योग

 विश्व योग दिवस के कुछ ही दिन पहले बाबा रामदेव की एक सलाह आई थी कि लोगों को दाल में ढेर सारा पानी मिला कर खाना चाहिए क्योंकि गाढ़ी दाल नुकसान करती है, यह सलाह कुछ महीने पहले वाली राय से बेहतर थी क्योंकि तब उन्होंने दाल खाना ही सेहत के लिए नुकसानदायक बताया था।

उन्होंने बताया था कि दाल खाने से यूरिक एसिड बढ़ जाता है जिससे जोड़ों के दर्द की समस्या होती है और जोड़ों के दर्द की समस्या हमारे देश में महामारी का रूप लेती जा रही है। सबको पता है कि देश में अभी तक दाल ही सबसे सस्ते प्रोटीन के रूप में आम लोगों की थाली को पूर्ण करती रही है लेकिन योग को एलीट क्लास की पकड़ से निकाल कर जनता के बीच सड़क पर ला देने वाले बाबा के लिए ऐसे बयान देना भी बहुत जरूरी है क्योंकि सरकार उनके साथ है और वो सरकार के साथ, तो जब भी मित्रों पर कोई संकट आये तो साथ खड़े रहना भी बहुत बड़ा योग है, यानी सरकारी योग का मामला है। इस पर हम अभी आगे बात करेंगे।

मोदी सरकार के आने के बाद से तमाम बातों पर नए सिरे चर्चा चल रही है जिनमें योग भी है, खासकर यूएन द्वारा विश्व योग दिवस की स्वीकृति के बाद से दुनिया भर के देशों में हो रहे योग कार्यक्रमों की चर्चा के बीच तमाम लोग योग की अनिवार्यता से लेकर उसके उपहास तक पर नए-नए शोध कर रहे हैं। यह भी सच है कि दुनिया में योग न तो रामदेव ने फैलाया न ही नरेंद्र मोदी ने फिर भी एक बात है कि अगर इंदिरा गांधी के समय ही विश्व योग दिवस घोषित हो गया रहता तो आजतक उसे भी हम भूल चुके ही रहते जैसे तमाम यूएन डे हैं लेकिन जानता कौन है? सब के सब औपचारिकता बन कर रह गए हैं लेकिन अभी जिस दौर में हम जी रहे हैं उसमें मीडिया और सोशल मीडिया के प्रकोप से दो दिन पहले से लेकर एक दिन बाद तक माहौल योगमय बन गया और तमाम सारी बातें नेपथ्य में चली गयीं।

इसी बहाने सरकार और रामदेव के विरोधी लोग काफी मेहनत से यह बताते रहे कि असल योग क्या है, उसका श्रेय किसे दिया जाना चाहिए और जिस तरह पंडित नेहरू शीर्षासन सहजता से कर सकते थे वैसे मोदी या उनका कोई मंत्री कर सकता है की नहीं? कुल मिला कर माहौल बहुत ही रोचक बना रहा।

विश्वयोग दिवस के दिन संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के कार्यक्रम में दुनिया की सबसे उम्रदराज योग शिक्षिका ताओ पोर्चेन लिंच भी उपस्थित थीं जो 97 साल की उम्र में अभी भी अमेरिका में हर हफ्ते योग की क्लास लेती हैं, अब भारतीय योग के बाबा रामदेव युग में उनका नाम देश में कौन जानता है? जबकि उनका जन्म पांडिचेरी में हुआ था और योग की तरफ उनका झुकाव महर्षि अरविन्द के संपर्क में आने से हुआ, बाद में वो महान योग गुरु आयंगर के संपर्क में आईं और पूरा जीवन योग के प्रशिक्षण को समर्पित कर दिया।

इस बीच में वो यूरोप की टॉप मॉडल भी रहीं और हॉलीवुड की मशहूर प्रोडक्शन कंपनी एमजीएम की हिरोइन के रूप में तमाम फिल्मों में भी आयीं। एक चकाचौंध भरी जिंदगी जी लेने के बाद उन्होंने अमेरिका में अपने योग स्टूडियो शुरू किये जो एलीट क्लास में काफी लोकप्रिय हुए।

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योग शिक्षिका ताओ पोर्चेन लिंच newsgram

इनसे भी पहले एक रूसी युवती को कहीं से योग की भनक लग गयी जो भारत आकर योग गुरु थिरुमलाई कृष्णमाचार्य की शिष्या बनीं और नाम इंदिरा देवी रख लिया, उन्होंने 1939 में चीन में पहला योग केंद्र शुरू किया। योग दिवस के दिन चीन की समाचार एजेंसी लगातार देश से योग कार्यक्रमों की अपडेट दे रही थी जिसका सच यही है कि इस भारतीय पद्धति का ज्ञान चीन को भी काफी पहले से ही था न कि केवल दो सालों में ही वहां इतनी बड़ी क्रांति हो गयी।

कुछ समय बाद इंदिरा देवी ने चीन छोड़ दिया था और 1948 में उन्होंने हॉलीवुड में अपना पहला योग स्टूडियो शुरू किया जहाँ बड़े-बड़े स्टार नियमित रूप से आने लगे, इंदिरा देवी को किसी अन्य संबोधन की जगह लोग ‘माता जी’ कहा करते थे। तो उन्होंने वहां एलीट क्लास को योग से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभायी।

Indra Devi

इंदिरा देवी intoday

स्वामी विवेकानंद के योग और वेदांत पर दिए गए भाषणों से लेकर स्वामी शिवानन्द, परमहंस योगानंद या आयंगर रहे हों या स्वामी रामा, तमाम लोगों ने पश्चिम की दुनिया में योग के प्रसार में काफी श्रम किया और उन्हें सफलता भी मिली लेकिन कुल मिलाकर उनके प्रयास जन सामान्य से अधिक विशिष्ट वर्ग तक के ही बीच सीमित रहे क्योंकि उन लोगों ने कड़ाई से पतंजलि के अष्टांगिक योग के साथ कमोबेस अपने को जोड़े रखा जहाँ आसन एवं प्राणायाम योग के आठ भागों में से केवल दो भाग हैं न की यही सम्पूर्ण योग है, जैसा अब हो रहा है। उन योगियों के बंधन के चलते योग जन-जन के बीच नहीं आ पाया जैसा अब है लेकिन अभी भी जिस वर्ग के लिए खाद्य सुरक्षा योजना और प्रधानमन्त्री जनधन योजना चल रही है, उसे योग की आवश्यकता नहीं है क्योंकि पेट भरा रहेगा और आत्मा तृप्त रहेगी तब उसके बाद की कड़ी में पेट खाली करने के उपाय और मन को शांत रखने के प्राणायाम किये जा सकते हैं, बाकी हाड़तोड़ कसरत तो वह वर्ग दिन भर करता है इस नाते उसे चैन की नींद भी आ ही जाती है।

योगियों से इतर बात करें तो परमहंस योगानंद के भाई से योग सीख कर बिक्रम चौधरी अमेरिका गए तो उन्होंने योग की अवधारण ही बदल दी। जहाँ योग प्रशिक्षक काफी संयमित और मितव्ययी जीवन वाला होगा। बिक्रम के योग स्टूडियो अमेरिका में लोकप्रिय होने लगे और एक ऐसा योग गुरु उभरा जिसे महंगी गाड़ियों और कीमती घड़ियों का शौक था, जिसने तमाम आसनों का पेटेंट कराने की कोशिश भी की जिन्हें वो कुशलता से कर लेता था, यह अलग बात है कि पेटेंट की बात वहां खारिज हो गयी क्योंकि अमेरिकी अदालतों को भी पता था कि यह प्राचीन क्रिया है न की किसी बिक्रम द्वारा खोजी गयी है।

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बिक्रम चौधरी yogajournal

रामदेव जी ने योग को एक पवित्र घेरे से बाहर निकाल कर मध्यवर्ग तक पहुंचाया है, इसमें कोई दो राय नहीं और भारत माता की जय न बोलने वालों के गर्दन काट लेने से दुबई में ॐ और सूर्यनमस्कार को योग से बाहर रखने की बात तक के उनके परिवर्तन को लोग एक व्यापारिक समझ बता रहे हैं, मतलब योग का जो व्यापार पिछली सदी में पश्चिमी देशों में फ़ैल चुका था उसको भारत में सफलता पूर्वक जमा देने में बाबा का कोई जवाब नहीं।

आप अपने अगल बगल देखेंगे तो खुद पायेंगे की जब दस एक साल पहले टीवी पर बाबा को देख बड़े शहरों के पार्कों में कुछ महिलायें योग के लिए जुटती थीं तो लोग मजाक उड़ाते थे कि काम धाम नहीं है और बेशर्मों की तरह टांग ऊपर करके पता नहीं क्या कर रही हैं।

अब देखिये सुबह हर जगह लोग योग करते दिख रहे हैं, अब भले ही बाबा बड़े व्यापारी हो गए हों लेकिन उन्होंने योग को एलीट वर्ग के दायरे से बाहर करके जन सामान्य के बीच पहुंचाया ही, इसमें कोई दो राय नहीं। जहाँ तक व्यापार का मामला है तो तमाम बाबा लोग इस धंधे में हैं जिनके अनुयायी अपने आश्रमों के छोटे मोटे प्रोडक्ट बहुत ही श्रद्धा से खरीदते हैं, चाहे सिनेमा बनाने वाले बाबा राम रहीम हों या बाबा रविशंकर।

रामदेव प्रोडक्ट की बढ़त से रविशंकर के यहाँ तो आजकल दस परसेंट की छूट भी मिल रही है। वो अलग मुद्दा है, यह बात दूसरी है कि बिजनेस अखबार मिंट की रपट के मुताबिक़ नोर के लिए नूडल बनाने वाली कंपनी अब पतंजलि नूडल बना रही है और एक राजस्थान के कांग्रेसी नेता भी बाबा के सप्लायर हैं, किसी और के लिए बिस्कुट बनाने वाली कंपनी अब बाबा के लिए बना रही है। इसमें भी कुछ गलत बात नहीं है क्योंकि ऋषि पतंजलि ने सौन्दर्य प्रसाधनों से लेकर नूडल तक के नुस्खे कभी नहीं बताये, न सब एक ही जगह बन भी सकते हैं।

बाजार विज्ञापनों पर टिका है, आक्रामक मार्केटिंग के जरिये कब्ज़ा किया जाता है और बाबा का इस मामले में आगे हैं। बाकी उपभोक्ताओं की अपनी समझ और प्रोडक्ट की अपनी क्वालिटी का मामला है। राज्य सरकारों से लेकर केंद्र तक बाबा पर फ़िदा है और बाबा ने पूंजीवादी सिस्टम में यह जता दिया है कि बाजार में कैसे कब्ज़ा किया जाता है, वह दूसरा योग है। लेकिन क्या बाबा पहले योगी हैं जिनपर भारत सरकार मेहरबान है? हालांकि कोई बहुत बड़ा लाभ सरकार ने दिया हो ऐसा दिखता नहीं। भारत सरकार पहले भी एक योगी पर बहुत ही मेहरबान रही है जिसकी उदारता के आगे अभी यह सरकार कहीं नहीं है। इसपर आगे बात करेंगे, पहले योग। 

पिछले साल घर में मुझे एक चिट्ठी मिली जो ग्रेजुएशन के बाद एक मित्र ने लिखी थी, काफी सहेज कर रखी हुई चिट्ठी। हॉस्टल में एक मित्र थे जिनके बारे में लोग कहते थे कि डीएम का बेटा होने के नाते उनके कुछ विशेष नखरे हुआ करते थे, वह उम्र भी ऐसी होती है ‘जब जानता नहीं कि मैं कौन हूँ?’ वाला माहौल रहता है। मित्र यादव हैं, इस नाते यह लिखने में हिचक नहीं है कि कुछ ऐसे भी सीनियर थे जिनके पास अपने जातीय स्वाभिमान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था लेकिन वही काफी था उनके पास मुझे अपने मित्र के प्रति भड़काने के लिए। मित्र एक बार छुट्टियों में घर गए तो वापसी में उनके स्वभाव में आमूलचूल बदलाव हो चुका था। उनके पिताजी की पोस्टिंग मुंगेर के जिलाधिकारी के रूप में हुई और मित्र को बिहार स्कूल ऑफ़ योग जाने का अवसर मिला।

वापसी पर हमेशा मुंडन करवा कर रहने लगे, भोजन में केवल हल्दी और नमक का प्रयोग। एकदम शांत स्वभाव के, सहज और हमेशा प्रसन्न दिखने वाले हो गए। उनकी कोशिश रहती कि अपने मित्रों को भी योग सिखलाएँ, रामदेव तब सीन में कहीं नहीं थे और हम लोग अपने मित्र को गुरूजी बोलना शुरू कर दिए। कैम्पस से निकलने के बाद साथ के अधिकांश लड़के दिल्ली में मुखर्जी नगर आ गए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए। उन्ही दिनों मैं भी होली के समय दिल्ली था और स्वाभाविक रूप से त्यौहार के दिन मित्रों के बीच पहुँच गया। थोड़ी बहुत होली भी हुई लेकिन गुरूजी अपने कमरे से बाहर नहीं निकले। किसी के कमरे में त्यौहारी भोजन बना, मुझे जिम्मेदारी दी गयी गुरु को बुलाने की। उन्होंने बंद दरवाजे के पीछे से कहा की उनका भोजन हो गया है फिर भी मेरे आग्रह पर बाहर आ गए। अभी वो कुर्सी खींच कर बैठने ही जा रहे थे कि किसी ने उनके ऊपर थोड़ी अबीर डाल दी। फिर क्या था, गुरु रौद्र रूप में आ गए और माहौल काफी गरम हो गया। क्रोधित होकर वो अपने कमरे में घुस गए। कैसेले मन से मैं भोजन करके वहां से वापस लौटा, स्वाभाविक था मन में उनके प्रति जो पहला भाव आया वह यही था कि साला योगी बनता है, थोड़े से अबीर से ही इतना उग्र होने की क्या बात थी, अब कभी सम्पर्क नहीं रखेंगे, मुझे क्या जरूरत है।

कुछ ही दिनों बाद घर पर एक लिफाफा आता है, प्रेषक के नाम की जगह मित्र का ही नाम था। सोचा की कुछ लिखा होगा उल्टा सीधा, खोल कर जो पढ़ा तो वह चिट्ठी आज तक मेरे पास पड़ी हुई है। अंग्रेजी में लिखे दो पेज, शुरुआत इस बात से की ‘मैं खुद पर शर्मिंदा हूँ कि तुम लोग मुझे योगी और गुरु जी कहते हो और मैं खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाया और होली के दिन अनुचित व्यवहार कर बैठा, मुझे माफ़ कर देना, मैं अभी आत्मसंयम करना पूरी तरह सीख नहीं पाया हूँ, जो एक योगी के लिए पहली शर्त होनी चाहिए’।  इस प्रसंग की चर्चा केवल इसलिए की आप यह भाषा देखिये और आज कल योगी या योगाचार्य के भेष में घूम रहे लोगों की भाषा, बड़बोलापन, उतावलापन और उग्रता देखिये। सोचिये की उनके योग में और मुंगेर वाले योग से पूर्णतया दीक्षित योगी में कितना अंतर है?

कुछ साल पहले एक विदेशी अखबार में तुर्की के एक योगी के बारे में खबर दिखी कि पंचानबे साल की उम्र में भी पूरी तरह फिट हैं, पचास साल के व्यक्ति की तरह लम्बी ड्राइविंग से लेकर देर तक तैराकी भी कर सकते हैं और नियमित योग की क्लास लेते हैं। इंटरव्यू देने वाले को गर्व से बता भी रहे हैं कि वो योग के चलते ही इतने फिट हैं और इस उम्र में भी आराम से दिन में कई बार सेक्स भी कर सकते हैं जैसे चालीस की उम्र में कर सकते थे। अब यह ऐसी बात है कि भारत में कोई योगी खुले आम बोल नहीं सकता।

योगी काज़िम बुजुर्ग के बारे में पढ़ कर मुझे उत्सुकता हुई और फेसबुक पर उन्हें खोज लिया, उनका पेज टर्किश में है लेकिन उनसे मेरा संवाद अंग्रेजी में होता रहता है। उन्होंने बताया कि चालीस साल की उम्र में उन्हें रीढ़ में दर्द उठा, डाक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी लेकिन एक योग प्रशिक्षक से संपर्क हुआ और तब से नियमित योगाभ्यास करते हैं और पूरी तरह स्वस्थ हैं। नियमित किये जाने वाले आसनों में उन्होंने सन सल्युटेशन यानी सूर्य नमस्कार का नाम लिया और कहा की कम से कम इसे तो जरूर ही करते हैं क्योंकि यह अपने आप में पूर्ण है।

Yogi

योगी काज़िम wordpress.

अब देखिये सूर्य नमस्कार को लेकर अपने देश में कितना विवाद हुआ कि रामदेव खुद इसको बाहर करवा दिए क्योंकि स्वीकार्यता नहीं थी। चलिए इससे आगे बढ़ते हैं और इस समय भुला दिए गए एक योगी और सरकार के गठजोड़ की बात करते हैं, वैसा अभी मोदी राज में नहीं हो सका है।

आधी धोती पहने और आधी लपेटे दो युवा योगी के रूप में कलकत्ते जाते हैं, रामदेव और बालकृष्ण नहीं, दूसरी जोड़ी थी। उनसे प्रभावित होकर एक व्यापारी रामेश्वर लाल नोपानी उन्हें योग के प्रसार के लिए पांच सौ रूपये महीने देने को तैयार हो जाते हैं। सन 1954 में मोहन बगान स्पोर्टिंग क्लब के मैदान का एक कोना इन दो युवाओं को मिल जाता है जहाँ दर्जन भर लोगों के साथ शुरू होता है नियमित योगाभ्यास। एक का नाम था धीरेन्द्र ब्रह्मचारी और दूसरे हरिभक्त चैतन्य, बीस साल के भीतर धीरेन्द्र ब्रह्मचारी इन्डियन रास्पुटिन कहे जाने लगे, यानी जार कालीन रूस का वह अध्यात्मिक शक्तियों वाला व्यक्ति जो सरकार के निर्णयों को प्रभावित करने की स्थिति में था, जहाँ कुलीन लोगों के दरबार लगा करते थे और अपनी क्रांति से पहले गोर्की ने उसकी हत्या करवाना जरूरी समझा था।

कलकत्ते की सर्किल में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी का नाम होने लगा था और बहुत ही कम समय में खुले मैदान से एक सुनहरे सीमित दायरे में वो पहुँच गए। उन्हें रूस बुलाया जाता है स्पेस प्रोग्राम से जुड़े लोगों तो ट्रेनिंग देने के लिए, शून्य से बीस डिग्री नीचे के तापमान में भी केवल धोती में सहज दिख रहे योगी वहां चर्चा के केंद्र बन जाते हैं, हालाँकि बाद में कश्मीर में भी बर्फ़बारी के बीच वो केवल धोती में ही दिखते रहे।

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महर्षि कार्तिकेय (बीच में) अपने दो शिष्यों हरि भक्त चैतन्य (बाएं) और धीरेंद्र ब्रह्मचारी (दाएं) के साथ intoday

नेहरू जी की योग ही नहीं वरन साधू सन्यासियों में भी काफी रूचि थी, यहाँ तक की उनके निजी सचिव मथाई साहब तो अपनी पुस्तक ‘माई डेज विथ नेहरू’ में एक सन्यासिन श्रद्धा माता से उनके एक पुत्र तक की बात लिख दिए हैं, वहीं एक और ब्यूरोक्रेट टंडन ने इंदिरा जी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के बारे में भी उल्टा सीधा लिखा था। बाकी यह जरूर सच है कि तमाम लोगों ने इस योगी के पास जाकर अपनी पत्नियों के बहक जाने की शिकायत की थी लेकिन सुनता कौन? और ऐसे प्रसंग इस पोस्ट का विषय भी नहीं हैं, यहाँ बात सरकारी गठजोड़ की। नेहरू जी के संपर्क में आने के बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की उड़ान शुरू होती है और इंदिरा युग आते आते वो ‘फ़्लाइंग स्वामी’ कहे जाने लगे। बिहार के मधुबनी से निकले धीरेन्द्र चौधरी दिल्ली की हाई सर्किट में एक बड़ा नाम बन गए। तब तक इनके ऊपर पतन का आरोप लगाते हुए साथी हरिभक्त चैतन्य अलग हो गए।

1961 में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी को जंतर मंतर पर एक बंगला आवंटित हो जाता है, साथ ही योग के प्रसार के लिए शिक्षा मंत्रालय से बीस हजार रूपये सालाना का अनुदान भी स्वीकृत हो जाता है यानी सरकार योग को बढ़ावा देने के लिए पूर्ण समर्पित हो चुकी थी, सरकार और योगी का मानना था कि योग का नियमित अभ्यास हो तो देश से सभी बीमारियाँ हट जायेंगी। गरीबी हटाओ आन्दोलन के साथ एक यौगिक क्रान्ति भी शुरू हो चुकी थी। उनको दिल्ली में दूसरा बंगला भी मिल गया साथ ही मिली ढेर सारी जमीन पॉश इलाके में जहाँ योग हॉस्टल और अस्पताल भी शुरू हो गया।

अब याद करिए मोदी–रामदेव युग को। स्कूलों में योग शिक्षा को लेकर आज इतना हो हल्ला है लेकिन उसी समय दिल्ली के स्कूलों में और राजीव गांधी के समय केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन आने वाले देश भर में फैले नवोदय विद्यालयों में नियमित योग शिक्षा का कार्यक्रम धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के निर्देशन में बन चुका था। उनका विश्वयातन योगाश्रम नेताओं-अधिकारियों-दलालों से लेकर व्यापारियों से गुलजार रहने लगा। इस बीच उन्होंने योग पर किताब भी लिखी जिसकी भूमिका जयप्रकाश नारायण ने लिखी। रामदेव भी लालू प्रसाद से लेकर मोदी तक, सबकी गुड बुक में हैं लेकिन अभी वो धीरेन्द्र ब्रह्मचारी वाली राजनैतिक ताकत सत्ता के गलियारे में नहीं रखते। यह अलग बात है कि उनके समर्थक बहुत अधिक हैं और देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने में बड़ी भूमिका रही है लेकिन चुनाव में दो चार लोगों को टिकट दिलवाने से अधिक कुछ पता नहीं चला, साथ ही रामदेव ने अपना साम्राज्य अपने बूते खड़ा किया।

धीरेन्द्र ब्रह्मचारी सौ प्रतिशत सरकारी सहायता से चमकते चले जा रहे थे क्योंकि अब वो 1सफदरजंग रोड यानी इंदिरा जी के घर कभी भी जा सकते थे, संजय गांधी के भी वो बहुत करीब थे हालांकि यह कहा जाता है कि संजय की मृत्यु के बाद इंदिरा जी योग में अधिक समय देने लगीं और वह समय इस योगी का स्वर्ण काल था। एयरफ़ोर्स की आपत्ति के बावजूद इनको जम्मू में सैकड़ों एकड़ जमीन दे दी गयी, कटरा में भी जगह दी गयी। जम्मू श्रीनगर हाइवे पर काफी लम्बी चौड़ी व्यवस्था योग के विस्तार के लिए होने लगी। इस बीच से मंत्रीमंडल विस्तार से पहले ही पूरी लिस्ट किसी को दिखा कर राजनैतिक गलियारे में ताकतवर बन चुके थे क्योंकि पूरी उसी लिस्ट के लोगों ने ही शपथ ली थी।

सेंट्रल काउन्सिल ऑफ़ रिसर्च इन इन्डियन मेडिसिन एंड होम्योपैथी के चेयरमैन धीरेन्द्र ब्रह्मचारी बना दिए, इस बीच एक बड़ा काम यह हुआ कि शिक्षा मंत्रालय के साथ-साथ ही स्वास्थ्य मंत्रालय से भी सालाना अनुदान इनके संस्थान को मिलने लगा। कुल मिला कर इनके योग का काफी विकास हुआ, ये जापान गए तो इन्हें वहां हेलीकाप्टर गिफ्ट में मिला, साथ ही एक अमेरिकन कंपनी ने भी छोटा जहाज गिफ्ट किया और यह सभी भेंट भारत सरकार की तरफ से ड्यूटी फ्री होती रही क्योंकि सरकार इनकी ड्यूटी में लगी थी। इतनी सुविधा आजकल के लोग सोच भी नहीं सकते और हाँ इनके योग हॉस्टल में नियमित योग सीखने जाने वालों में सोनिया गांधी भी शुमार थीं क्योंकि तब की रिपोर्ट देखें तो रोज शाम को सोनिया जी इनके आश्रम जाती थीं।

इनका योग अस्पताल भी चल ही रहा था जहाँ खुद स्वामी जी ही बीमार हो गए, कहा जाता है कि इनको मांसपेशियों में दर्द की शिकायत थी तो नर्स ने कोई ऐसी अंग्रेजी दवा दे दी जिससे इन्हें अस्थमा हो गया हालाँकि इनका अस्पताल अस्थमा, मधुमेह और हाइपरटेंशन जैसी बिमारियों के इलाज का ही स्पेशलिस्ट था। मर्सडीज से लेकर तमाम विदेशी गाड़ियाँ तो अब बाबा जी के पास थी हीं लेकिन उड़नखटोलों की भी फ्लीट बन गयी थी और ये अपर्णा एयरलाइन्स के नाम से अपनी हवाई सेवा शुरू करने की भी सोच रहे थे।

इनके जम्मू आश्रम में उस जमाने में एक बहुत अच्छा स्टूडियो बन चुका था अस्पताल के लिए भी ड्यूटी फ्री मशीनें आ चुकी थीं। वहां इनको गन फैक्ट्री का भी लाइसेंस मिल गया था और बाबा जी की शिवा गन फैक्ट्री अस्तित्व में आ चुकी थी। दूरदर्शन देश में आ चुका था और उस पर इनको साप्ताहिक समय मिल चुका था योग के कार्यक्रम के लिए। नरसिम्हा राव के जमाने तक आते-आते चंद्रास्वामी राष्ट्रीय गुरु हो चुके थे और फ़्लाइंग स्वामी किनारे लग रहे थे। जबकि इसके पहले कश्मीर में इनको राजीव जी का जासूस मानकर इनके खिलाफ मोर्चा खोल चुके फारुख अब्दुल्ला ने जब राजीव जी से समझौता किया तब वो भी वहां इनके आश्रम आने जाने लगे।

वहां युवा योग शिक्षिकाओं के साथ फारुख अब्दुल्ला की तस्वीरें अखबारों में छपने लगी थीं। खूबसूरत आश्रम नें हवाई पट्टी, हैंगर, चिड़ियाघर, सब कानूनों को किनारे करते हुए बहुमंजिली इमारत, सब कुछ बहुत भव्य था। उसी भव्य माहौल में एक हवाई दुर्घटना में ये मारे गए जब खराब मौसम के बावजूद इन्होने पायलट को उड़ान भरने का जबरदस्ती दबाव डाला। इसी के साथ तब देश योग के सहारे पूरण स्वास्थ्य प्राप्त करने से वंचित रह गया। उनका सारा साम्राज्य खुर्दबुर्द हो गया, कहीं उसको सरकार ने अधिग्रहित किया तो कहीं ऐसे ही लुट गया। मोहन बगान के मैदान से प्रधानमन्त्री आवास होते हुए जम्मू की झाड़ियों तक एक योगयात्रा पूर्ण हुई, फिर भी सोचिये उनका योगदान कम रहा क्या?

आज निश्चित ही धीरेन्द्र ब्रह्मचारी और उनके संरक्षकों की आत्मा प्रसन्न होगी क्योंकि योग जन-जन के बीच पहुँच गया है, बाकी काफी लंबा लेख बन गया क्योंकि योग का विस्तार ही बहुत है, उसे समझना उतना सहज भी नहीं क्योंकि कसरत ही नहीं है योग। कुछ निश्चित सावधानियों के साथ जितना जानते हैं उतना योग करते रहिये, नुकसान नहीं होगा।

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