार के आंकड़े मायावती के कार्यकाल से भी काफी नीचे रहे। मुलायम सरकार के पास पहुंच भी न सके। यूपीए सरकार के समय केंद्र की योजना के तहत मिलने वाली फंडिंग से एम्बुलेंसों को भले ही समाजवादी रंग में रंग दिया गया रहा हो, लेकिन याद करिए सोनिया जी का बनारस में रोड शो। उस दौरान जब उनकी तबीयत खराब हुई तो साथ में प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने जो एम्बुलेंस लगा रखी थी उसमें ब्लड प्रेशर नापने की मशीन भी नहीं थी, जो झोला छाप डाक्टरों के पास भी जरूर होती है। यह अलग बात है कि जितने की आती है उससे अधिक का डीजल उस गाड़ी में खर्च हो गया होगा। इतने ऊंचे कद के वीआईपी के साथ इतनी लापरवाही, तो आम जनता के साथ क्या हो रहा होगा वह काम बोलता है वाले पोस्टरों से नहीं पता चल सकता।

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खैर इन सब मुद्दों पर फिर कभी। शिवपाल यादव और अखिलेश जी कह चुके हैं की समीक्षा होगी लेकिन होली में अपनी तरफ आने पर एक समीक्षा बैठक में मैं भी था, जहाँ बचपन के मित्र जमे हुए थे।

ईवीएम का बवाल, भाजपा की नीयत पर खड़े किए सवाल

बचपन उस मोहल्ले में बीता था जहाँ दोनों समुदायों की मिश्रित आबादी थी। हां हिन्दुओं के घरों में मुसलमानों के लिए बर्तन जरूर अलग होते थे, लेकिन तब हवा में उस तरह की कटुता नहीं थी जो अब है। अगर आप इस बात को नकारते हैं, तो रेत में मुंह छिपाते हैं। एक मित्र अपनी बिटिया के निकाह का कार्ड लेकर ठीहे पर आये थे और मेरे अलावा केवल दो ऐसे थे, जो मुसलमान नहीं थे। उनमें एक सज्जन यादव जी हैं, स्पोर्ट्स की फील्ड से हैं इसलिए उनकी काफी इज्जत है, क्योंकि खिलाड़ियों की चयन में केवल योग्यता देखते हैं। ऊंच-नीच थोड़ा बहुत ही करते हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तो इतना भी नहीं कि पूरे गांव को स्टेट टीम में सेलेक्ट कर दें। बात मायावती के ईवीएम से छेड़छाड़ वाले मुद्दे से ही शुरू हुई और सब एक साथ शंका व्यक्त करने लगे कि जांच होनी ही चाहिए। इत्मिनान से सब पार्टी वाले इस मुद्दे पर मीटिंग करें यह सबका मामला है।

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इतने में वहां एक सज्जन को सब्जी का थैला पकड़ाने आये मौर्या ने कहा की भइया स्वामी परसाद मौर्या केवल तीन सीट ही तो मांग रहे थे बहिन जी से। एक खुद की और अपने बेटे-बेटी की लेकिन उनको नहीं दिया। उस आदमी को नहीं दिया जो यूपी में बसपा को जमाए। सपाइयों की गाली सुनते हुए डटा रहा, क्योंकि बहिन जी तो खाली बंगला के भीतर बैठी रहती हैं। जो नेता विपक्ष रहा माने मंत्री का दर्ज़ा वाला। चुनाव के बखत पार्टी में घुसने वाले मुख्तार के परिवार को तीन सीट दे दिया। यह अन्याय नहीं है तो क्या है? बना लें सरकार खाली मियां और चमार के वोट से। काहे हम लोग वोट दें बहिन जी को। मैंने पूछा की तुम्हे कैसे पता की स्वामी तीन सीट मांग रहे थे तो जवाब मिला ‘हम लोगों’ के ग्रुप में व्हाट्सअप से और पोखरा वाली मीटिंग में ‘समाज’ के लोगों ने भी बताया था। अब समझिये टेक्नोलॉजी का दखल। ये मौर्या बीए पास हैं और जियो वाला फोन रखते हैं, लेकिन जिनके पास यह सुविधा नहीं है उनके लिए ‘पोखरे वाली मीटिंग’ है ही। जिस बात पर मीडिया में बड़े विश्लेषक चर्चा भी नहीं करते थे, सोशल मीडिया पर एक बड़े चिन्तक बहिन जी को आने दो वाला कैम्पेन चलाते हुए सवर्णों के खिलाफ जहर उगल रहे थे। उन्हें इस जमीनी हकीकत की भनक भी न लगी? ऐसे में श्मसान और कब्रिस्तान वाले बयान कितने प्रेरक होते होंगे समझने की कोशिश की जाए, क्योंकि बात विकास से बहुत आगे की है।

बबुआ इ कमाल है सोशल इंजीनियरिंग का!

मौर्या की बात सुनते ही यादव जी के अंदर का पुराना संघी जाग गया और बोले की यही है संघ की असल सोशल इंजीनियरिंग, क्योंकि मोदी और शाह की टीम काफी समय से गांव-गांव में हवा का रुख सूंघ रही थी और सपाई खाली चौड़ी गाड़ी में घूमने और दलाली करने में ही व्यस्त थे। अरे भाई आप लोग काहे भूलते हैं कि कभी हमारे मैदान में ही शाखा लगती थी। ये हम लोग मुलायम सिंह के साथ साइकिल पर चढ़ गए, लेकिन भाई संघ का जो काम करने का तरीका है, वह वाकई गजब है। अब अखिलेश के बस का नहीं है उसका तोड़ निकालना।

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परवेज मुझे याद दिलाने लगे कि कैसे हम सब भी बचपन में उधर खेलने जाते थे, तो अपन सब भी खो-खो, कबड्डी खेलने से लेकर व्यायाम तक किया करते थे। डंडा भी घुमाते थे, लेकिन झंडा के सामने खड़ा होकर संस्कृत नहीं बोल पाते थे। यादव जी ने याद दिलाया की संस्कृत का मन्त्र नहीं, वह राष्ट्र की वंदना होती है-नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि और इसमें गलत कुछ भी नहीं है, आखिर सैनिक राष्ट्र के लिए शहादत देते हैं। वीर अब्दुल हमीद राष्ट्र के लिए ही शहीद हुए थे, उस राष्ट्र की प्रार्थना गलत कैसे हुई थी। यह सब चुपचाप सुन रहे सुहैल भाई बोल पड़े इसका मतलब अब यादव जी के परिवार की गाड़ियों से सपा का झंडा उतर जाएगा और फूल छाप झंडा लग जाएगा? मुझे पिछले चुनाव का वह दिन याद आता है जब एकाएक नीले झंडे उतर गए और उन गाड़ियों में सपा पदाधिकारियों से पहले ही साइकिल लहराने लगी थी और पूरे पांच साल लहराती रही।

तो क्या अब आ गए हैं अन्य पार्टियों के बुरे दिन?

करते रहें विश्लेषक लोग चुनाव की समीक्षा और फिर अगले चुनाव की तैयारी। इन सबके बीच सुहैल भाई अपने मोहल्ले और बिरादरी के एक लड़के की बात करने लगे जो इन्डियन इंजीनियरिंग सर्विसेज में सेलेक्ट होकर परिवार की किस्मत बदल चुका है। मदरसा चलाने वाले मौलाना जी के नाती पोतों के कान्वेंट स्कूल में पढ़ने की बात पर तफरीह ली जाने लगी और मौलाना ने अगले सन्डे की पार्टी का जिक्र किया जो इस इस नाते टाल दी गई कि बिरयानी के मास्टर जावेद भाई अपनी बिटिया की शादी में व्यस्त रहेंगे। इस नाते अपन लोग इस हफ्ते वाली पार्टी टाल कर उनके बंगले पर ही घूम आएंगे। हां, चर्चा उस व्हाट्सअप मैसेज की भी हुई, जिसमें चौबीस हजार हफ्ते की निकासी वाली बंदिश पर असलम गुस्सा था, लेकिन उसे जब पता चला की हर हफ्ते इतनी निकासी के लिए महीने में एक लाख से अधिक कमाना पड़ेगा। तब वह वापस पंचर बनाने चला गया था। आखिर इस तरह के मैसेज असलम की कम उन हुक्मरानों की अधिक बेइज्जती करते हैं, जिनकी जिम्मेदारी रहती है कि असल में सबकी तरक्की हो, सब आगे बढ़ें और किसी को भी जिल्लत-जहालत की जिन्दगी न जीनी पड़े। सलमा के कमल का फूल दबा देने की बात भी यादव जी ने उछाली तो लोगों की आवाज़ कुछ ऊंची होने लगी और जुबैर ने अपने मोबाइल में इमरान प्रतापगढ़ी को थोड़ा ऊंचे वाल्यूम में लगा दिया, जहां वो एक सपाई मंत्री के मुशायरे में उस इलाके की सड़कों की तारीफ करते हुए बोल रहे थे कि सड़क की हालत देख लगता है कि यह अंतिम यात्रा न हो जाए। यह अलग बात है की मंत्री जी की फार्चूनर उन्हीं गड्ढों से होते हुए उनके दरवाज़े जाती रही है। काम तो बोलता ही है। चुनाव से कुछ वक्त पहले हुए इस सपाई मुशायरे में मुख्तार के भाई भी बाइज्जत उपस्थित थे, क्योंकि इलाके में मुसलमानों के काफी बड़े-बड़े गांव हैं। वही भाई जिनको लखनऊ बुलाने के बाद भी सपा ने केवल इमेज बनाने के लिए इस्तेमाल किया, क्योंकि शामिल करने के बाद बाहर कर दिया गया था। अब इन सब हालातों के बाद भी कौम के वोट मिले तो बड़ी बात नहीं है, क्योंकि आखिर आम मुसलमान  मतदाता जाए तो किधर। यह अलग बात है की मुशायरा करवाने वाले, इलाके की तीसों साल से ‘सेवा’ कर रहे कद्दावर मंत्री तीसरे स्थान पर रहे। उनसे अच्छा बसपा का नया प्रत्याशी लड़ा। इस नाते भी मशीन में गड़बड़ी की बात मायावती कहती हैं तो उन्हें अभी और बुरे दिन देखने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि वो जमीनी हकीकत समझने के लिए तैयार नहीं।

बात केवल पंचर बनाने वाले असलम की ही नहीं है। नून तेल लकड़ी के चंगुल में फंसे उस आम भारत की है जिसमें पांच सौ रुपए महीने की पेंशन या पांच रुपया किलो चावल बांट देने को उपलब्धि बता कर पोस्टर छाप दिए जाते हैं। करते रहिए समीक्षा और देखते हैं कि उत्तर प्रदेश में हज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय किसके पास आता है। वैसे आज़म खान प्रयाग कुम्भ के प्रभारी रहते हुए बहुत बेहतरीन काम दिखा चुके हैं और उनके कार्यकाल का महाकुम्भ उसके बाद होने वाले नासिक या उज्जैन की अपेक्षा काफी सफल था। भीड़ और सरकारी व्यवस्था, दोनों मामले में इस नाते कोई हिन्दू भी यह मंत्रालय संभाले तो गलत नहीं होगा, क्योंकि संविधान में इसकी मनाही नहीं है फिर भी भाजपा के पास तमाम सरकारी मुसलमान तो हइय्ये हैं।

सपा की हार की समीक्षा में चाचा-भतीजा साथ!

वर्ना हल्ला तो है ही की पूरब में पीस पार्टी वाले डॉ. अयूब योगी आदित्य नाथ के चेला हैं। जैसे पश्चिम में मौलाना रज़ा संतोष गंगवार के आदमी हैं। बाकी हिन्दू कम हैं क्या कि भाजपा को मुसलमानों के वोट की जरूरत पड़ेगी, ध्यान रहे कि इस लहर में भी अभी भाजपा को चालीस प्रतिशत के करीब ही वोट मिला है। अभी देखते हैं कि हारे हुए लोग किस तरह की समीक्षा करते हैं, उसमें भी कांग्रेस से अधिक आशा रखना अभी ठीक नहीं है। बसपा में भी किसी की जिम्मेदारी नहीं होती, क्योंकि लोकसभा उसे, मायावती के शब्दों में कहें तो मुसलमानों की गद्दारी ने हराया था और यह वाला चुनाव मशीन ने।

हां, सपा क्या कर रही है और आगे उसका आगे क्या कदम होगा यह जरूर देखने वाली बात होगी लेकिन उसमें भी एक दिक्कत है कि अभी साफ़ होना बाकी है कि अखिलेश जी अपने वायदे के अनुसार कुछ महीने के लिए ही नियंत्रण रख कर फिर मुलायम सिंह को वापस करते हैं और यूपी की कमान भी शिवपाल के पास आती है या फिर अभी भी उन्ही लोगों का राज रहेगा जिन्होंने अखिलेश को भी पोस्टरबाजी में फंसा करके जमीनी हकीकत से दूर कर दिया। कई सीटें ऐसी हैं, जहां सपा की हार बहुत ही कम मतों के अंतर से हुई है और यदि मुलायम और शिवपाल प्रचार के लिए निकले रहते तो उन सीटों का परिणाम बदल भी सकता था। आप कितने भी कसीदें गढ़ें लेकिन लखनऊ में जवानी कुर्बान करने के लिए जुटी भीड़ बूथ मैनेजमेंट से पहले ही, अपने गांव-गिरांव-चट्टी चौराहों से कट चुकी थी, क्योंकि उसमें अधिकांश एसी गाड़ियों वाले और महंगे जूते वाले ही थे, जिन्हें धूल से एलर्जी होने लगती है।

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