गोरखपीठ से मुख्यमंत्री आवास तक

एक बात होती है किसी की प्रशंसा करना, दूसरी बात होती है उसके चरणों में दंडवत हो जाना या बिछ जाना। उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के बाद से जिस तरह टीवी चैनल बिछ चुके हैं, उसे आदित्यनाथ योगी भी समझ ही रहे होंगे, क्योंकि उम्र भले ही राहुल गाँधी से कम हो, लेकिन समझदार काफी हैं।

हिंदुत्व के इस चेहरे की छत्रछाया में मुसलमान भी हैं सुरक्षित

चैनल वाले अगर पहले ही मंदिर के साथ जुड़े मुसलमानों की कहानियाँ दिखा दिए रहते तो लगता है कि पूरे देश के मुसलमान उनके साथ खड़े हो गए रहते। इन चैनलों को तभी ऐसे कार्यक्रम दिखाने चाहिए थे और जनता का उद्बोधन करना चाहिए था की देखिये महंत जी की छाया में तमाम मुसलमान सुरक्षित हैं और भगवाधारी की मंचीय तकरीरें केवल ‘डिमांड ऑफ़ बिजनेस हैं’।

57720578

प्रशंसाकार्यभार संभालने के साथ की खबर देखिये – योगी ने पिछली सरकार द्वारा नामित दर्ज़ाधारियों, निगमों के अध्यक्षों को बर्खास्त किया। आम जनता भी समझती है कि ऐसे पद केवल राजनैतिक अनुकम्पा पर ही मिलते हैं और सरकार बदलने पर ये भी बदल जाते हैं, फिर भी यह ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बनती है। सेक्युलर समझे वाले तमाम पत्रकार भी अब फटाफट बचपन वाली खाकी हाफ पैंट जबरदस्ती चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अच्छी बात है, क्योंकि चढ़ते सूरज को सलाम करने की परम्परा बहुत पुरानी है और आज के दौर में तो जरूरी भी है।

आज के राजनीतिक उथल-पुथल को देखिए इतिहास के चश्मे से

गोरखपुर और देवरिया के बीच एक क़स्बा है चौरी चौरा, जहाँ दो उपेक्षित शहीद स्मारक हैं। एक अंग्रेजों द्वारा अपने मृत सिपाहियों की याद में बना और दूसरा यहाँ शहीद हुए आम लोगों की स्मृति में है, जिसका निर्माण स्थानीय जनता ने चंदे के पैसे से करवाना शुरू किया था।

4 फरवरी 1922 में यहाँ भीड़ ने पुलिस थाना फूंक दिया था जिसमें 23 पुलिसकर्मी जल मरे थे। इसी काण्ड के बाद गाँधी जी ने अपना असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया था। यह अलग बात है कि यहाँ बाज़ार में कुछ चीजों की कीमतों और स्थानीय जमींदार की अंधेरगर्दी के विरोध में भीड़ प्रदर्शन कर रही थी। जमींदार के दलालों ने थाना इंचार्ज को फायरिंग करने की सलाह दी। ऐसे जमींदारों के वकील इलाहाबाद के बड़े बैरिस्टर मोतीलाल नेहरू हुआ करते थे और थाने भी अभी की तरह बड़े लोगों के ही जेब में होते थे। पुलिस फायरिंग में 3 लोगों के मारे जाने से भीड़ उत्तेजित हो गयी और पूरा इलाका उमड़ पड़ा और जब जान बचाने के लिए पुलिसकर्मी थाने में घुसे तो उसे फूंक दिया गया। इस मामले में सैकड़ों गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें तमाम लोगों को उम्र कैद हुई, कुछ को कम समय की कैद और उन्नीस लोगों को फांसी। शहीद स्मारक पर नाम पढ़ें और उसके बारे में दस्तावेज़ खंगालें तो विक्रम अहिर, सहदेव कहांर, से लगायत जुलाहा, फ़कीर, चमार से और तिवारी तक, समाज के हर वर्ग के लोग थे। हिन्दू-मुसलमान, बड़ी जाति, छोटी जाति; सभी इन उन्नीस नामों में शामिल हैं। गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजय नाथ को भी इस केस में सजा हुई थी, जो दो साल पहले ही कांग्रेस में शामिल हुए थे, लेकिन यहाँ भी उपस्थित थे। इतिहास भले ही इस हिंसा के विरोध में गांधी जी के कदम को सराह रहा हो, लेकिन स्थानीय जनता के लिए यह दुखद था क्योंकि उसका मानना था की यहाँ जो कुछ भी हुआ वह एक प्रतिक्रिया थी और जिन लोगों को फांसी हुई उन्हें गाँधी जी बचा सकते थे। इसकी एक विवेचना यह भी होती थी की पुलिस अधिकारी सवर्ण था और बड़े वकील भी उसी की वर्ग के थे, इस नाते इन लोगों ने कोशिश नहीं कि क्योंकि फांसी पाए लोगों में एक-दो को छोड़ कर सभी दलित -पिछड़े वर्ग के हिन्दू या मुसलमान थे।

महंत दिग्विजय नाथ का रिहाई के बाद कांग्रेस और गाँधी जी से मोहभंग हो गया। उन्होंने 1937 में सावरकर की हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली और जल्दी ही संयुक्त प्रांत के अध्यक्ष हो गए। यहाँ इस बात को याद रखिये की सनातनी वर्ण भेद का खंडन करते हुए गोरखपंथ का उदय हुआ था और उसके दरवाज़े शुद्द्धि-अशुद्धि के विचार से परे, सबके लिए खुले रहते थे। समाज के हर वर्ग के लोगों को एक समान सम्मान मिलता था और इसी नाते इलाके के मुसलमानों ने भी उस पीठ को अपने लिए वर्जित नहीं माना था और परिसर उनके लिए भी उतना ही अपना था, जितना किसी दलित या सवर्ण हिन्दू के लिए। सनातनी व्यवस्था से संघर्ष के चलते नाथपंथी वैसे भी उग्र सन्यासियों की श्रेणी में माने जाते रहे हैं। ऐसे में इस पीठ के प्रमुख का राजनीति में सक्रिय होना अलग संकेत था। चौरी-चौरा काण्ड के समय ही गाँधी जी और उनके अनुयायी तुर्की में खलीफा के पक्ष में लामबंद हो रहे थे। इतिहास को पलट कर देखना अच्छा लगता है, देखते रहना चाहिए।

इतिहास बहुत कुछ कहता है

प्रथम विश्वयुद्ध में यूरोप के तमाम मोर्चों की लड़ाईयों के बाद तुर्की में ओटोमन साम्राज्य के सुलतान मोहम्मद खलीफा की हालत नाजुक हो चुकी थी। खुद सल्तनत के लिए बड़ी लड़ाइयाँ सफलतापूर्वक लड़ चुके जनरल मुस्तफा कमाल पाशा तुर्की को सेक्युलर और डेमोक्रेटिक मुल्क के रूप में देखना चाहते थे। उनके साथ जनता भी लामबंद होती जा रही थी, जिसे यूरोप के विकसित समाज के बारे में पता चल रहा था और मुस्तफा की बातें आकर्षित कर रही थीं कि मजहब और राज्य को अलग-अलग रहना चाहिए। जनरल की बढ़ती लोकप्रियता और उसके एजेंडे से इस्लामी जगत में हडकंप मचा हुआ था। आज यह सोच कर हँसी आती है कि भारत के मौलाना लोग भी तब तुर्की के खलीफा को बचाए रखना चाहते थे, जिसे उनके मुताबिक़ अंग्रेजों की साजिश के चलते मुस्तफा कमजोर कर रहे थे। मौलानाओं ने ब्रिटेन पर दबाव बनाने के लिए खिलाफत मूवमेंट शुरू किया जो तुर्की में खलीफा का साथ दे रहे लोगों के सहयोग के लिए था। गाँधी जी को लगा की इसी बहाने मुसलमानों की बड़ी भागीदारी भारत के आन्दोलन में भी होगी और उन्होंने भी खिलाफत मूवमेंट का साथ दिया। यह तर्क इसलिए भी हास्यास्पद है, क्योंकि मुसलमान तो पहले से ही अंग्रेजी अत्याचार के खिलाफ साथ ही थे, दोनों वर्गों के कुछ एलीट लोग ही अपना राग अलापना शुरू किये थे, लेकिन ‘सेक्युलर’ कही जा रही ताकतों का यही भ्रम है जो खाई को आज तक बढ़ाता चला आया है। भारत से भी एक प्रतिनिधिमंडल तुर्की गया मुस्तफा से बात करने लिए कि खलीफा के सम्मान की रक्षा होनी चाहिए, क्योंकि अब्दुल मजीद को नया खलीफा बना कर उसके सारे अधिकार समाप्त कर दिए थे, केवल नाम ही नाम था। जनरल ने भारत से बहुत तामझाम से विदा हुए इस प्रतिनिधिमंडल को कोई भाव नहीं दिया और मार्च 1924 में आटोमन साम्राज्य को पूरी तरह उखाड़ कर फेंक दिया। सत्ता अपने कब्जे में ले ली, जहाँ खलीफा नाम का कोई पद नहीं था। जाहिर है खिलाफत मूवमेंट वहां भी और भारत में अपनी मौत मर गया। मुस्तफा कमाल लोकतांत्रिक तुर्की के पहले राष्ट्रपति बने और उन्हें अता तुर्क यानी उस देश के राष्ट्रपिता के रूप में याद किया जाता है।

अब योगी ‘राज’ में फिर उठने लगा है राम मंदिर का मुद्दा

राम जन्मभूमि-बाबरी विवाद दो पक्षों के बीच जमीन का काफी पुराना झगड़ा था। सन 1940 से पहले के राजस्व अभिलेखों में भी उस जगह का नाम ‘मस्जिदे-जन्मस्थान’ दर्ज है। मुकदमा उन्नीसवीं सदी से था और इमारत के बाहर चबूतरा बना कर वहां पूजा-पाठ भी होती रही थी, क्योंकि अंग्रेजों ने दोनों पक्षों के लिए विवादित स्थान को प्रतिबंधित कर दिया था। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद देश भर में हिन्दू महासभा से जुड़े लोगों की धर-पकड़ शुरू हुई तो इसमें महंत दिग्विजय नाथ की भी गिरफ़्तारी हुई। उनके ऊपर आरोप लगा की इन्होने गाँधी जी के हत्या के तीन दिन पहले एक सार्वजनिक सभा में उनकी हत्या की ललकार लगाई थी। नौ महीने की कैद के बाद रिहाई मिली तो उन्होंने हिन्दू महासभा को फिर से ताकत देने का बीड़ा उठाया और सबसे प्रमुख लक्ष्य था बाबरी मस्जिद पर कब्जा करके भव्य राममंदिर का निर्माण। अयोध्या में रामायण महासभा के बैनर तले नौ दिन के रामायण पाठ का कार्यक्रम रखा गया था और इसी दौरान हल्ला हुआ की परिसर में रामलला प्रकट हो गए यानि भीतर मूर्ती विराजमान हो चुकी थी।

इसके पीछे गोरखपीठ यानि महंत दिग्विजय नाथ की ही योजना बतायी जाती है। गाँधी हत्या मामले में इनके साथ महासभा के राष्ट्रीय महासचिव देशपांडे की भी गिरफ्तारी हुई थी। इतना नाम कमाने के बाद  वी.जी. देशपांडे ने पहला आम चुनाव ग्वालियर और गुना, दो सीटों से लड़ा और उनकी दोनों जगह विजय हुई। अब महासभा को अपने मिशन के लिए बल मिलने लगा, लेकिन अगला चुनाव देशपांडे कांग्रेस की राजमाता विजया राजे सिंधिया से हार गए। सही पढ़ा उन लोगों ने जिनकी उम्र कम है अभी और वे राजमाता को भाजपा नेता के रूप में याद रखते हैं। एक चुनाव और कांग्रेस से जीतने के बाद राजमाता जनसंघ में शामिल हो गयीं। सन 71 के चुनाव में उनके साथ उनके बेटे माधवराव सिंधिया भी जनसंघ के ही टिकट पर अपना पहला चुनाव जीते थे। यह अलग बात है की बाद में माँ से संपत्ति विवाद के चलते वो कांग्रेस में शामिल हो गए, जिसे बड़े जोर-शोर से विचारधाराओं का संघर्ष प्रचारित करके स्थापित कर दिया गया। अब सोचिये जिन लोगों ने सोचा होगा कि देशपांडे को हरा कर राजमाता ने महासभा के चिंतन को परस्त कर दिया उन्हें कैसा लगा होगा जब राजमाता खुद जनसंघी बन गयीं? इसीलिए राजनेताओं को लेकर अधिक संवेदनशील होना मूर्खता है। खैर, इन सब मुद्दों पर फिर कभी। जनता ने महंत दिग्विजय नाथ को भी संसद में पहुंचा दिया और बाद में उनके उत्तराधिकारी महंत अवैद्य नाथ भी लगातार चुने जाते रहे जिनके बाद से आदित्यनाथ योगी जीतते रहे हैं।

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मामला तारीख पर तारीख के हिसाब से चल रहा था और इसी बीच देश को राजीव गांधी जैसा प्रधानमंत्री मिला जिनके कई फैसलों ने इतिहास बनाया। हिन्दू महासभा जब-तब जोर मारती रहती थी, लेकिन अदालत के आदेश के तहत वहां सार्वजनिक पूजा पाठ बंद थी, केवल एक पुजारी को जाने की अनुमति थी। राजीव गाँधी ने वहां का ताला खुलवा दिया क्योंकि, वो देश में राम राज्य लाना चाहते थे और वीपी सिंह के विद्रोह को शांत करने के लिए इससे अच्छा मौका नहीं दिख रहा था। एक तरफ अदालती रोक के बावजूद ऐसा काम और दूसरी तरफ अदालत के फैसले को शाहबानो प्रकरण में संसद से पलटवा देना, राजीव गाँधी या उनके सलाहकार क्या चाहते थे इसकी व्याख्या करते रहिये। वो शायद सबका साथ-सबका विकास करना चाहते थे, उसमें किसी का बुरा हो तो होता रहे। ताला खुलने से हिन्दू महासभा को बहुत ताकत मिली और अभी हिन्दू समाज के छिटपुट हिस्से तक ही वह अपनी जो बात ले जा पाती थी, उसे राजीव गाँधी के कदम ने जन-जन तक पहुंचा दिया। क्या हिन्दू-क्या मुसलमान। आज इस प्रकरण में जो कांग्रेसी हल्ला करते हैं, वे अपनी ही पार्टी के पूर्व प्रधानमंत्री के साथ ही खानदानी नेता राहुल जी का अपमान कर रहे हैं।

महंत अवैद्य नाथ ने 1984 में श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया था और बिहार में सीतामढ़ी से अयोध्या तक की एक यात्रा निकाली, जिसका उद्देश्य राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए संघर्ष का वातावरण बनाना था। अस्सी के दशक में ही प्रयाग में धर्म संसद के दौरान महंत अवैद्य नाथ ने राम मंदिर के निर्माण का संकल्प पास करवाया। उनके भाषणों में सभी राजनैतिक दलों की आलोचना होती थी और निशाना अटल बिहारी वाजपेयी पर भी रहता था जो जनसंघी होते हुए भी इस मसले पर गंभीर नहीं थे।

mehant-avaidyanath759

गोरखनाथ मठ के प्रमुख पुजारी रहे और योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्य नाथ

भले ही कागजों में महंत जी को भाजपा से सांसद कहा जाता हो लेकिन उनकी सत्ता इस दल के नियंत्रण से बाहर की थी। कुम्भ में उनके संकल्प के कुछ ही बाद अटल-आडवाणी के नेतृत्व में वह हो गया जिसकी कल्पना राजीव गाँधी ने नहीं की रही होगी।

कुछ साल बाद मठ के उत्तराधिकारी आदित्य नाथ योगी बने जिनका भी भाजपा से उस तरह का संबंध नहीं बन पाया जैसा देश के तमाम लोग समझते होंगे, क्योंकि योगी जी के हिसाब से भाजपा के कुछ नेता उदारवादी दिखने के चक्कर में रामजन्मभूमि आन्दोलन को उसका लक्ष्य पूरा करने में सहायक नहीं हो सके। योगी मानते रहे हैं कि भाजपा ने लोकप्रिय राजनीति के फेर में पड़ कर हिन्दू महासभा के प्रमुख लक्ष्य को पूरा करने की जगह केवल अपना काम निकाला। योगी जी के भाजपा के साथ रिश्ते हमेशा खट्टे-मीठे ही रहे। विधानसभा चुनावों के समय इलाके के प्रत्याशियों के चयन में भी मतभेद होते रहे थे और एक चुनाव में तो उन्होंने सूबे की सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी थी। कभी जब लखनऊ में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी तो उसी समय उन्होंने गोरखपुर में विराट हिन्दू महासम्मेलन रख दिया था। उनके द्वारा स्थापित ‘सांस्कृतिक संगठन’ हिन्दू युवा वाहिनी की इलाके में अच्छी पकड़ है।

1

योगी जी लगाते रहे हैं जनता का दरबार, वर्षों से मुस्लिम हैं सहयोगी

अब तमाम टीवी चैनल दिखा रहे हैं की कैसे योगी जी का गोरखपुर में दरबार लगता रहा है जहाँ तमाम वंचित-पीड़ित लोग फ़रियाद लेकर आते हैं और उनके साथ न्याय किया जाता है। यह बहुत अच्छी बात है क्योंकि जब सिस्टम फेल हो जाता है, तब ऐसी तमाम कचहरियों की जरूरत पड़ती ही है, लेकिन योगी जी एक क्षेत्रीय सांसद होने के नाते ऐसा करते हैं, जो दूसरे जनप्रतिनिधियों को भी सीखना चाहिए और अपनी जनता को समय देना चाहिए। हालाँकि ऐसा प्रायः वही लोग करते हैं जो इलाके में दबंग होते हैं, जिनके फैसलों का शासन-प्रशासन के साथ सामान्य लोग भी सम्मान करें। हाँ उनका ‘सांस्कृतिक संगठन’ पान के छींटे पड़ने पर भी हो जाने वाले बवाल से लेकर जमीन जायदाद, हद बंदी जैसे लफड़ों में ऑन स्पॉट ‘न्याय’ करने भी पहुँच जाता है इस नाते इलाके में उसके झंडे की भी बहुत धाक है।

लोकसभा चुनाव के पहले ऐसे ही आज़मगढ़ में एक पेड़ के चबूतरे पर कुछ यादव जी लोग मूर्ति रख कर घेरा बना रहे थे तो आसपास के मुसलमानों ने विरोध किया था कि यहाँ छाँव तले सब लोग बैठते हैं। लफड़ा बढ़ गया, लाठी-डंडा-गोली से संवाद होने लगा, जिसमें यादव समाज का एक युवक मारा गया था। हिन्दू युवा वाहिनी वहां सक्रिय हो गई क्योंकि प्रशासन के सामने दोनों पक्ष सत्ताधारी दल के ‘बेस वोटर’ थे। वाहिनी और योगी जी ऐसे मामलों में तुरंत उपस्थित होने की कोशिश करते रहे हैं।

राम मंदिर पर अब क्‍या स्‍टैंड लेंगे यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ? ये देखना वाकई दिलचस्प होगा

साथ ही याद रहे कि अब माननीय आदित्यनाथ योगी मठ के दायरे से बाहर आकर देश के सबसे बड़े सूबे की गद्दी पर विराजमान हो चुके हैं और उनके कार्य निर्वहन के लिए उनके सामने संविधान के दिशा-निर्देश भी हैं, लेकिन उनके सपनों में उनके दादा गुरु का सपना भी होगा, राम जन्म भूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद मामला बड़ी अदालत में चला गया था। हालाँकि इलाहाबाद के फैसले के समय सूबे में आशंका के विपरीत कोई हलचल नहीं हुई, क्योंकि मायावती का राज था। अब सुना है बड़ी अदालत ने भी आपस में मिल-बैठ कर मामला सलटाने को कहा है। यह मामला इतना आसान ही होता तो नेहरू जी से लगायत राजीव जी के काल में भी बैठा कर सलटा दिया गया होता।

phpThumb_generated_thumbnail

एक संन्यासी से सीएम बने योगी आदित्यनाथ के सामने हैं कई चुनौतियां

फिलहाल अभी तो योगी जी के सामने भाजपा के संकल्प पत्र को पूरा करने की चुनौतियाँ हैं और यह भरोसा कायम करने की जरूरत है कि चुनावी रैलियां अलग बात हैं, मठ के मुस्लिम कर्मचारी व्यक्तिगत संबंधों की बात हैं। राजनीति प्रतीकों की बात है और एक प्रतीक के रूप में उनकी छवि वही है जो हिन्दू महासभा ने गढ़नी चाही होगी। हाँ योगी से राजा बने व्यक्ति के लिए हिंदी या सनातनी शब्दावली में क्या शब्द इस्तेमाल होता है यह मुझे याद नहीं आ रहा है, पिछले किसी उदाहरण की भी याद नहीं आ रही है। धार्मिक और राजनैतिक शक्तियों के साथ शिखर पर विराजमान शासक के लिए इस्लाम में जरूर एक शब्द मिलता है, जो है खलीफा। सुना है लखनऊ की सड़कों पर हिन्दू युवा वाहिनी के झंडे दिखने लगे हैं। पूर्वांचल में फैली चिंता कि भाजपाइयों से अधिक अब इस वाहिनी के कार्यकर्ताओं की सुनी जायेगी, साकार रूप न लेने पाए इसके लिए योगी जी के लिए यह जरूरी है अब वह किसी झंडे को देखे बिना, वास्तव में सबका साथ-सबका विकास का सपना पूरा करें। 

भगवा रंग के बारे में इधर जो तमाम गलतफहमियां बढ़ गयी हैं उसे दूर करने में सहायक हों, क्योंकि भगवा या केसरिया यानि जाफ़रानी तो हमारे राष्ट्रीय ध्वज का भी एक रंग है। भगवा आदि गुरु शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद और दयानन्द सरस्वती का भी रंग है। हाँ सबका टीवी देखना कम होना ही चाहिए क्योंकि बता रहा है कि योगी जहाँ भी प्रवेश करते हैं, हवन जरूर करवाते हैं। अरे भाई नारियल फोड़ कर शिलान्यास और हवन करवा कर गृह प्रवेश तो हिन्दुओं की परम्परा में है। हाँ ‘मंदिर वहीं बनायेंगे लेकिन तारीख नहीं बतायेंगे’ वाला नारा लगाने वालों को भी कुछ दिन शांत रहना चाहिए, क्योंकि जो तारीख वह पूछ रहे हैं वह मुख्यमंत्री जी के गुरुओं का भी सपना था और एक योगी का सबसे बड़ा लक्ष्य अपने गुरु महाराज के सपने को पूरा करना होता है। बाकी विकास तो होता रहता है, वह एक प्रक्रिया है।

It's only fair to share...Email this to someoneShare on FacebookShare on Google+Tweet about this on TwitterShare on LinkedIn

Facebook Comments